बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 61, कुल 1008 में से
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४२ नारदीयपुराणम् ब्रह्महत्यादिपापानां प्रोक्ता निष्कृतिरुत्तमैः । दम्भिनो निन्दकस्यापि भ्रूणघ्नस्य न निष्कृतिः ॥५३॥ नास्तिकस्य कृतघ्नस्य धर्मोपेक्षाकरस्य च। विश्वासघातकस्यापि निष्कृतिर्नास्ति सुव्रते ॥५४॥ तस्मादेतन्महत्पापं कर्तुं नार्हसि शोभने । यदेतद् दुःखमुत्पन्नं तत्सर्वं शान्तिमेष्यति ॥५५॥ इत्युक्ता मुनिना साध्वी विश्वस्य तदनुग्रहम् । विललापातिदुःखार्ता निगृह्यचरणौ मुनेः ॥५६॥ और्वोऽपि तां पुनः प्राह सर्वशास्त्रार्थकोविदः । मारोदीराजतनये श्रियमग्रे गमिष्यसि ॥५७॥ मा मुंचाश्रु महाभागे प्रेतो दाह्योऽद्य सज्जनैः । तस्माच्छोकं परित्यज्य कुरु कालोचितां क्रियाम् ॥५८॥ पंडिते वापि मूर्खे वा दरिद्रे वा श्रियान्विते । दुर्वृत्ते वा सुवृत्ते वा मृत्योः सर्वत्र तुल्यता ॥५९॥ नगरे वा तथा मन्ये दैन्यमत्रातिरिच्यते ॥६०॥ यद्यत्पुरातनं कर्म तत्तदेव ह युज्यते । कारणं दैवमेवात्र मन्ये सोपाधिका जनाः ॥६१॥ गर्भे वा बाल्यभावे वा यौवने वापि वार्धके । मृत्योर्वशे प्रयातव्यं जन्तुभिः कमलानने ॥६२॥ हन्ति पाति च गोविन्दो जन्तूनकर्मवशे स्थितान् । प्रवादं रोपयन्त्यज्ञा हेतुमात्रेषु जन्तुषु ॥६३॥ तस्माद्दुःखं परित्यज्य सुखिनी भव सुव्रते । कुरु पत्युश्च कर्माणि विवेकेन स्थिरा भव ॥६४॥ एतच्छरीरं दुःखानां व्याधीनामुयुतैर्वृतम् । सुखाभासं बहुक्लेशं कर्मपाशेन यन्त्रितम् ॥६५॥ इत्याश्वास्य महाबुद्धिस्तया कार्याण्यकारयत् । त्यक्तशोका च सा तन्वी नता प्राह मुनीश्वरम् ॥६६॥ किमात्र चित्रं यत्सन्तः परार्थफलकांक्षिणः । नहि द्रुमाश्च भोगार्थं फलन्ति जगतीतले ॥६७॥
रजोदर्शन न होता हो और जो ऋतुमती हो उसको सती होने के लिए शास्त्र आज्ञा नहीं देता है । महान् व्यक्तियों ने ब्रह्महत्या आदि पापों के लिए प्रायश्चित्त कहा है; परन्तु पाखण्डी, परनिन्दक, और भ्रूणहत्या करने वालों का प्रायश्चित्त नहीं है । सुव्रते ! नास्तिक, कृतघ्न, धर्म की उपेक्षा करने वाले और विश्वासघात करने वाले के पापों का भी प्रायश्चित्त नहीं है । इसलिए शोभने ! तुम इस महापाप को करने का साहस मत करो । जो यह विपत्तियां आई हुई हैं सब दूर हो जायेंगी ॥५१-५५॥ मुनि की इन बातों को सुनकर उनके अनुग्रह पर उस साध्वी को विश्वास हुआ । परन्तु दुःख से व्याकुल वह मुनि के चरण पकड़ कर विलाप करने लगी । तब सब शास्त्रों के मर्मज्ञ मुनि और्व पुनः उसको सान्त्वना देते हुए बोले-राजकुमारी ! मत रोओ । तुम भविष्य में कल्याण प्राप्त करोगी । महाभाग्यशालिनी ! आंसू मत बहाओ । देखो, इस समय सज्जनों के आदेशानुसार इस प्रेत की दाह क्रिया करो । तुम लौकिक मोह छोड़कर कालोचित क्रिया करो । मृत्यु पण्डित, मूर्ख, दरिद्र, धनी, आचार-हीन या सदाचारी, नगर में हो या वन में सबको समान दृष्टि से देखती है । यहाँ दैन्य अधिक है, ऐसा मानता हूँ, परन्तु इसमें किसी का दोष नहीं । मनुष्य के जो पूर्वजन्म के कर्म हैं वे ही यहाँ प्राप्त होते हैं । संसार में प्रत्येक कार्य का कारण दैव ही है । मनुष्य केवल निमित्त मात्र या बहाने हैं ॥५६-६१॥ कमल के समान सुन्दर मुख वाली ! चाहे प्राणी गर्भ में रहे या बालक या युवा या बुड्ढा कोई भी हो परन्तु काल वश वह मृत्यु का ग्रास बनता ही है । गोविन्द ही अपने कर्म के बन्धन में बँधे प्राणियों की रक्षा या नाश करते हैं । वे मूर्ख हैं जो निमित्त मात्र बने दूसरों को दोष लगाते हैं । सुव्रते ! इसलिए दुःख को छोड़कर शान्त हो जाओ । अपने विवेक से शान्त होकर पति की अन्त्येष्टि क्रिया करो । अपने कर्म के बन्धनों से बँधा यह शरीर असंख्य व्याधियों से घिरा है। इसको बहुत क्लेश के बाद सुख नहीं प्रत्युत केवल सुख का आभास मिलता है ॥६२-६५॥ इस प्रकार ज्ञानी मुनि ने उसको ढाढस बँधा कर उसके द्वारा सारी प्रेत-क्रिया कराई । स्वयं आश्वासन पाकर इस कोमलाङ्गी रानी ने नम्र होकर मुनीश्वर से कहा- यदि सज्जन परोपकार को ही अपने जीवन का उद्देश्य समझते हैं तो इसमें आश्चर्य ही क्या है ? इस भूतल पर वृक्ष स्वयं अपने भोग के लिए नहीं फलते हैं ! जो दूसरों को दुःखी जानकर