बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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५६५ एकोनसप्ततितमोऽध्यायः विरूपाक्षो मुनिश्च्छंदोगायत्रं देवता कुजः । मंत्राणैः षड्भिरंगानि कुर्वन्ध्यायेद्धरात्मजम् ॥७४॥ मेषस्थं रक्तवस्त्रांगं शूलशक्तिगदावरान् । करैर्बिभ्राणमीशानस्वेदजं भूसुतं स्मरेत् ॥७५॥ रसलक्षं जपेन्मंत्रं दशांशं खदिरोद्भवैः । समिद्भिर्जुहुयादग्नौ शैवे पीठे यजेत्कुजम् ॥७६॥ प्रागंगानि समाराध्य ह्येर्काविंशतिकोष्ठकम् । मंगलो भूमिपुत्रश्च ऋणहर्ता धनप्रदः ॥७७॥ स्थिरासनो महाकायः सर्वकर्मावरोधकः । लोहितो लोहिताक्षश्च सामगानां कृपाकरः ॥७८॥ धरात्मजः कुजो भौमो भूमिदो भूमिनंदनः । अंगारको महीसूनुः सर्वरोगापहारकः ॥७९॥ वृष्टिकर्ता वृष्टिहर्ता सर्वकार्यार्थसिद्धिदः । इत्येकविंशतिः प्रोक्ता मूर्तयो भूसुतस्य वै ॥८०॥ मंगलादीन्यजेन्मंत्री स्वस्वस्थानस्थितान्क्रमात् । इंद्राद्यानपि वज्रादीनेवं सिद्धो भवेन्मनुः ॥८१॥ सुतकामा कुरंगाक्षी भौमव्रतमुपाचरेत् । मार्गशीर्षेऽथ वैशाखे व्रतारंभः प्रशस्यते ॥८२॥ अरुणोदयवेलायामुत्थायावश्यकं पुनः । विनिर्वर्त्य रदन्धावेदपामार्गेण वाग्यता ॥८३॥ स्नात्वा रक्तांबरधरा रक्तमाल्यविलेपना । नैवेद्यादींश्च संभारान्रक्तान्सर्वान्प्रकल्पयेत् ॥८४॥ योग्यं विप्रं समाहूय कुजमर्चेत्तदाज्ञया । रक्तगोगोमयालिप्तभूमौ रक्तासने विशेत् ॥८५॥ आचम्य देशकालौ च स्मृत्वाकाम्य समुच्चरन् । मङ्गलादीनि नामानि स्वकीयांगेषु विन्यसेत् ॥८६॥ मुखे प्रविन्सेत्साध्वी सामगानां कृपाकरम् । धरात्मजं नासोरन्ध्रोः कुजं भौमं ललाटके ॥८७॥ भूमिदं तु भ्रुवोर्मध्ये मस्तके भूमिनन्दनम् । अङ्गारकं शिखायां च सर्वाङ्गे च महीसुतम् ॥८८॥ बाहुद्वये न्यसेत्पश्चात्सर्वरोगापहारकम् । मूर्द्धादि वृष्टिकर्त्तारमापादांतं न्यसेत्सुधीः ॥८९॥ करके मंगल का इस प्रकार ध्यान करे कि वे भेड़े पर विराजमान है, लाल वस्त्र से उनके अंग आच्छादित हैं और वे हाथों में त्रिशूल, शक्ति (सांग) तथा उत्तम गदा धारण किये हुए हैं। इस प्रकार शंकर के पसीने से उत्पन्न मंगल का स्मरण करके छह लाख मन्त्र-जप करे और उसका दशांश खैर की समिधा से अग्नि में हवन करे। अनन्तर शैव पीठ पर मंगल की पूजा करे। पहले अंगदेवताओं की आराधना करके इक्कीस कोष्ठों में मंगल की इक्कीस मूर्तियों का पूजन करे। मंगल, भूमिपुत्र, ऋणहर्ता, धनप्रद, स्थिरासन, महाकाय, सर्वकर्मावरोधक, लोहित, लोहिताक्ष, सामगकृपाकर (सामगान करने वालों पर दयालु), धरात्मज, कुज, भौम, भूमिद, भूमिनंदन, अंगारक, महीसुत, सर्वरोगापहारक, वृष्टिकर्ता, वृष्टिहर्ता और सर्वकार्यसिद्धिदायक—ये मंगल की इक्कीस मूर्तियां कही गई हैं। मन्त्र-साधक अपने-अपने स्थान में स्थित मंगल आदि ग्रहों का क्रमशः पूजन करे। अनन्तर इन्द्र आदि देवों तथा (उनके आयुध) वज्र आदि का भी पूजन करे। ऐसा करने से मन्त्र सिद्ध हो जाता है ॥७२-८१॥ पुत्र की इच्छुक रमणी मंगल का व्रत करे। अगहन या वैशाख में व्रत का आरंभ करना प्रशस्त माना गया है। अरुणोदय के समय उठकर आवश्यक (शौचादि) कार्य से निबटकर मौन होकर अपामार्ग (चिचिड़े) से दांतों को माँजे। (दन्तधावन के बाद) स्नान करके लाल वस्त्र, लाल पुष्प तथा लाल चन्दन धारण करे। नैवेद्य आदि का समायोजन भी करे, किन्तु सभी वस्तुएँ लाल होनी चाहिए। योग्य ब्राह्मण को बुलाकर उसकी आज्ञा से मङ्गल का पूजन करे। लाल गाय के गोबर से लिपी हुई भूमि पर लाल आसन पर (व्रती स्त्री) बैठे। आचमन तथा देश-काल का स्मरण करके अपनी कामना का उच्चारण करते हुए मङ्गल आदि नामों का अपने अंगों में न्यास करे। साध्वी स्त्री अपने मुख में सामगकृपाकर का न्यास करे। दोनों नासिकापुटों में धरात्मज का, दोनों नेत्रों में कुज का ललाट में भौम का, भौहों के बीच भूमिद का, मस्तक में भूमिनन्दन का, शिखा में अंगारक का और सर्वांग में महीसुत का न्यास करे। पश्चात् दोनों बाहों में सर्वरोगापहारक का न्यास करे। मस्तक से लेकर पैर के अन्त