बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें५६७ एकोनषष्टितमोऽध्यायः ऋणदुःखविनाशाय मनोभीष्टार्थसिद्धये । मार्जयाम्यसिता रेखास्तिस्रो जन्मतयोद्भवः ॥१०३॥ स्तुवीत धरणीपुत्रं पुष्पांजलिकरस्ततः । ध्यायंतौ तत्पदाम्भोजं पूजासांगत्वसिद्धये ॥१०४॥ ऋणहर्त्रे नमस्तुभ्यं दुःखदारिद्र्यनाशिने । सौभाग्यसुखदो नित्यं भव मे धरणीसुत ॥१०५॥ तप्तकांचनसंकाश तरुणारुणसमप्रभ । सुखसौभाग्यधनद ऋणदारिद्र्यनाशक ॥१०६॥ ग्रहराज नमस्तेऽस्तु सर्वकल्याणकारक । प्रसादं कुरु देवेश सर्वकल्याणभाजन ॥१०७। देवदानवगन्धर्वयक्षराक्षसपन्नगाः । आप्नुवन्ति शिवं सर्वं सदा पूर्णमनोरथाः ॥१०८॥ आचिरादेव लोकेऽस्मिन्यस्याराधनतो जनाः । प्राप्नुवन्ति सुखं तस्मै नमो धरनिसूनवे ॥१०८॥ यो वक्रगतिमापन्नो नृणां दुखं प्रयच्छति । पूजितः सुखसौभाग्यं तस्मै क्ष्मासूनवे नमः ॥११०॥ नमसि द्योतमानाय सर्वकल्याणहेतवे । मङ्गलाय नमस्तुभ्यं धनसंतानहेतवे ॥१११॥ प्रसादं कुरु मे भौम मंगलप्रद मंगल । मेषवाहन रुद्रात्मन्देहि पुत्रान्धनं यशः ॥११२॥ एवं स्तुत्वा प्रणम्याथ विसृज्य धरणीसुतम् । यथाशक्त्या प्रदाय स्वं गृह्णीद्ब्राह्मणाशिषः ॥११३॥ गुरवे दक्षिणां दत्त्वा भुञ्जीयात्तन्निवेदितम् ॥११४॥ एवमावत्सरं कुर्यात्प्रतिमंगलवासरम् । तिलैर्होमं विधायाथशताद्धं भोजयेद्विजान् ॥११५॥ भौममूर्ति स्वण॔मपीमाचार्य्याय समर्पयेत् । मंडलस्थे घटेऽभ्यर्च्येतत्त्सौभाग्यसिद्धये ॥११६॥ एवं व्रतपरा नारी प्राप्नुयात्सुभगान्सुतान् । ऋणनाशाय वित्तार्थं व्रतं कुर्यात्पुमानपि ॥११७॥ ब्राह्मणः प्रजपेन्मन्त्रमग्निर्मूद्धेति वैदिकम् । अंगारकस्य गायत्रीं वक्ष्ये यजनसिद्धये ॥११८॥
को मिटा रही हूँ। तदनन्तर अंजलि में पुष्प लेकर सांगोपांग पूजन की फल-प्राप्ति के लिए मङ्गलग्रह के चरणारविन्द का ध्यान करते हुए उनकी स्तुति करे—'ऋण का हरण करने वाले ! तुम्हें नमस्कार है। दुःख और दरिद्रता नाश करने वाले ! तुम्हें नमस्कार है ! भूमिपुत्र ! मुझे नित्य सौभाग्य और सुख प्रदान कीजिए ॥१०१-१०५॥ तपे हुए सुवर्ण के समान ! तरुण सूर्य के समान ! सुख, सौभाग्य तथा धन देने वाले ! ऋण तथा दरिद्रता का नाश करने वाले ! ग्रहराज ! सबका कल्याण करने वाले ! आपको नमस्कार है। देवों के ईश ! समस्त कल्याणों के पात्र ! मुझपर कृपा कीजिए। आपकी आराधना से देव, दानव, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस तथा सर्प पूर्णमनोरथ होकर कल्याण प्राप्त करते हैं। इस लोक में मनुष्य आपकी आराधना से शीघ्र ही सुख प्राप्त कर लेते हैं ॥१०६-१०८½॥ हे धरती के पुत्र ! आपको नमस्कार है। जो (किसी की कुण्डली में अपनी दशा आने पर) वक्र गति को प्राप्त करने पर मनुष्यों को दुःख प्रदान करते हैं और पूजित होने पर सुख-सौभाग्य देते हैं, उस पृथ्वीपुत्र (मङ्गल) को नमस्कार है। आकाश में चमकने वाले और सकल कल्याणों तथा धन-सन्तानों के कारण रूप मङ्गल को नमस्कार है। हे भूमि-पुत्र ! मङ्गलदाता ! मङ्गल ! मुझ पर कृपा कीजिए। मेषवाहन (भेड़े की सवारी करने वाले) रुद्ररूप ! मुझे पुत्र, धन और यश प्रदान कीजिए ॥१०९-११२॥ इस प्रकार स्तुति करने के उपरान्त प्रणाम करके मङ्गल का विसर्जन करे और यथाशक्ति धन प्रदान कर ब्राह्मण से आशीर्वाद ले । फिर गुरु को दक्षिणा देकर उनकी आज्ञा से स्वयं भोजन करे। पुत्र एवं सौभाग्य की प्राप्ति के लिए मण्डल पर घटस्थापन तथा उस पर मङ्गल की अर्चना करे। इस प्रकार व्रतपरायण होने से नारी सुन्दर पुत्रों को प्राप्त करती है। ऋण चुकाने के लिए वित्त के वास्ते पुरुष भी व्रत करे। ब्राह्मण 'अग्निर्मूर्धा'— इस वैदिक मन्त्र का जप करे। अब मैं पूजन की सिद्धि के लिए मङ्गल का गायत्री-मन्त्र बताऊँगा ॥११३-११८॥