बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें६११ सप्ततितमोऽध्यायः हन्द्युग्मं च हृदयं बंधनानि ततो वदेत् । आकर्षयद्वयं पश्चान्महाबलपदं ततः ॥१६२॥ वर्म चास्त्रं समाख्यातं नेत्रं स्यात्तदनंतरम् । वदेत्त्रिभुवनं पश्चाच्चर सर्वजनेति च ॥१६३॥ मनांसि हरयुग्मांते दारयद्वितयं च मे। वशमानय वर्मन्ति नेत्रमंत्रः समीरितः ॥१६४॥ षडंगमंत्रास्ताराद्याः फटनमोंताः प्रकीर्तिताः । तारस्त्रैलोक्यशब्दांते मोहनेति पदं वदेत् ॥१६५॥ हृषीकेशेति संप्रोच्याप्रतिरूपादिमन्मथं सर्वस्त्रीणां हृदयमीरयेत् ॥१६६॥ आकर्ष णपदा गच्छेदागच्छहृदयांतिमः । अनेन व्यापकं कृत्वा जगन्नाथं स्मरेत् सुधीः ॥१६७॥ क्षीराब्धेस्तु तटे रम्यं सुरद्रुमलतांचितम् । उद्यदर्कमुजालाभं'स्वधाम्नोज्जवालदिङ्मुखम् ॥१६८॥ प्रसुनावलिसौरभ्यमाद्यन्मधुकरारवम् । दिव्यवातोच्चलत्कंजपरागोधूलितांबरम् ॥१६६॥ स्वबंधूगीतमाधुर्याभिराम चिंतयेद्वनम् । तदंतर्मणिसम्पत्तिस्फुरत्तोरणमण्डपे ॥१७०॥ विलसन्मौक्तिकोद्दामदामराजद्वितानके । मणिवेद्यादिविव्यर्तिकरीटाग्रसमर्चिते ॥१७१॥ दिव्यसिंहासने विप्र समासीनं स्मरेद्विभुम् । शंखपाशेषु चापानि मुसलं नंदकं गदाम् ॥१७२॥ अंकुशं दधतं दोर्भिः श्लिष्टे कमलयोरसि । पश्यत्यंकस्थयांभोजश्रिया रागोल्लसद्दशा ॥१७३॥ ध्यात्वैवं प्रजपेल्लक्षचतुष्कं तद्दशांशतः । कुंडेऽर्द्धचंद्रे पद्मैर्वा जातीपुष्पैश्च होमयेत् ॥१७४॥ यागभूमि तथात्मानं यागोपकरणं तथा । पूजयिष्यन् जगन्नाथं गायत्र्या प्रोक्षयेद्बुधः ॥१७५॥ त्रैलोक्यमोहनायांते विद्महे पदमीरयेत् । स्मराय धीमहीत्युक्त्वा तन्नो विष्णुः प्रचोदयात् ॥१७६॥ गायत्र्येषा समाख्याता सर्वशुद्धिकरी परा । कल्पयेदासनं पीठे पूर्वोक्ते वैष्णवे सुधीः ॥१७७॥ बन्धनानि आकर्षय आकर्षय महाबलाय हुं--यह अस्त्र मंत्र कहा गया है। अनन्तर नेत्र-मंत्र होगा ॥१६५-१६२३॥ त्रिभुवनं चर, सर्वजनमनांसि हर हर दारय दारय वशमानय हुं-- यह नेत्र-मंत्र कहा गया है। आदि में ओं और अन्त में फट् लगाकर षडंग मंत्र बनाये जाते हैं। ओं त्रैलोक्यमोहन हृषीकेश अप्रतिरूपमन्मथ सर्वस्त्रीहृदयमाकर्षय गच्छ- दागच्छ नमः--इस मंत्र से व्यापक न्यास करके विद्वान् व्यक्ति जगन्नाथ का स्मरण करे ॥१६३-१६७॥ क्षीरसागर के तट पर एक रमणीय वन है । वहाँ देववृक्ष तथा कल्पलतायें फैल रही हैं। उगते हुए सूर्य की किरणें पहुँच रही हैं । वह अपने तेज की ज्वालाओं से दिशाओं को व्याप्त कर रहा है। वहाँ पुष्प-समूह की सुगंध से उन्मत्त होते हुए भौंरे गूंज रहे हैं । दिव्य वायु से हिलते हुए कमलों के पराग से आकाश उधूलित हो रहा है। अप्सराओं के गीत के माधुर्य से वह (वन) मनोरम लग रहा है । उसके बीच में मणि-सम्पदाओं से चमकते हुए बंदनवार वाले मण्डप में चमकती हुई मोतियों की मालाओं से शोभायमान वितान, (चंदवा) से युक्त ओर मणिजटित देव-मुकुटों के अग्रभाग से पूजित दिव्यसिंहासन पर बैठे हुए भगवान् (जगन्नाथ) का ध्यान करना चाहिए । वे हाथों में शंख, पाश, बाण, धनुष, मुसल, नन्दक, गदा तथा अंकुश धारण किये हुए हैं । उनका वक्षःस्थल लक्ष्मी से आलिंगित है । वे अंकस्थ कमल (माला) की श्री से लाल नेत्रों से देख रहे हैं ॥१६८-१७३॥ इस प्रकार ध्यान कर एक लाख मंत्र-जप करे और उसका दशांश अर्धचन्द्राकार कुण्ड में कमलों तथा जातीपुष्पों से हवन करे । अनन्तर विद्वान् जगन्नाथ की पूजा करने के लिए यज्ञभूमि, यज्ञसामग्री तथा अपने शरीर पर गायत्री मन्त्र से जल छिड़के । 'त्रैलोक्यमोहनाय विद्महे स्मराय धीमहि तन्नो विष्णुः प्रचोदयात्' यह गायत्री मन्त्र सबको शुद्ध करने में श्रेष्ठ है। विद्वान् व्यक्ति पूर्वोक्त वैष्णव पीठ पर आसन की रचना करे ॥१७४-१७७॥