बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 622, कुल 1008 में से
संदर्भ में पढ़ेंमधुराक्तैः प्रजुहुयात्संसकृते हव्यवाहने । मंडूकात्परतत्त्वांत् पीठे संपुज्य यत्नतः ॥३८॥ विमलोत्कर्षिणी ज्ञाना क्रिया योगा ततः परा । प्रह्वी सत्या तथेशानानुग्रहा नवमी मता ॥४०॥ तारो नमो भगवते विष्णवे सर्वभू ततः । तात्मने वासुदेवाय सर्वात्मिति पदं वदेत् ॥४१॥ संयोगयोगपद्मांते पीठाय हृदयांतिमः । षड्विंशदक्षरः पीठमंत्रोऽनेनासनं दिशेत् ॥४२॥ मूर्ति संकल्प्य मूलेन तस्यामावाह्य पूजयेत् । आदौ चांगानि संपूर्ज्य मंत्राणां केशरेषु च ॥४३॥ प्रागादिदिग्दले वासुदेवं संकर्षणं तथा । प्रद्युम्नमनिरुद्धं च शक्तीः कोणेष्वथाच॑येत् ॥४४॥ शांति श्रियं सरस्वत्या रति संपूजयेत्क्रमात् । हेमपोततमालेंद्रनीलामाः पीतवाससः ॥४५॥ चतुर्भुजाः शंखचक्रगदांभोजधरा इमे । सितकांचनगोगुग्धदूर्वावर्णश्च शक्तयः ॥४६॥ दलाग्रेषु चक्रशंखगदापंकजकौस्तुभान् । पूजयेन्मुसलं खङ्गं वनमालां यथाक्रमात् ॥४७॥ रक्ताजपीतकनकश्यामकृष्णसितार्जुनान् । कुंकुमाभं समभ्यर्चेद्बहिरग्रे खगेश्वरम् ॥४८॥ पार्श्वयोः पूजयेत्पश्चाच्छंखपद्मनिधी क्रमात् । मुक्तामाणिक्यसंकाशौ पश्चिमे ध्वजमर्चयेत् ॥४९॥ रक्तं विघ्नं तथाग्नये श्याममार्यं च राक्षसे । दुर्गां श्यामां वायुकोणे सेनान्यं पीतमेश्वरे ॥५०॥ को प्राप्त होता है। इस प्रकार जप करके विद्वान् पुरुष मधुराक्त कमलों द्वारा मन्त्रसंस्कृत अग्नि में दशांश होम करे । मण्डूक से लेकर परतत्त्व पर्यन्त सब का पीठ पर यत्नपूर्वक पूजन करे ॥३७-३९॥ विमला, उत्कर्षिणी, ज्ञाना, क्रिया, योगा, प्रह्वी, सत्या, ईशान तथा नवीं अनुग्रहा—ये नौ पीठशक्तियाँ हैं ॥४०॥ (इन सबका पूजन करना चाहिए)। इसके बाद 'ओं नमो भगवते विष्णवे सर्वभूतात्मने वासुदेवाय सर्वात्मसंयोगपद्मपीठाय नमः' यह छत्तीस अक्षर का पीठमन्त्र है, इससे भगवान् को आसन देना चाहिए। मूल-मन्त्र से मूर्तिनिर्माण कर के उसमें भगवान् का आवाहन करके पूजा करे। पहले कमल के केसरों में मन्त्र सम्बन्धी छह अंगों का पूजन करना चाहिए। इसके बाद अष्टदल कमल के पूर्व आदि दलों में क्रमशः वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न तथा अनिरुद्ध का और आग्नेय आदि कोणों में क्रमशः उनकी शक्तियों का पूजन करे ॥४१-४४॥ उनके नाम इस प्रकार हैं—शान्ति, श्री, रति तथा सरस्वती । इनकी क्रमशः पूजा करनी चाहिए। वासुदेव की अंगकान्ति सुवर्ण के समान है। संकर्षण पीत वर्ण के हैं। प्रद्युम्न तमाल के समान श्याम और अनिरुद्ध इन्द्रनील मणि के सदृश हैं। ये सबके सब पीताम्बर धारण करते हैं। इनके चार भुजायें हैं। ये शंख, चक्र, गदा और कमल धारण करने वाले हैं। शान्ति का वर्ण श्वेत, श्री का वर्ण सुवर्ण-गौर, सरस्वती का रंग गोदुग्ध के समान उज्ज्वल तथा रति का वर्ण दूर्वादल के समान श्याम है। इस प्रकार ये सब शक्तियां हैं। कमल-दलों के अग्रभाग में चक्र, शंख, गदा, कमल, कौस्तुभमणि, मुसल, खड्ग और वनमाला का क्रमशः पूजन करे ॥४५-४७॥ चक्र का रंग लाल, शंख का रंग चन्द्रमा के समान श्वेत, गदा का पीला, कमल का सुवर्ण के समान, कौस्तुभ का श्याम, मुसल का काला, तलवार का श्वेत और वनमाला का उज्ज्वल है। इनके बाह्यभाग में भगवान् के सम्मुख हाथ जोड़कर खड़े हुए कुंकुम वर्ण वाले पक्षिराज गरुड़ का पूजन करे। तत्पश्चात् क्रमशः दक्षिण पार्श्व में शंख-निधि और वाम पार्श्व में पद्मनिधि की पूजा करे। इनका वर्ण क्रमशः मोती और माणिक्य के समान है। पश्चिम में ध्वज की पूजा करे ॥४८-४९॥ अग्निकोण में रक्तवर्ण के विघ्न (गणेश) का, नैर्ऋत्यकोण में श्याम वर्ण वाले आर्य का, वायव्यकोण में श्याम वर्ण दुर्गा का तथा ईशानकोण में पीतवर्ण के सेनानी का पूजन करना चाहिए। इनके बाह्यभाग में विद्वान् पुरुष इन्द्र आदि लोकपालों का उनके आयुधों सहित पूजन करे। जो इस प्रकार आवरणों सहित अविनाशी भगवान् विष्णु का पूजन करता है, वह इस