बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 609, कुल 1008 में से
संदर्भ में पढ़ेंएकोनसप्ततितमोऽध्यायः
सनत्कुमार उवाच
अथ वक्ष्ये त्रयीमूर्तेर्विधानं त्वब्जिनोपतेः । मन्त्राणां यत्समाराध्य सर्वेष्टं प्राप्नुयाद्भुवि ॥१॥ तारो रेचिकया युक्तो मेधानेत्रयुता रतिः । ससर्गा वामकर्णढिचो भृगुर्वढचासनो मरुत् ॥२॥ शेषोदित्य इति प्रोक्तो वस्वर्णो भुक्तिमुक्तिदः । देवभागो मुनिश्चन्दो गायत्री देवता रविः ॥३॥ माया बीजं रमा शक्तिदृष्टादृष्टे नियोगकः । सत्याय हृदयं पश्चाद्ब्रह्मणे शिर ईरितम् ॥४॥ विष्णवे तु शिखावर्मं रुद्राय परिकीर्तितम् । नेत्रं स्यादग्नये पश्चाच्छर्वायास्वमुदाहृतम् ॥५॥ नेत्रो ज्वाला मनो हूं फट् स्वाहांता मनवो गणाः । पुनः षडंगैर्ह्रीं लक्ष्म्याः कृत्वांतःस्थैः षडंगकम् ॥६॥ शिष्टारौजठरे पृष्ठे तयोर्डेन्ताख्यया न्यसेत् । आदित्यं च रविं पश्चाद्भानुं भास्करमेव च ॥७॥ सूर्य च मूर्ध्नि वदने हृदि गुह्ये च पादयोः । सद्यादिपञ्च ह्रस्वाद्यान् न्यसेन्ङे हृदयोंऽतिमान् ॥८॥ ह्रीं रमामध्यगामष्टौ वर्णांस्तारादिकान्न्यसेत् । मूर्द्धास्यकंठहृत्कुक्षिनाभिलिंगगुदेषु च ॥९॥ सचंद्रस्वरपूर्वं तु ङेतं शीतांशुमण्डलम् । मूर्द्धादिकंठपर्यंतं न्यसेच्चांद्रिमनुस्मरन् ॥१०॥ स्पर्शान्सेंदून्समुच्चार्य ङेतं भास्करमण्डलम् । न्यसेत्कंठादिनाभ्यंतं ध्यायन्प्रद्योतनं हृदि ॥११॥ यादोन्सचंद्रानुच्चार्य ङेतं च वह्निमण्डलम् । नाभ्यादिपादपर्यन्तं न्यसेद्वह्निमनुस्मरन् ॥१२॥ प्रोक्तोऽयं मण्डलन्यासो महातेजोविधायकः । आदिठांतार्णपूर्वं ङेनमोंतं सोममण्डलम् ॥१३॥
सनत्कुमार बोले—अब मैं वेदमूर्ति अब्जिनीपति (सूर्य) के पूजन का विधान बताऊंगा, जिनके मन्त्रों की आराधना करके मनुष्य पृथ्वी पर सकल कामनाओं को प्राप्त करता है । तारोरेचिकया......यह सूर्य का मन्त्र है । इसका मुनि देवभाग, छंद गायत्री और देवता सूर्य है, मायाबीज है (ह्रीं), रमा शक्ति (श्रीं) और दृष्ट तथा अदृष्ट फल में इसका नियोग किया जाता है । (मन्त्र बनेगा—ह्रीं श्रीं सत्याय नमः, ब्रह्मणे स्वाहा, विष्णवे वषट्, रुद्राय हुं, अग्नये वौषट्, शर्वाय फट्) । नेत्र (इ), ज्वाला, (रं) मनु (औ), हुँ फट् स्वाहा-इनको जोड़कर मन्त्र बनाये जाते हैं । पुनः अन्तःस्थ छह वर्णों के साथ ह्रीं और श्रीं को जोड़कर षडंग मन्त्र की रचना करनी चाहिए । शिष्ट और अरि में नमः जोड़कर पेट और पीठ पर उनका न्यास करना चाहिए ॥१-६॥ पश्चात् आदित्य, रवि, भानु, भास्कर तथा सूर्य का मस्तक, मुख, हृदय, गुह्य स्थान तथा दोनों चरणों में न्यास करे । सद्य (ओ) आदि पांच वर्णों से पहले एक ह्रस्व वर्ण हो, अन्त में नमः हो अथवा श्रीं के बाद ह्रीं को रखकर उक्त आठ वर्णों का मस्तक, मुख, कंठ, पेट, नाभि, लिंग तथा गुदा में न्यास करे । पूर्व में चन्द्रस्वर और अंत में चतुर्थी विभक्ति से युक्त चन्द्र-मण्डल का मस्तक से कंठ तक न्यास करे और चन्द्रमा के मन्त्र का स्मरण करे ॥७-१०॥ अनुस्वार युक्त स्पर्श वर्णों का उच्चारण करके अन्त में चतुर्थी विभक्ति से युक्त सूर्यमण्डल का कंठ से नाभि तक न्यास करे और हृदय में सूर्य का ध्यान करे । फिर आदि में य से युक्त तथा अनुस्वार सहित वर्णों का उच्चारण करके अन्त में चतुर्थी विभक्ति से युक्त अग्निमण्डल का नाभि से पैर तक न्यास करे और अग्नि-मन्त्र का स्मरण करे ॥११-१२॥ यह महातेज बढ़ाने वाला मण्डलन्यास मैंने बता दिया । उत्तम साधक आदि में ठ ओर त वर्णों से युक्त