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भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 611, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 611

५६२ नारदीयपुराणम्

साक्षिणं जगतां तस्यामावाह्य विधिवद्यजेत् । ततः षडंगावाराध्य दिक्ष्वष्टांगं प्रपूजयेत् ॥२८॥ संपूज्य मध्ये वाऽदित्यं रविं भानुं च भास्करम् । सूर्य दिशासु सूर्यादिपंच ह्रस्वातिकानिमान् ॥३०॥ स्वस्वनामादिदीर्घाद्याः शक्तयोऽर्च्य विविक्षु च । ऊर्जा प्रज्ञां प्रभां संध्यां ततो ब्रह्मादिकान्यजेत् ॥३१॥ पुरतोऽरुणमभ्यर्च्य सोमं ज्ञं च गुरुं भृगुम् । दिक्ष्वर्यमादिकानिष्ट्वा भूमिजं च शनैश्चरम् ॥३२॥ राहुं केतुं च कोणेषु पूर्ववत्परिपूजयेत् । इंद्राद्यानपि वज्राद्यान्पूजयेत्पूर्ववत्सुधीः ॥३३॥ इत्थं संपूज्य विधिवद्भास्करं भक्तवत्सलम् । समाहितो दिने शाय दद्यादर्घ्य दिने दिने ॥३४॥ प्राणानायम्य सद्‌भूमौ न्यासान्कृत्वा पुरोदितान् । विधाय मंडलं भानोः पीठं पूर्ववदर्चयेत् ॥३५॥ ध्यात्वार्कं प्रयजेद्दिव्यैर्मान सैरुपचारकैः । पात्रं ताम्रमयं प्रस्थतोयग्राहि सुशोभनम् ॥३६॥ निधाय मंडले रक्तचंदनादिविनिर्मिते । विलोममातृकामूलमुच्चरन्पूरयेज्जलैः ॥३७॥ सूर्यबिंब विनिर्गच्छत्सुधांबुधिविभावितैः । कुंकुमं रोचनां राजों चंदलं रक्तचंदनम् ॥३८॥ करवीरं जपामारिकुशश्यामाकतंडुलान् । तिलवेणुयवांश्चैव निक्षिपेत्सलिले शुभे ॥३६॥ सांगं सावरणं तत्रावाह्यार्कं पूर्ववद्यजेत् । गंधपुष्पधूपदीपनैवेद्याद्यैर्विधानतः ॥४०॥ प्राणायामत्रयं कृत्वा कुर्यादंगानि पूर्ववत् । सुधाबीजं चंदनेन दक्षे करतले लिखेत् ॥४१॥ तेनाच्छाद्यार्घ्यपात्रं च जपेन्मनुमनन्यधीः । अष्टोत्तरशतावृत्त्या पुनः संपूज्य भास्करम् ॥४२॥ हस्ताभ्यां पात्रमादाय जानुभ्यामवनौ गतः । आमूर्ध्न पात्रमुद्धृत्यांबरेण वरणे रवेः ॥४३॥


के साक्षी (सूर्य) का आवाहन करके विधिवत् पूजन करे। तदनन्तर उनके छह अंगों की आराधना करके दिशाओं में आठ अंगों का भी पूजन करे ॥२७-२९॥ अथवा मध्य में आदित्य, रवि, भानु, भास्कर तथा सूर्य की और दिशाओं में सद्य (ओ) आदि तथा ह्रस्व (वर्ण) आदि के साथ इन पाँचों (नामों) की पूजा करनी चाहिए। फिर विदिशाओं (कोणों) में शक्तियों की पूजा करे। वे शक्तियाँ हैं- उषा, प्रज्ञा, प्रभा तथा सन्ध्या । इसके बाद ब्रह्मा आदि की पूजा करे। आगे अरुण, सोम, बुध, बृहस्पति तथा शुक्र की अर्चना करके दिशाओं में अर्यमा आदि की पूजा करे। फिर मंगल, शनैश्चर, राहु तथा केतु का पूजन पूर्ववत् कोणों में करे। विद्वान् इन्द्र आदि देवों तथा (उनके) वज्र आदि आयुधों का भो पूजन करे ॥३०-३३॥

इस प्रकार विधिपूर्वक भक्तवत्सल सूर्य की आराधना करके एकाग्रचित्त होकर प्रतिदिन सूर्य को अर्घ्य दिया करे। प्राणायाम करने के उपरान्त पवित्र भूमि पर पूर्वोक्त न्यासों को करके मण्डल की रचना करने के बाद पूर्ववत् सूर्य के पीठ की अर्चना करे। सूर्य का ध्यान करके दिव्य मानस उपचारों से उनका पूजन करे। एक तांबे के सुन्दर पात्र को रक्तमंत्र आदि के बनाये हुए मण्डल पर रखकर विलोममातृका के मूलमंत्र का उच्चारण करते हुए उस पात्र को जल से भर दे। उसमें भावना करे कि सूर्य-बिम्ब से निकलते हुए अमृत-समुद्र से वह पात्र भरा जा रहा है, ॥३४-३७॥ इसके बाद उस पवित्र जल में कुंकुम, रोचना, सर्षप, चन्दन, रक्तचन्दन, करवीर, जपाकुसुम,जड़हन चावल, कुश, साँवाँ चावल, (सामान्य) चावल, तिल, वेणु (बांस ?) और यव डाले। वहीं अंगों तथा आवरणों सहित सूर्य का आवाहन करके पूर्ववत् गंध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य आदि से उनका विधिपूर्वक पूजन करे। (पूरक, कुंभक, रेचक) तीनों प्राणायाम करके पूर्ववत् अंगन्यास करे। फिर दाहिनी हथेली पर चंदन से सुधाबीज (वं) लिखे । ॥३८-४१॥ उससे अर्घ्यपात्र को आच्छादित करके एकाग्रचित्त से मन्त्र का जप करे। एक सौ आठ बार जप करने के बाद सूर्य का पुनः पूजन करे। फिर दोनों हाथों से पात्र उठाकर धरती पर घुटनों के बल बैठकर पात्र को मस्तक तक उठाकर वस्त्र की आड़ से सूर्य पर दृष्टि डाले । फिर मन में सूर्य