भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

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पृष्ठ 62

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सप्तमोऽध्यायः ४३ योऽन्यदुःखानि विज्ञाय साधुवाक्यैः प्रबोधयेत् । स एव विष्णुस्सत्त्वस्थो यतः परहिते स्थितः ॥६८॥ अन्य दुःखेन यो दुःखी योऽन्यहर्षेण हर्षितः । स एव जगतामीशो नररूपधरो हरिः ॥६६॥ सद्भिः श्रुतानि शास्त्राणि परदुःखविमुक्तये । सर्वेषां दुःखनाशाय इति सन्तो वदन्ति हि ॥७०॥ यत्र सन्तः प्रवर्त्तन्ते तत्र दुःखं न बाधते । वर्तते यत्र मार्तण्डः कथं तत्र तमो भवेत् ॥७१॥ इत्येवं वादिनी सा तु स्वपत्युश्चापराः क्रियाः । चकार तत्सरस्तीरे मुनिप्रोक्तविधानतः ॥७२॥ स्थिते तत्र मुनौ राजा देवराडिव संज्वलन् । चितामध्याद्विनिष्क्रम्य विमानवरमास्थितः ॥ प्रपेदे परसं धाम नत्वा चौर्वं मुनीश्वरम् ॥७३॥ महापातकयुक्ता वा युक्ता वा चोपपातकैः । परं पदं प्रयान्त्येव महद्भिरवलोकिताः ॥७४॥ कलेवरं वा तद्भस्म तद्धूमं वापि सत्तम । यदि पश्यति पुण्यात्मा स प्रयाति परां गतिम् ॥७५॥ पत्युः कृतक्रिया सा तु गत्वाश्रमपदं मुनेः । चकार तस्य शुश्रूषां सपत्नया सह नारद ॥७६॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे प्रथमपादे गङ्गामाहात्म्ये नाम सप्तमोऽध्यायः ॥७॥ अपने उचित और प्रिय वचनों से ढाढस बँधाता है वही मानवरूप में विष्णु हैं, क्योंकि वह परोपकार में लीन है ॥६६-६६॥ जो दूसरे के दुःख को देखकर दुःखी होता है और सुखी देखकर स्वयं सुखी होता है वह मनुष्य नहीं प्रत्युत मनुष्यरूपधारी संसार का पालक हरि हैं। सज्जनों के मुख से सुने गए शास्त्र दूसरों के दुःख दूर करने में कारण बनते हैं परन्तु सज्जन सबके दुःखों के नाश के कारण होते हैं, ऐसा कहा जाता है। जहाँ सज्जन रहते हैं वहाँ दुःखों से बाधा नहीं पहुँचती; क्योंकि जहाँ स्वयं सूर्य विद्यमान है वहाँ अन्धकार कैसे टिक सकता है ? इस प्रकार मुनि की स्तुति करने के बाद उस रानी ने मुनि की बतायी हुई विधि के अनुसार उस सरोवर के तट पर अपने पति की श्राद्ध-क्रिया सम्पन्न की ॥७०-७२॥ उस मुनि की उपस्थिति में ही वह राजा इन्द्र के समान जाज्वल्यमान शरीर धारण कर उस चिता-भस्म से निकला और मुनीश्वर को प्रणाम कर उत्तम विमान पर आरूढ़ होकर परम धाम को चला गया । चाहे महापापी हो या उपपापों का करने वाला हो परन्तु वह सज्जनों की पावन दृष्टि के पड़ते ही परम पद को पा जाता है । सज्जन-श्रेष्ठ ! केवल शव-शरीर, भस्म अथवा चिता धूम को भी यदि सज्जन देख लें तो भी वह मृत प्राणी परम पद को पा जाता है। नारद ! इस प्रकार अपने पति की श्राद्ध क्रिया समाप्त कर वह रानी अपनी सौत के साथ मुनि के आश्रम में गई और मुनि की सेवा में रत रह कर दिन बिताने लगी ॥७३-७७॥ श्रीनारदीयमहापुराण में गंगामाहात्म्यप्रकरण में बाहु का मृत्यु वर्णन नामक सातवाँ अध्याय समाप्त ॥७॥