बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें५८६ नारदीयपुराणम् विन्यसेदृष्टिहर्तारं मूर्द्धां तं चरणादितः । न्यसेदंते ततो दिक्षु सर्वकार्यार्थसिद्धिदम् ॥८०॥ नाभौ हृदि शिरस्यारं वक्त्रे भूमिजमेव च । विन्यस्यैवं निजे देहे ध्यायेत्प्राग्वद्धरात्मजम् ॥८१॥ मानसेरुष्चारैश्च संपूज्यार्घ्यं निधापयेत् । एकविंशतिकोष्ठाढ्ये त्रिकोणे ताम्रपत्रगे ॥८२॥ आवाह्याङ्गारकं तत्र रक्तपुष्पादिभिर्यजेत् । अङ्गानि पूर्वमाराध्य मङ्गलादीन्प्रपूजयेत् ॥८३॥ एकविंशतिकोष्ठेषु चक्रमशारं च भूमिजम् । त्रिकोणेषु च सम्पूज्य बहिरष्टौ च मातृकाः ॥८४॥ इंद्रादीनथ वज्रादीन्बाह्ये संपूजयेत्पुनः । धूपदीपौ समर्प्याथ गोधूमान्नं निवेदयेत् ॥८५॥ ताम्रपात्रे शुद्धतोयपूरिते रक्तचंदनम् । रक्तपुष्पाक्षतफलान्याक्षिप्यार्घ्यं समर्पयेत् ॥ मंगलाय ततो मंत्री इमं मंत्रद्वयं पठेत् ॥८६॥ भूमिपुत्र महातेजः स्वेदोद्भवपिनाकिनः । सुतार्थिनी प्रपन्ना त्वां गृहाणार्घ्यं नमोऽस्तु ते ॥८७॥ रक्तप्रवालसंकाशं जपाकुसुमसंन्निभ । महीसुत महाभाग गृहाणार्घ्यं नमोऽस्तु ते ॥८८॥ एकविंशतिपूर्वोक्तैर्ङेऽन्तैर्नमोंऽतैश्च नामभिः । ताराद्यैः प्रणमेत्पश्चात्तावत्यश्च प्रदक्षिणाः ॥८९॥ धरणीगर्भसंभूतं विद्युत्तेजः समप्रभम् । कुमारं शक्तिहस्तं च मङ्गलं प्रणमाम्यहम् ॥१००॥ ततो रेखात्रयं कुर्यात्खदिरांगारकेण च । मार्जयेद्वामपादेन मंत्राभ्यां च समाहिता ॥१०१॥ दुःखदौर्भाग्यनाशाय पुत्रसंतानहेतवे । कृतरेखात्रयं वामपादेनैतत्प्रमार्जयम् ॥१०२॥ तक वृष्टिकर्त्ता का न्यास करे ॥८२-८९॥ फिर चरण से मस्तक तक दृष्टिहर्ता का न्यास करे । तदनन्तर दिशाओं में सर्वकामार्थसिद्धिदायक का न्यास करे। नाभि, हृदय तथा मस्तक में आर का और मुख में भूमिज का न्यास करे। इस प्रकार अपनी देह में न्यास करके पहले की तरह भूमि-पुत्र (मङ्गल) का ध्यान करे। फिर मानस उपचारों (कल्पित द्रव्यों) से पूजन करके अर्घ्य प्रदान करे। एक त्रिकोण ताम्रपत्र पर, जिसमें इक्कीस कोष्ठक बने हों, मङ्गल ग्रह का आवाहन करके लाल पुष्प आदि से उनकी पूजा करे। पहले अंगों की आराधना करके मङ्गल आदि की पूजा करनी चाहिए ॥९०-६३॥ इक्कीस कोष्ठों तथा त्रिकोणों में चक्र, आर और भूमिज की पूजा करके बाहर आठ मातृकाओं का पूजन करे । पुनः बाहर इन्द्र आदि देवों तथा उनके वज्र आदि आयुधों की पूजा करे और उनको धूप, दीप तथा पंजीरी समर्पित करे। शुद्ध जल से भरे हुए ताम्रपात्र में रक्तचन्दन, रक्तपुष्प, अक्षत और फल डालकर मङ्गल ग्रह को अर्घ्यं प्रदान करे । अर्घ्य मन्त्र यह है- 'भूमिपुत्र ! महातेजस्वी ! शंकर के स्वेद (पसीने) से उत्पन्न ! मैं पुत्र की कामना से आपकी शरण में आयी हूँ, यह अर्घ्य स्वीकार कीजिए, आपको नमस्कार है। लाल मूंगे के समान ! जपाकुसुम (अड़हुल) के सदृश ! भूमिपुत्र ! महाभाग ! अर्घ्यं ग्रहण कीजिए ! आपको नमस्कार है' ॥९४-६८॥ पूर्वोक्त इक्कीस नामों के आदि में ओं तथा अन्त में चतुर्थी विभक्ति और नमः शब्द जोड़कर (अर्थात् ओं मङ्गलाय नमः' इत्यादि कहकर) प्रणाम करे और इक्कीस बार प्रदक्षिणा करे (प्रदक्षिणा का मन्त्र-)'पृथ्वी के गर्भ से उत्पन्न, बिजली के तेज के समान प्रभा वाले, कुमार और हाथ में शक्ति (नामक अस्त्र) धारण करने वाले मङ्गल को प्रणाम करती हूँ' ॥६६-१००॥ तदनन्तर खैर की लकड़ी से तीन रेखायें खींचे और उनको एकाग्र होकर दो मन्त्र पढते हुए बायें पैर से मिटा दे (दोनों मन्त्र ये हैं-) दुःख और दौर्भाग्य के विनाश के लिए तथा पुत्र और संतान की प्राप्ति के लिए इन तीनों रेखाओं को मैं बायें पैर से मिटा रही हूँ। ऋण तथा दुःख को नष्ट करने के लिए और मनोवांछित फल की प्राप्ति के लिए मैं तीन जन्मों में उत्पन्न इन तीन काली रेखाओं