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भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 623, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 623

यहाँ पृष्ठ की पंक्ति-दर-पंक्ति देवनागरी लिपि में प्रतिलिपि प्रस्तुत है:

६०४ नारदीयपुराणम् लोकेशानायुधैर्युक्तान्बहिः संपूजयेत्सुधीः । एवमावरणैर्युकतं योऽर्चयेद्विष्णुमव्ययम् ॥५१॥ भुङ्क्त्वेह सकलान्भोगानंते विष्णुपदं व्रजेत् । क्षेत्रधान्यसुवर्णानां प्राप्तये धरणीं स्मरेत् ॥५२॥ देवीं दूर्वादलश्यामां दधानां शालिमंजरीम् । चिंतयेद्भारतीं देवीं वीणापुस्तकधारिणीम् ॥५३॥ दक्षिणे देवदेवस्य पूर्णचंद्रनिभाननाम् । क्षीराब्धिफेनपुंजामे वसानां श्वेतवाससी ॥५४॥ भारत्या सहितं यो वै ध्यायेद्देवं परात्परम् । वेदवेदार्थतत्त्वज्ञो जायते सर्ववित्तमः ॥५५॥ नारसिंहमिवात्मानं देवं ध्यात्वातिभैरवम् । शस्त्रं संमंथ्य मंत्रेण शत्रून्हत्वा निवर्तते ॥५६॥ नारसिंहेन बीजेन मंत्रं संयोज्य साधकः । शतमष्टोत्तरं जप्त्वा वामहस्ताभिमंत्रिताः ॥५७॥ पुनः पुनरपः सिंचेत्सर्पदष्टोऽपि जीवति । गारुडेन च संयोज्यपंचार्णेन जपेत्तदा ॥५८॥ निर्विषीकरणे ध्यायेद्विष्णुं गरुडवाहनम् । अशोकफलके तार्क्ष्यमालिख्याशोकसंहतौ ॥५९॥ अशोकपुष्पैःसंपूज्य भगवंतं तदग्रतः । जुहुयात्तानि पुष्पाणि त्रिसंध्यं सप्तपत्रकम् ॥६०॥ प्रत्यक्षो जायते पक्षी वरमिष्टं प्रयच्छति । गाणपत्येन संयोज्य जपेल्लक्षं पयोव्रतः ॥६१॥ महागणपतिं देवं प्रत्यक्षमिव पश्यति । दाणीबीजेन संयुक्तं षण्मासं योजयेन्नरः ॥६२॥ महाकविवरो भूत्वा मोहयेत्सकलं जगत् । हुत्वा गुडूचीशकलान्यर्द्धांगुलमितानि च ॥६३॥ दधिमध्वाज्ययुक्तानि मृत्युं जयति साधकः । शनैश्चरदिने सम्यक् स्पृष्ट्वाश्वत्थं च पाणिना ॥६४॥ जप्त्वा चाष्टशतं युद्धे ह्यपमृत्युं जयत्यसौ । पञ्चविंशतिधा जप्त्वा नित्यं प्रातः पिवेज्जलम् ॥६५॥ लोक में सम्पूर्ण भोगों का उपभोग करके अन्त में भगवान् विष्णु के धाम को जाता है ॥५०-५११/२॥ खेत, धान्य और सुवर्ण की प्राप्ति के लिए धरणी देवी का चिन्तन करे। उनकी कान्ति दूर्वादल के समान श्याम है और वे अपने हाथों में धान की बाल लिए रहती हैं। देवाधिदेव भगवान् के दक्षिणभाग में पूर्णचन्द्रमा के समान मुखवाली वीणापुस्तक धारिणी सरस्वती देवी का चिन्तन करे। वे क्षीर सागर के फेनपुञ्ज की भाँति उज्ज्वल दो वस्त्र धारण करती हैं। जो सरस्वती देवी के साथ परात्पर भगवान् विष्णु का ध्यान करता है, वह वेद और वेदांगों का तत्त्वज्ञ तथा सर्वज्ञों में श्रेष्ठ होता है ॥५२-५५॥ आत्मा का अत्यन्त भयानक नरसिंहदेव के रूप में ध्यान करके शस्त्र को (नरसिंह) मन्त्र से अभिमन्त्रित करने वाला व्यक्ति शत्रुओं को मारकर लौट आता है ॥५६॥ साधक नरसिंह बीज से मन्त्र को संयोजित कर के एक सौ आठ बार जप कर बायें हाथ से अभिमंत्रित किये गये जल से बार-बार सिञ्चन करे । ऐसा करने से साँप का डसा हुआ प्राणी भी जी जाता है। उस समय गरुड़ मन्त्र से जोड़कर पंचाक्षर मन्त्र का जप करे ॥५७-५८॥ विष रहित करने में गरुड़वाहन (भगवान्) विष्णु का ध्यान करना चाहिए। अशोक के काष्ठ पर गरुड़ की मूर्ति लिखकर अशोकवन में अशोकपुष्पों से भगवान् का पूजन करके उनके आगे उन पुष्पों से तीनों संध्या सात-सात पत्ते हवन करे ॥५९-६०॥ ऐसा करने से गरुड़ प्रत्यक्ष होकर वर प्रदान करते हैं। नरसिंह मन्त्र को गणपति-मन्त्र से युक्त करके एक लाख जप करे और दुग्धाहार करके रहे। ऐसा करने से साधक महागणेश देव को प्रत्यक्ष देखता है। उक्त मन्त्र को वाणी-बीज से युक्त करके छह मास जप करने पर साधक महान् कवि होकर सम्पूर्ण जगत् को मोहित कर लेता है ॥६१-६२१/२॥ आधे अंगुल के बराबर गुडूच के टुकड़े काटकर दही, मधु और घी में बोरकर हवन करने से साधक मृत्यु को जीत लेता है। शनिवार के दिन हाथ से पीपलवृक्ष का भली भाँति स्पर्श करके आठ सौ बार मन्त्र जपने से युद्ध में साधक अपमृत्यु को जीत लेता है। नित्य प्रातःकाल पचीस बार इस मन्त्र को जपकर जल पीने से साधक सभी पापों से मुक्त होकर नीरोग तथा ज्ञानी होता है ॥६३-६५१/२॥ कलश