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भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 635, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 635

६१६ नारदीयपुराणम् चंद्राग्निवेदषड्रामनेत्रदिग्बाहुभित्तान् । विभक्तान्मंत्रवर्णांश्च क्रमात्स्थानेषु विन्यसेत् ॥२७॥ मूले मूलाच्च नाभ्यंतं नाभ्यादि हृदयावधि । हृदयाद्भूयुगांतं तु नेत्रत्रये च मस्तके ॥२८॥ बाह्वोरंगुलिषु प्राणे मूर्द्धादि चरणावधि । विन्यसेन्नामतो धीमान्हरिन्यासोऽयमीरितः ॥२९॥ न्यासस्यास्य तु माहात्म्यं जानात्येको हरिः स्वयम् । एवं न्यासविधिं कृत्वा ध्यायेच्च नृहरिं हृदि ॥३३॥ गलासक्तलसद्बाहु स्पृष्टकेशोऽब्जचक्रधृक् । नखाग्रभिन्नदैत्येशो ज्वालामालासन्वितः ॥३४॥ दीप्तजिह्वस्त्रिनयनो दंष्ट्रोग्रं वदनं वहन् । नृसिंहोऽस्मान्सदा पातु स्थलांबुगगनोपगः ॥३५॥ ध्यात्वैवं दर्शयेन्मुद्रां नृसिंहस्य महात्मनः । जानुमध्यगतौ कृत्वा चिबुकोष्ठौ समावुभौ ॥३६॥ हस्तौ च भूमिसंलग्नौ कंपमानः पुनः पुनः । मुखं विजृंभितं कृत्वा लेलिहानां च जिह्विकाम् ॥३७॥ एषा मुद्रा नार्सिही प्रधानेति प्रकीर्तिता । वामस्यांगुष्ठतो बद्धा कनिष्ठांगुलीत्रयम् ॥३८॥ त्रिशूलवत् संमुखोर्द्धे कुर्यान्मुद्रां नृसिंहगाम् । अंगुष्ठाभ्यां च करयोस्तथाऽऽक्रम्य कनिष्ठके ॥३९॥ अधोमुखाभिः शिष्टाभिः शेषाभिन्हरौ ततः । हस्तामधोमुखौ कृत्वा नाभिदेशे प्रसार्य च ॥४०॥ तर्जनीभ्यां नयेत्स्कंधौ प्रोक्ता चांत्रणमुद्रिका । हस्तावेकध्वंमुखौ कृत्वा तले संयोज्य मध्यमे ॥४१॥ अनामायां तु वामायां दक्षिणां तु विनिक्षिपेत् । तर्जन्यौ पृष्ठतो लग्नौ अंगुष्ठौ तर्जनीस्थितौ ॥४२॥ चक्रमुद्रा भवेदेषा नृहरेः संनिधौ मता । चक्रमुद्रा तथा कृत्वा तर्जनीभ्यां तु मध्यमे ॥४३॥ पीडयेद्दंष्ट्रमुद्रैषा सर्वपापप्रणाशिनी । एता मुद्रा नृसिंहस्य सर्वमंत्रेषु संमताः ॥४४॥

दो, एक अर्थात् बत्तीस मंत्रवर्णों का क्रमशः स्थानों में विन्यास करे जैसे पहले चरण-मूल में, मूल से नाभि तक, नाभि से हृदय तक, हृदय से भौंह तक, त्रिनेत्र, मस्तक, भुजा, अंगुलि, प्राण तथा शिर से चरण तक समस्त अंगों में नामनिर्देशपूर्वक न्यास करे । इसका नाम हरिन्यास है ॥२७-३२॥ इस न्यास का माहात्म्य एक साक्षात् हरि ही जानते हैं । इस प्रकार न्यास विधि को संपन्न कर हृदय में नृहरि का इस प्रकार ध्यान करे—"नृसिंह देव अपनी भुजाओं को गले से घुमा कर केशों को छू रहे हैं, हाथों में कमल तथा चक्र धारण किये हुए हैं, नखाग्र से दैत्य का विदारण किया है, ज्वाला के समान माला पहने हुए हैं, जिह्वा देदीप्यमान है, नेत्र तीन हैं, मुख में तीक्ष्ण दंष्ट्रा धारण किये हुए हैं । ऐसे नृसिंह, जो स्थल, जल तथा गगन में व्याप्त हैं, सदा हमारी रक्षा करें ॥३३-३५॥ इस तरह महात्मा नृसिंह का ध्यान कर मुद्रा दिखाये । उस मुद्रा में दोनों घुटनों के बीच मुख ले जाकर ठुड्डी और होंठ को सीधा रखे । फिर हाथों को भूमि पर रख कर शरीर को कंपाते हुए मुख को फैला कर जिह्वा को लपलपाये ॥३६-३७॥ यहो है प्रधान नारसिंही मुद्रा । बायें हाथ के अंगूठे से कनिष्ठा प्रभृति तीन अंगुलियों को सटा कर त्रिशूल की तरह ऊपर को उठाये । इसका नाम नृसिंहगामिनी मुद्रा है। दोनों हाथों के अंगूठों से दोनों कनिष्ठाओं को आक्रान्त कर अवशिष्ट अंगुलियों को अधोमुख करे फिर उभय हस्तो को नीचे करके नाभि देश में फैलाये । अनन्तर तर्जनियों से स्कंधों का स्पर्श करे । यह अंत्रणमुद्रा कहलाती है । हाथों को ऊर्ध्वमुख करके मध्यमाओं को हथेलियों से संयुक्त करे और बाँयी अनामिका के ऊपर दाहिनी अनामिका को रख दे । फिर अंगूठों को तर्जनियों के नीचे रख तर्जनियों को परस्पर संलग्न करे। इसका नाम चन्द्रमुद्रा है, जो नृहरि की संनिधि में की जाती है । उक्त प्रकार से चक्रमुद्रा दिखा कर निखिलपापनाशिनी 'दंष्ट्रमुद्रा करनी चाहिये, जिसमें तर्जनियों से मध्यमाओं का उत्पीड़न किया जाता है । नृसिंह की ये मुद्रायें सब्र यंत्रों में प्रदर्शित की जा सकती हैं ॥३८-४४॥