सामग्री पर जाएँ
भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 624, कुल 1008 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 624

१०५ सप्ततितमोऽध्यायः सर्वपापविनिर्मुक्तो ज्ञानवान् रोगवर्जितः । कुम्भं संस्थाप्य विधिवदापूर्यं शुद्धवारिणा ॥६६॥ जप्त्वायुतं ततस्तेनाभिषेकःसर्वरोगनुत् । चन्द्रसूर्यपरागे तु ह्युपोप्याष्टसहस्रकम् ॥६७॥ स्पृष्ट्वा ब्राह्मीघृतं जप्त्वा पिवेत्साधकत्तमः । मेधां कवित्वं वाक्सिद्धिं लभते नात्र संशयः ॥६८॥ जुहुयादयुतं बिल्वैर्महाधनपतिर्भवेत् । नारायणस्य मन्त्रोऽयं सर्वमन्त्रोत्तमोत्तमः ॥६६॥ आलयः सर्वसिद्धीनां कथितस्तव नारद । नारायणाय शब्दान्ते विद्महे पदमोरयेत् ॥७०॥ वासुदेवपदं ङेन्तं धीमहीति ततो वदेत् । तन्नो विष्णुः प्रचोवर्णान्संवदेच्चोदयादिति । ७१॥ एषोक्ता विष्णुपायत्री सर्वपापप्रणाशिनी । तारो हृद्भगवान् ङेन्तो वासुदेवाय कीर्तितः ॥७२॥ द्वादशार्णो महामन्त्रो मुक्तिमुक्तिप्रदायकः । स्त्रीशूद्राणां वितारोऽयं सतारस्तु द्विजन्मनाम् ॥७३॥ प्रजापतिर्मुनिश्वास्य गायत्री छन्द ईरितः । देवता वासुदेवस्तु बीजं शक्तिश्च वश्च हृत् ॥७४॥ चन्द्राक्षिवेदपञ्चार्णैः समस्तैर्नाङ्गकल्पनम् । मूर्ध्नि भाले दृशोरास्ये गले दोर्हृदये पुनः ॥७५॥ कुक्षौ नाभौ ध्वजे जानुद्वये पादद्वये तथा । न्यसेत्क्रमात् मन्त्रवर्णान्सृष्टिन्यासोऽयमीरितः ॥७६॥ हृदादिमस्तकान्तं तु स्थितिन्यासं प्रचक्षते । पादादारभ्य मूर्द्धानं न्यासं संहारकं विदुः ॥७७॥ तत्त्वन्यासं ततः कुर्यात्सर्वतन्त्रेषु गोपितम् । जीवं प्राणं तथा चित्तं हृत्पद्मं सूर्यमण्डलम् ॥७८॥ चन्द्राग्निमण्डले चैव वासुदेवं ततः परम् । संकर्षणं च प्रद्युम्नमनिरुद्धं ततः परम् ॥७६॥ नारायणं चक्रमतस्तत्त्वानि द्वादशैव तु । मूलार्णहृत्परायाद्यमात्मने हृदयांतिमम् ॥८०॥ स्थापित करके शुद्ध जल से उसे विधिपूर्वक भर दे । वहाँ दश हजार मन्त्र जप करने के उपरान्त उस जल से अभिषेक करने पर सब रोग दूर हो जाते हैं । चन्द्र-सूर्य-ग्रहणों में उपवास करके ब्राह्मीघृत का स्पर्श करने के उपरान्त आठ हजार बार मन्त्र का जप करे । अनन्तर श्रेष्ठ साधक उस घृत को पी ले । ऐसा करने से मेधा (धारणशक्ति), कवित्वशक्ति तथा वाक्सिद्धि प्राप्त होती है, इसमें सन्देह नहीं ॥६६-६८॥ यह नारायण मन्त्र सब मन्त्रों में उत्तम से उत्तम है । नारद ! यह सम्पूर्ण सिद्धियों का घर है । अतः मैंने तुम्हें इसका उपदेश किया है। 'नारायणाय' पद के अन्त में 'विद्महे' पद का उच्चारण करे फिर 'ङे' विभक्त्यन्त 'वासुदेव' पद (वासुदेवाय) का उच्चारण करे । उसके बाद 'धीमहि' पद बोले । अन्त में 'तन्नो विष्णुः प्रचोदयात्' इन अक्षरों का उच्चारण करे । यह (ओं नारायणाय विद्महे वासुदेवाय धीमहि तन्नो विष्णुः प्रचोदयात्) विष्णुपायत्री बतायी गई है, जो सब पापों का नाश करने वाली है । तार (ओं), हृदय (नमः), भगवत् शब्द का चतुर्थी विभक्ति में एकवचनान्त रूप (भगवते) तथा (वासुदेवाय) यह द्वादशाक्षर (ओं नमो भगवते वासुदेवाय) महामन्त्र कहा गया है, जो भोग- मोक्ष देने वाला है । स्त्री और शूद्रों को बिना प्रणव के यह मन्त्र जपना चाहिए और द्विजातियों के लिए प्रणव सहित इसके जपने का विधान है ॥६९-७३॥ इस मन्त्र के प्रजापति ऋषि, गायत्री छन्द, वासुदेव देवताओं, बीज और नमः शक्ति है ॥७४॥ इस मन्त्र के एक, दो, चार और पाँच अक्षरों तथा सम्पूर्ण मन्त्र द्वारा पञ्चांग न्यास करना चाहिए । मस्तक, ललाट, नेत्र, मुख, गला, बाँह, हृदय, पेट, नाभि, लिंग, दोनों घुटनों तथा दोनों चरणों में क्रमशः मन्त्रवर्णों का न्यास करे- यह सृष्टिन्यास कहा गया है । हृदय से लेकर मस्तक तक न्यास करना स्थितिन्यास कहलाता है । पैर से लेकर मस्तक तक न्यास करने को संहारक न्यास कहते हैं । तदनन्तर तत्त्वन्यास करना चाहिए, जो सब तन्त्रों में गुप्त है । जीव, प्राण, चित्त, हृदयकमल, सूर्यमण्डल, अग्निमण्डल, चन्द्रमण्डल, संकर्षण, प्रद्युम्न, अनिरुद्ध और नारायण- ये बारह तत्त्व हैं ॥७५-७९॥ मूल-मन्त्र के अक्षरों के उच्चारण के साथ 'पराय नमः' और 'हृदाय नमः' कह अपने नाम का उच्चारण करे और तदपश्चात् मस्तक आदि में क्रमशः न्यास करे । यहाँ भी पूर्वोक्त ध्यान ही करना चाहिए ।