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भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 629, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 629

६१० नारदीयपुराणम् निवृत्तिश्च प्रतिष्ठा च विद्यानां तैश्च तत्कलाः । इंद्राद्यानपि वज्रादीन्पूजयेत्तदनंतरम् ॥१४३॥ एवं सिद्धे मनो मंत्री साधयेदिष्टमात्मनः । धरणीं प्रभजन्नेवं पशुरत्नांबरादिभिः ॥१४४॥ धरण्या वल्लभः स स्यात्सुखी जीवेच्छतं समाः । त्रैलोक्यमोहनो मंत्रो जगन्नाथस्य कीर्त्यते ॥१४५॥ तारः कामो रमा बीजं हृदंते पुरुषोत्तमः । श्रीकंठः प्रतिरूपांते लक्ष्मोति च निवासि च ॥१४६॥ सकलांते जगत्पश्चात्क्षोभणेति पदं वदेत् । सर्वस्त्रीहृदयांते तु विदारणपदं वदेत् ॥१४७॥ ततस्त्रिभुवनांतं तु मदोन्मादकरेति च । सुरासुरांते मनुजसुंदरीजनवर्णतः ॥१४८॥ मनांसि तापयद्वंद्वं दीपयद्वितयं ततः । शोषयद्वितयं पश्चान्म मारयद्वितयं ततः ॥१४९॥ स्तंभयद्वितयं भूयो मोहयद्वितयं ततः । द्रावयद्वितयं तावदाकर्षयुगं ततः ॥१५०॥ समस्तपरमो येन सुभगेन च संयुक्तम् । सर्वसौभाग्यशब्दांते करसर्वपदं वदेत् ॥१५१॥ कामप्रदादमुन्ब्रह्मासेंदुईनुयुगं ततः । चक्रेण गदया पश्चात्खड्गेन तदनंतरम् ॥१५२॥ सर्वबाणैर्भेदियुगं पाशेनांते कटद्वयम् । अंकुशेनेति संप्रोच्य ताडयद्वितयं पुनः ॥१५३॥ कुरुशब्दद्वयमथो कि तिष्ठसि पदं वदेत् । तावद्यावत्पदस्यांते समाहितमनंतरम् ॥ ततो मे सिद्धिरामास्यमवमन्ते च वर्म फट् ॥१५४॥ हृदंतोऽयं महामंत्रो द्विशताणंः समीरिताः । जैमिनिर्मु निरस्योक्तश्छंदश्चामितमीरितम् ॥१५५॥ देवता जगतां मोहे जगन्नाथः प्रकीर्तितः । कामो बीजं रमा शक्तिर्विनियोगोऽखिलाप्तये ॥१५६॥ पुरुषोत्तमत्रिभुवनोन्मादकातेऽग्निवमं च । हृदयं कीर्तितं पश्चाज्जगत्क्षोभणशब्दतः ॥१५७॥ लक्ष्मीदयितवर्मान्तः शिरः प्रोक्तं शिखा पुनः । मन्मथो तमशब्दांते मंगजे पदमीरयेत् ॥१५८॥ कामदायेति हुं प्रोच्य न्यसेद्वर्म ततः परम् । परमांते मृगकर्णाभ्यां च सर्वं पदं ततः ॥१५९॥ सौभाग्यकरवर्मा'ते कवचं परिकीर्तितम् । सुरासुरांते मनुजसुंदरीति पदं वदेत् ॥१६०॥ हृदयांते विदा पश्चाद्रणसर्वपदं वदेत् । ततः प्रहरणधरसर्वकामुकतत्पवम् ॥१६१॥ और विद्या उनकी कलायें हैं । अनन्तर इन्द्र आदि देवों और वज्र आदि आयुधों का पूजन करे । इस प्रकार मंत्र सिद्ध हो जाने पर साधक की अपनी कामना सफल होती है । जो पशु, रत्न तथा वस्त्र आदि से इस प्रकार पृथ्वी की आराधना करता है, वह पृथ्वी का स्वामी तथा सुखी होकर सौ वर्षों तक जीवित रहता है ॥१३५-१४४३॥ अब मैं जगन्नाथ का त्रैलोक्यमोहनो मंत्र बता रहा हूँ-'तार (ओं), काम (क्लीं), रमा (श्रीं) पुरुषोत्तमाय नमः' श्रीकण्ठप्रतिरूप, लक्ष्मोनिवास, सकलजगत्क्षोभण, सर्वस्त्रीहृदयविदारण, त्रिभुवनमदोन्मादकर, सुरासुर- मनुजसुन्दरीवणंतः मनांसि तापय तापय शोषय शोषय, मारय, मारय स्तम्भय स्तम्भय, भूयो मोहय-मोहय, द्रावय द्रावय, आकर्षय आकर्षय, सर्वसौभाग्यकर, कामप्रद अमुषु ब्रह्मा हनुं हनुं चक्रेण, गदया, खड्गेन, सर्वबाणैः भेदय भेदय, पाशेन अंकुशेन कटद्वयं ताडय ताडय, शब्दं कुरु शब्दं कुरु, किं तिष्ठसि तावत्-यावत् समाहितम्, मे सिद्धिराभास्यभवम् हुं फट् नमः' । यह दो सो अक्षरों का महामंत्र कहा गया है ॥१४५-१५४३॥ इस मंत्र के मुनि जैमिनी हैं, छंद अमित है, देवता जगन्नाथ हैं, क्लीं बीज है, श्रीं शक्ति है और अखिल वस्तु की प्राप्ति के लिए इसका विनियोग किया जाता है । पुरुषोत्तमत्रिभुवनोन्मादक अग्निवर्म--यह हृदयमंत्र कहा गया है । जगत्क्षोभण लक्ष्मीदयितवर्म--यह शिरो मंत्र कहा गया है। मन्मथः - यह शिखा-मंत्र है। इसके अन्त में 'मंगजे' पद का उच्चारण करे । फिर 'कामदाय हुम्' कहकर कवच का न्यास करे । परमभृगकर्णसर्वसौभाग्यकरवर्म-यह कवच- मंत्र कहा गया है । इसके अन्त में सुरासुरमनुजसुन्दरीहृदयवित्--और पश्चात् रणसर्वप्रहरणधरसर्वकामुक हन हन हृदयं