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भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 634, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 634

६१५ एकसप्ततितमोऽध्यायः

विष्णुः प्रद्युम्नयुक् शाङ्गीं सानिविीरं महांस्ततः । विष्णुं ज्वलंतं भृग्वोशो जलं पद्मासनं ततः ॥१३॥ हरिस्तु वासुदेवाय वैकुंठो विष्णुसंयुतः । गदी सैदुंतृसिंहं च भीषणं भद्रमेव च ॥१४॥ मृत्युमृत्युं ततः शौरिर्भानोर्नारायणान्वितः । नृहरेर्द्वाविंशद्वर्णोऽयं मन्त्रः साम्राज्यदायकः ॥१५॥ ब्रह्मा मुनिस्तु गायत्री छंदोऽनुष्टुबुदाहृतम् । देवता नृहरिश्चास्य सर्वेटफलदायकः ॥१६॥ हं बीजं इं तथा शक्तिर्विनियोगोऽखिलाप्तये । वेदेशचतुर्भिर्वसुभिः षड्भिः षड्भिर्युगाक्षरैः ॥१७॥ षडंगानि विधायाथ मूर्ध्नि भाले च नेत्रयोः । मुखबाहू त्रिसंध्यग्रेष्वथ कुक्षौ तथा हृदि ॥१८॥ गले पार्श्वद्वये पृष्ठे ककुद्यर्णान्मन्द्भवान् । प्रणवांतरितान् कृत्वा न्यसेत्साधकत्तमः ॥१९॥ नृसिंहसान्निध्यकरो न्यासो दशविधो यथा । करांघ्रयष्टांगुलिषु पृथगाद्यंतपर्वणोः ॥२०॥ सर्वांगुलिषु विन्यस्यावशिष्टं तलयोर्न्यसेत् । शिरोललाटे भ्रूमध्ये नेत्रयोः कर्णयोस्तथा ॥२१॥ कपोलकर्णमूले च चिबुकोर्ध्वाधरोष्ठके । कण्ठे घोणे च भुजयोहृत्स्तनौ नाभिमण्डले ॥२२॥ दक्षान्पदस्तले कट्यां मेढ्रोर्वोर्जानुजंघयोः । गुल्फे पादकरांगुल्योः सर्वसंधिषु रामसु ॥२३॥ रक्तास्थिमज्जासु तनौ न्यसेद्वर्णान्विचक्षणः । वर्णान्पदे गुल्फजानुकटिनाभिहृदि स्थले ॥२४॥ बाह्वोः कंठे च चिबुके चौष्ठे गण्डे प्रविन्यसेत् । कर्णयोर्वदने नासापुटे नेत्रे च मूर्द्धनि ॥२५॥ पदानि तु मुखे मूर्ध्नि नसि चक्षुषि कर्णयोः । आस्ये च हृदये नाभौ पादान्सर्वांगके न्यसेत् ॥२६॥ अर्द्धद्वयं न्यसेन्मूर्ध्नि आहृत्यादात्तदंगकम् । उग्रादीनि पदानीह मृत्युमृत्युं नमाभ्यहम् ॥२७॥ इत्येतान्यास्यकन्नाणचक्षुः श्रोत्रेषु पक्ष्मसु । हृदि नाभौ च कटचादिपादांतं नवसु न्यसेत् ॥२८॥ वोराद्यानपि तान्येव यथापूर्वं प्रविन्यसेत् । नृसिंहाद्यानि तान्येव पूर्ववद्विन्यसेत्सुधीः ॥२९॥

"विष्णु........नारायणान्वितः"-यह बाईस अक्षरों वाला नृहरि का मंत्र साम्राज्यदायक है । इसके मुनि ब्रह्मा हैं, छंद गायत्री है जो अनुष्टुप् कहा गया है। देवता नृसिंह हैं, जो समस्त अभीष्ट फल देने वाले हैं ।।१३-१६।। 'हं' बीज है, 'इं' शक्ति है और सर्वप्राप्ति के लिये इसका विनियोग किया जाता है । उत्तम साधक को चाहिये कि वह चार-चार, आठ, छः छः ओर चार अर्थात् बत्तीस अक्षरों से षडंगन्यास कर मस्तक, ललाट, उभय नेत्र, मुख, बाहु, चरण, संधि, अग्रभाग, कुक्षि, हृदय, ग्रीवा, उभय पार्श्व, ककुद और पृष्ठ पर मंत्र के वर्णों को प्रणव (ओं) से संपुटित करके न्यास करे ।।१७-१९।। दश प्रकार के न्यास करने से नृसिह के सामीप्य की प्राप्ति होती है । कर, चरण आदि अंगों में, अंगुलियों में तथा अंगुलियों की आदिम एवम् अन्तिम पोरों में मंत्राक्षरों का विन्यास करके अवशिष्ट अक्षरों को दोनों हथेलियों पर न्यस्त करे । विद्वान् व्यक्ति शिर, ललाट, भौं के मध्य, उभय नेत्र, कर्ण, कपोल, कर्ण-मूल, ढुड्डी, अधर, ओष्ठ, कंठ, नासिकापुट, भुजा, हृदय, तनु, नाभिमंडल, चरणतल, कटि, लिंग, जंघा, घुटना, गुल्फ, हाथ-पैर की अंगुलियाँ, समस्त संधियाँ, रोएं, शोणित, अस्थियाँ और मज्जा--इतने अंगों में वर्णों का विन्यास करे । चरण, गुल्फ, जानु, कटि, नाभि, हृदय, बाहु, कंठ, ढुड्डी, ओष्ठ, कपोल, कर्ण, वदन, नासिकापुट, नेत्र तथा मस्तक पर वर्णों का और मुख, मस्तक, नासिका नेत्र, कर्ण, हृदय, नाभि एवम् अखिल अंगों में पदों का विन्यास करे ।।२०-२६।।

'आहृत्', 'पादात्' इन दो पदों का न्यास मस्तक पर करके "उग्र......अहम्"-इतने पदों को मुख, नासिका, नेत्र, कर्ण, पक्ष्म, हृदय, नाभि, कटि तथा चरण-इन नौ अंगों में विन्यस्त करे । सुधी जन "वीर" आदि एवम् "नृसिंह" आदि पदों का भी यथापूर्व विन्यास करके एक, तीन, चार, छः, तीन, दो, दश,

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