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भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 631, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 631

६१२ नारदीयपुराणम्

पक्षिराजाय ठद्वन्द्वं पीठमंत्रोऽयमीरितः । मूर्ति संकल्पमूलेन तस्यामावाहयेदतः ॥१७७॥ व्यापकन्यासमंत्रेण ततः सम्पूज्य भक्तितः । श्रीवत्सहृदयं तेन श्रीवत्सं स्तनयोर्यजेत् ॥१७८॥ कौस्तुभाय हृदंतेन यजेद्वक्षसि कौस्तुभम् । पूजयेद्वनमालायै हृदंतेन गले च ताम् ॥१७९॥ कर्णिकायां ततोऽभ्यर्च्यद्विधिवच्चांगदेवताः । दलेषु पूजयेत्पश्चाल्लक्ष्म्याद्यावृतचामराः ॥१८१॥ बन्धूककुसुमाभासो मुक्ताहारलसत्कुचाः । उत्फुल्लांभोजनयना मदविभ्रममंथराः ॥१८२॥ लक्ष्मी सरस्वती चैव धृतिः प्रीतिस्ततः परम् । कांतिः शांतिस्तुष्टिपुष्टिर्बोजाद्या ङेनमोंतिकाः ॥१८३॥ भृगुः खङ्गाशचन्द्राढयो देव्या बीजमुदाहृतम् । ह्रस्वत्रयक्लीबस्वर्रहितस्वरसंयुतम् ॥१८४॥ देव्या बीजं क्रमादासामादौ च विनियोजयेत् । दलाग्रेषु यजेच्छंखं शाङ्गं चक्रमसिं गदाम् ॥१८५॥ अंकुशं मुसलं पाशं स्वमुद्रामनुभिः पृथक् । महाजलचरायांत वर्म्मास्त्रं वह्निवल्लभा ॥१८६॥ पांचजन्या प्रताराद्यो नमोंतः शंखपूजने । शाङ्गय संशयांत च वर्म्मास्त्रं वह्निवल्लभा ॥१८७॥ शाङ्गय हृदयं मन्त्रो महाशः शाङ्गं पूजने । सुदर्शनमहांत तु चक्रराजपदं वदेत् ॥१८८॥ हययुग्मं सर्वदुष्टभयमन्ते कुरुद्वयम् । छिन्धिद्वयं ततः पश्चाद्विदारययुगं ततः ॥१८९॥ परमन्त्रान् ग्रसद्वन्द्वं भक्षयद्वितयं पुनः । भूतानि त्रासयद्वं द्वं वर्मफड्वह्नि सुंदरी ॥१९०॥ सुदर्शनाय हृदयं प्रोक्तश्चक्रार्चने मनुः । महाखङ्गतीक्षणपदाच्छिवियुग्मं समीरेयेत् ॥१९१॥ हुं फट् स्वाहा च खड्गाय नमः खङ्गार्चने मनुः । महाकौमोदकीत्यन्ते वदेच्चैव महाबले ॥१९२॥

'पक्षिराजाय स्वाहा' यह पीठ-मंत्र है। संकल्प के साथ मूर्ति की रचना करके उसमें इस मंत्र से आवाहन करे। तदनन्तर व्यापकन्यास के मंत्र से भक्तिपूर्वक पूजन कर 'श्रीवत्साय नमः' कहकर स्तनों पर श्रीवत्स-चिह्न की पूजा करे। 'कौस्तुभाय नमः' कहकर छाती पर कौस्तुभ मणि की पूजा करें। 'वनमालायै नमः' कहकर गले में वनमाला की पूजा करे। तत्पश्चात् कर्णिका पर अङ्गदेवताओं का विधिपूर्वक पूजन करके चामर लिये हुई लक्ष्मी आदि देवियों को पूजा करे ॥१७८-१८१॥ इन देवियों की कान्ति बंधूकपुष्प के समान और इनके कुच मोतियों की मालाओं से सुशोभित हैं इनके नेत्र विकसित कमल के तुल्य हैं और इनकी गति मद की उग्रता के कारण मंथर है। लक्ष्मी, सरस्वती, धृति, प्रीति, कान्ति, शान्ति, तुष्टि और पुष्टि--इन नामों के आदि में बीजमंत्र, अन्त में नमः और उससे पहले चतुर्थी विभक्ति को जोड़ देना चाहिए। भृगु (स्) अक्षर में अनुस्वार जोड़ने से देवी का बीजमंत्र बनता है। तीन ह्रस्व, नपुंसकलिंग तथा सवँरहित स्वर (निघात स्वर) से युक्त वह बीजमंत्र होता है। देवी के इस बीजमंत्र को क्रमशः लक्ष्मी आदि के पहले जोड़ देना चाहिए। अनन्तर पत्र के अग्रभाग पर शंख, धनुष, चक्र, खड्ग, गदा, अंकुश, मुसल तथा पाश का अपने-अपने मुद्रा-मंत्र से पृथक्-पृथक् पूजन करना चाहिए। 'महाजलचराय हुं फट् स्वाहा। ओं पाञ्चजन्याय नमः' इस मंत्र से शंख की पूजा करनी चाहिए ॥१८२-१८६॥

'शाङ्गय संशयाय हुं फट् स्वाहा। महाशाङ्गय नमः' यह कहकर धनुष की पूजा करनी चाहिए 'महासुदर्शन चक्रराज हययुग्मं कुरु कुरु सर्वदुष्टभयं छिन्धि छिन्धि विदारय विदारय परमंत्रान् ग्रस ग्रस भक्षय भक्षय भूतानि त्रासय त्रासय हुं फट् स्वाहा। सुदर्शनाय नमः' इस मंत्र से चक्र की पूजा करनी चाहिए। 'महाखड्ग तीक्ष्ण-शिवियुग्माय हुं फट् स्वाहा। खड्गाय नमः' इस मंत्र से खड्ग की पूजा करनी चाहिए ॥१८७-१९१॥ 'महाकौमोदकि महाबले सर्वासुरान्तके प्रसीद प्रसीद। हुं फट् स्वाहा। कौमोदक्यै नमः' यह सकल कामनादायक मंत्र कौमोदकी