सामग्री पर जाएँ
भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 612, कुल 1008 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 612

दृष्टिं चाधाय मनसा पूजयित्वा रविं पुनः । साधकेन स्वकैक्येन मूलमंत्रं धिया जपन् ॥४४॥ आर्घ्यं दद्याद्रविं ध्यायन्रक्तचंदनमंडले । दत्त्वा पुष्पांजलिं भूयो जपेदष्टोत्तरं शतम् ॥४५॥ नित्यं वा तद्दिनेऽप्येवमर्घ्यं दद्याद्विवस्वते । तेन तुष्टो दिनेशोऽस्मै दद्याद्वित्तं यशः सुखम् ॥४६॥ पुत्रांश्पौत्रानभीष्टं च यद्यत्सर्वं प्रयच्छति । अर्घ्यदानमिदं प्रोक्तमायुरारोग्यवर्धनम् ॥४७॥ धनधान्यपशुक्षेमक्षेत्रमित्रकलत्रदम् । तेजोवीर्ययशःकीर्तिविद्याविभवभोगदम् ॥४८॥ गायत्र्याराधनासक्तः संध्यावंदनतत्परः । एवं मनुं जपन्विप्रो दुःखं नैवाप्नुयात्क्वचित् ॥४८॥ विकर्तनाय निर्माल्यमेवं संपूज्य दापयेत् । वियद्वह्निमरुत्साद्यांतार्वीसेंदुसमन्वितम् ॥५०॥ मातंडभैरवाख्यं हि बीजं त्रैलोक्यमोहनम् । बिंबबीजेन पुटितं सर्वकामफलप्रदम् ॥५१॥ पूर्ववत्सकलं चान्यदत्र ज्ञेयं मनीषिभिः । भृगुर्जलेन्दुमन्वाढ्यः सोमाय हृदयांतिमः ॥५२॥ षडक्षरो मंत्रराजो मुनिरस्य भृगुर्मतः । छंदः पंक्तिस्तु सोमोऽस्य देवता परिकीर्तिता ॥५३॥ आद्यं बीजं नमः शक्तिर्विनियोगोऽखिलाप्तये । षड्दीर्घेण स्वबीजेन षडंगानि समाचरेत् ॥५४॥ पूर्णेन्दास्यं स्फटिकभं नीलाकलकसंमुखम् । बिभ्राणमिष्टं कुमुदं ध्यायेन्मुक्ताल्रजं विधुम् ॥५५॥ ऋतुलक्षं जपेन्मंत्रं पायसेन ससर्पिषा । जुहुयात्तद्दशांशेन पीठे सोमांतपूजिते ॥५६॥ मतिमूलेन संकल्प्य पुजयद्विधिवद्विधुम् । केसरेष्वंगपूजा स्यात्पत्रेष्वेताश्च शक्तयः ॥५७॥ रोहिणी कृत्तिका चैव रेवती भरणी पुरः । रात्रिरार्द्रा ततो ज्योत्स्ना कला हारसमप्रभा ॥५८॥

की पूजा करके साधक अपने को उनसे अभिन्न समझकर मन में मूल मन्त्र का जप करे । रवि का ध्यान करते हुए रक्तचंदनमण्डल पर उन्हें अर्घ्य प्रदान करे । फिर पुष्पांजलि देकर एक सौ आठ बार मन्त्र-जप करे ॥४२-४५। उस दिन भी इसी प्रकार सूर्य को अर्घ्य दे । इससे प्रसन्न होकर सूर्य उस (साधक) को धन, यश, सुख, पुत्र, पौत्र तथा वह जो-जो चाहता है, वह सब उसे प्रदान करते हैं । यह सूर्य-पूजन आयु तथा आरोग्य का वर्धक है । यह धन, धान्य, पशु, कल्याण, क्षेत्र, मित्र तथा पत्नी दिलाने वाला है । इससे तेज, वीर्य, यश, कीर्ति, विद्या, विभव तथा भोग भी मिलता है । जो विप्र गायत्री की आराधना एवं संध्यावंदन करने में तत्पर रह कर सूर्य-मंत्र का जप करता है, उसे कहीं भी दुःख नहीं होता है । इस प्रकार सूर्य का सम्पूजन कर नैवेद्य वितरण कर दे ॥४६-४९३॥ आकाश (ह), वह्नि (र), मरुत् (य), आदि में स और अंत में अनुस्वारयुक्त आवीं—यह मार्तण्डभैरव नामक बीज मन्त्र है, जो तीनों लोक को मोहित करने वाला है । इस मन्त्र को बिम्ब-बीज से सम्पुटित कर देने पर यह सकल कामनादायक हो जाता है । इस मन्त्र के संबंध में भी विद्वान् लोग पूर्ववत् ही सब कुछ समझें । भृगु (स्), जल (व्), इन्द्र (अनुस्वार), मनु (ओ) से युक्त 'ओं सोमाय नमः' यह षडक्षर मन्त्र मन्त्रराज कहलाता है । इसका मुनि भृगु है, छंद पंक्ति है, देवता सोम है, आद्य बीज है, नमः शक्ति है और सकल वस्तुओं की प्राप्ति के लिए इसका विनियोग किया जाता है । छह दीर्घ मात्राओं से युक्त अपने बीजमन्त्र से षडंगन्यास करे ॥५०-५४॥ तदनन्तर ऐसा ध्यान करे कि सोम का मुख पूर्ण कलाओं से युक्त है, स्फटिक के समान उसकी कान्ति है, काले घुंघराले बालों से उसका मुख शोभित हो रहा है और वह अपने प्रिय कुमुदपुष्प को धारण किये हुए है । ध्यानोंपरान्त छह लाख मन्त्र-जप करे और उसका दशांश घी सहित खीर से चन्द्र-पीठ पर हवन करे ॥५५-५६॥ मूर्ति के मूल भाग या मूलमन्त्र से विधिपूर्वक चन्द्रमा की पूजा करे। केसों पर चन्द्रमा के अंगदेवताओं और पत्रों पर इन शक्तियों का पूजन करे—रोहिणी, कृत्तिका, रेवती, भरणी, रात्रि, आर्द्रा, ज्योत्स्ना और कला । इन शक्तियों की कान्ति हार के समान है ॥५७-५८॥ सब शक्तियाँ शुभ्र माला एवं वस्त्र धारण ७५ ना० पृ०

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या) · पृष्ठ 612, कुल 1008 में से · BharatKosha