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भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 633, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 633

अथैकसप्ततितमोऽध्यायः सनत्कुमार उवाच शृणु नारद वक्ष्यामि दिव्यान्नरहरेर्मनून् । यान्समाराध्य ब्रह्माद्याश्चक्रुः सृष्ट्यादि कर्म वै ॥१॥ संवर्तकश्चंद्रमौलिर्मनुर्बिंदुविभूषितः । एकाक्षरः स्मृतो मंत्रो भजतां सुरपादपः ॥२॥ मुनिरत्रिश्च जगतो छंदो बुद्धिमतां वर । देवता नृहरिः प्रोक्तो विनियोगोऽखिलाप्तये ॥३॥ क्षं बीजं शक्तिरी प्रोक्ता षड्दीर्घेण षडंगकम् । अर्केन्दुवह्निनयनं शरदिन्दुरुचं करैः ॥४॥ धनुश्चक्राभयवरान्दधतं नृहरिं स्मरेत् । लक्षं जपस्तद्दशांशहोमश्च घृतपायसैः ॥५॥ यजेत्पीठे वैष्णवे तु केसरेष्वंगपुजनम् । खगेशं शंकरं शेषं शतानन्दं दिगालिषु ॥६॥ श्रियं ह्रियं धृतिं पुष्टिं कोणपत्रेषु पूजयेत् । दन्तच्छदेषु नृहरींस्तावत् पूजयेत्क्रमात् ॥७॥ कृष्णो रुद्रो महाघोरो भीमो भीषण उज्ज्वलः । कराळो विकराळश्च दैत्यांतो मधुसूदनः ॥८॥ रक्ताक्षः पिंगलाक्षश्चांजनो दीप्तरुचिस्तथा । सुघोरकश्च सुहनुर्विश्वको राक्षसांतकः ॥६॥ विशालको धूम्रकेशो हयग्रीवो घनस्वनः । मेघवर्णः कुंभकर्णः कृतांततीव्रतेजसौ ॥१०॥ अग्निवर्णो महोग्रश्च ततो विश्वविभूषणः । विघ्नक्षमो महासेनः सिंहा द्वात्रिंशदीरिताः ॥११॥ तद्बहिः प्रार्चयेद्विद्वांल्लोकपालान्सहेतिकान् । एवं सिद्धे मनौ मन्त्री साधयेदखिलेप्सितान् ॥१२॥


अध्याय ७१ नृसिंह मंत्रोपासना सनत्कुमार बोले-नारद ! सुनो, मैं नरहरि (नृसिंह) के दिव्य मंत्रों को बताता हूँ, जिनकी आराधना करके ब्रह्मा आदि देवों ने सृष्टि आदिकार्यों का संपादन किया ॥१॥ 'क्षौं' यह एकाक्षर मंत्र कहा गया है । वह अपने जप करने वालों के लिये कल्पवृक्ष के समान है ॥२॥ बुद्धिमानों में श्रेष्ठ ! उस मंत्र के मुनि अत्रि हैं, छंद जगती है और देवता नृहरि हैं। अखिल वस्तुओं की प्राप्ति के लिये उसका विनियोग किया जाता है ॥३॥ 'क्षं' बीज मंत्र है, 'ईं' शक्ति है और छह दीर्घ मात्राओं से षडंग मंत्र (क्षं क्षां क्षिं क्षीं क्षुं क्षं ) बनता है। (साधक) सूर्य, चन्द्र एवम् वह्नि रूप नेत्र वाले, शरद् ऋतु के चन्द्रमा के समान कान्ति वाले और हाथों में धनुष, चक्र तथा गदा धारण करने वाले नृहरि का स्मरण करे । तदुपरांत एकाक्षर मंत्र का एक लाख जप करे । घी तथा खीर से जप का दशांश हवन करे ॥४-५॥ वैष्णव पीठ में केसरों पर अंग देवताओं का पूजन करना चाहिये । दिशाओं में खगेश, शंकर, शेष तथा शतानंद की, विदिशाओं में श्री, ह्री, धृति तथा पुष्टि की और दन्तच्छदों (होंठों) में क्रमशः नृहरियों की आराधना करे ॥६-७॥ कृष्ण, रुद्र, महाघोर, भीम, भीषण, उज्ज्वल, कराल, विकराल, दैत्यान्त, मधुसूदन, रक्ताक्ष, पिंगलाक्ष, अंजन, दीप्तरुचि, सुघोरक, सुहनु, विश्वक, राक्षसांतक, विशालक, धूम्रकेश, हयग्रीव, घनस्वन, मेघवर्ण, कुंभकर्ण, कृतान्त, तीव्रतेजस्, अग्निवर्ण, महोग्र, विश्वविभूषण, विघ्नक्षम, महासेन और सिंह ये बत्तीस नरसिंह देवता माने गये हैं ॥८-११॥ इनके बाद विद्वान् साधक सांगोपांग लोकपालों का पूजन करे । इस प्रकार मंत्र की सिद्धि हो जाने पर साधक की सकल कामनायें सफल होती हैं ॥१२॥