बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें६१७ एकसप्ततितमोऽध्यायः
। घृताक्तैर्जुहुयाद्वह्नौ पीठे पूर्वोदितेऽर्चयेत् ॥४५॥ वर्णलक्षं जपेन्मंत्रं तद्दशांशं च पायसैः । गरुडादीन् श्रीमुखांश्च विदिक्षु लोकपान्बहिः ॥४६॥ अंगांग्यादौ समाराध्य दिक्पतेषु यजेत्पुनः । सौम्ये कार्ये स्मरेत्सौम्यं क्रूरं क्रूरे स्मरेद्बुधः ॥४७॥ एवं संसाधितो मंत्रः सर्वान्कामान्प्रपूरयेत् । निशितैर्नखदंष्ट्राग्रैः खाद्यमानं च संस्मरेत् ॥४८॥ पूर्वमृत्युपदे शत्रोर्नाम कृत्वा स्वयं हरिः । जायते मण्डलादर्वाक् [शत्रुवै शमनातिथिः ॥४६॥ अष्टोत्तरशतं नित्यं जपेन्मन्त्रमतन्द्रितः । श्रीकामः सततं ध्यायेत्पूर्वोक्तं नृहरिं सितम् ॥५०॥ ध्यानभेदानथो वक्ष्ये सर्वसिद्धिप्रदायकान् । विषमृत्यूपरोगोदिसर्वोपद्रवनाशनम् ॥५१॥ वामांकस्थितया लक्ष्म्यालिगितं पद्महस्तया । आंत्रमालाधरं रौद्रं कण्ठहारेण भूषितम् ॥५२॥ नरसिंहं महाभीमं कालानलसमप्रभम् । चन्द्रमौलि नीलकण्ठं प्रतिवक्त्रं त्रिनेत्रकम् ॥५३॥ नागयज्ञोपवीतं च पञ्चाननसुशोभितम् । अक्षसूत्रं गदापद्मं शंखं गोक्षीरसन्निभम् ॥५४॥ भुजैः परिघसंकाशैर्दशभिश्चोपशोभितम् । खड्गं शूलं च बाणं च नृहरिं रुद्ररूपिणम् ॥५५॥ धनुश्च मुशलं चैव बिभ्राणं चक्रमूत्तमम् । पूर्वादि चोत्तरं यावदूर्द्धास्यं सर्ववर्णकम् ॥५६॥ इन्द्रगोपामनीलाभं चन्द्राभं स्वर्णसन्निभम् । सर्वमृत्युहरं दिव्यं स्मरणात्सर्वसिद्धिदम् ॥५७॥ एवं ध्यात्वा जपेन्मंत्रं सर्वव्याधिविमुक्तये । सर्वलोकेशः सर्वाभरणभूषितः ॥५८॥ ध्यायेद्यदा महत्कर्म तदा षोडशहस्तवान् । नृसिंहः शङ्खचक्रधरौ द्वौ तु द्वौ च बाणधनुर्द्धरौ ॥५६॥ द्वौ विदारणकर्माण्तौ द्वौ चांग्लोद्धरणान्वितौ ।
मुद्रा लगाने के उपरान्त बत्तीस लाख मंत्र का जप कर उसका दशांश घृतमिश्रित पायस से पूर्वोक्त पीठ पर अग्नि में हवन करे । पहिले अङ्गदेवताओं का पूजन कर समस्त दिशाओं में श्री, गरुड़ आदि देवताओं की अर्चना करे । इस तरह मंत्र को सिद्ध कर लेने पर सकल कामनायें सफल हो जाती हैं । बुध जन मङ्गलमय कार्य में देवता के सौम्य रूप का ध्यान करे और क्रूरतापूर्ण कार्य में क्रूर रूप का । शत्रु के मारणकार्य में वैरी का नाम लेकर हरि के इस रूप का ध्यान करे कि वे अपनी तीक्ष्ण दंष्ट्रा एवम् नखों के अग्रभाग से शत्रु को विदीर्ण कर रहे हैं । ध्यान के उपरान्त निरालस्यपूर्वक एक सौ आठ बार मंत्र का जप नित्य किया करे । ऐसा करने से शत्रु शीघ्र ही यमपुरी पहुँच जाता है ॥४५-४९॥
अब मैं सकल सिद्धियों के देने वाले ध्यान के प्रभेदों को बतलाऊँगा । धन चाहने वाला मनुष्य सदा पूर्वोक्त प्रकार से शुक्लवर्ण वाले नृहरि का ध्यान करे, जिनके बायें अंक पर अवस्थित पद्महस्ता लक्ष्मी आलिंगन कर रही हैं । विष, अपमृत्यु, रोग एवम् निखिल उपद्रवों की शान्ति के लिये कालानल के समान प्रभा वाले, आँतड़ियों की माला धारण करने वाले, महाभयंकर रुद्ररूप, कंठों के हार से शोभित, सर्पों के यज्ञोपवीत से भूषित, पाँच मुखों से युक्त चन्द्रमौलि, नीलकंठ, प्रत्येक मुख में तीन-तीन नेत्र धारण करने वाले, परिघ (भाला) तुल्य दश भुजाओं से सुशोभित, रुद्राक्षमाला, गदा, पद्म, गाय के दूध के समान धवल शंख, धनुष, मुशल, चक्र, खड्ग, त्रिशूल एवम् बाण धारण करने वाले, १इन्द्रगोपा, नीलमणि, चंद्रमा तथा सुवर्ण के सदृश कान्ति वाले, पूर्व दिशा से लेकर उत्तर दिशा पर्यन्त ऊर्ध्वविस्तृत मुख वाले और सर्ववर्ण वाले नरसिंह का ध्यान करे । इस प्रकार ध्यान करने के बाद मंत्र जपने से अशेष व्याधियों एवम् अपमृत्युओं का नाश ओर सकल सिद्धियों की प्राप्ति होती है । जब कोई महत्त्वपूर्ण कार्य करना हो तो नरसिंह के इस रूप का ध्यान करे कि वे सकल लोकों के स्वामी, समस्त आभूषणों से विभूषित एवम् सोलह हाथों से युक्त हैं । उनके दो हाथ विदारण करने में लगे हुए हैं, दो आँतड़ियों
१. एक प्रकार का बरसाती कीड़ा जिसका रंग लाल होता है । ७८ ना० पु०