बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें६१८ नारदीयपुराणम्
खड्गखेटधरौ द्वौ च द्वौ गदापद्मधारिणौ । पाशांकुशधरौ द्वौ च द्वौ रिपोर्मुकुटापितौ ॥६०॥ इति षोडशदोर्दण्डमण्डितं नृहरिं विभुम् । ध्यायेन्नारदनीलाभमुग्रकर्मण्यनन्यधीः ॥६१॥ ध्येयो महत्समे कार्ये द्वात्रिंशद्धस्तवान्बुधैः । नृसिंहः सर्वभूतेशः सर्वसिद्धिकरः परः ॥६२॥ दक्षिणे चक्रपद्मे च परशुं पाशमेव च । हलं च मुशलं चैव अभयं चांकुशं तथा ॥६३॥ पट्टिशं भिदिपालं च खड्गमुद्गरतोमरान् । वामभागे करैः शंखं खेटं पाशं च शूलकम् ॥६४॥ अग्निं च वरदं शक्तिं कुंडिकां च ततः परम् । कार्मुकं तर्जनीमुद्रां गवां डमरुशूर्पकौ ॥६५॥ द्वाभ्यां कराभ्यां च रिपोर्जानुमस्तकपीडनम् । ऊर्ध्वीकृताभ्यां बाहुभ्यां आंत्रमालाधरं विभुम् ॥६६॥ अधः स्थिताभ्यां बाहुभ्यां हिरण्यकविदारणम् । प्रियंकरं च भक्तानां दैत्यानां च भयंकरम् ॥६७॥ नृसिंहं तं स्मरेदित्यं महामृत्युभयापहम् । एवं ध्यात्वा जपेन्मन्त्रो सर्वकार्यार्थसिद्धये ॥६८॥ अथोच्यते ध्यानमन्यन्मुखरोगहरं शुभम् । स्वर्णवर्णसुपर्णस्थं विद्युन्मालासटान्वितम् ॥६६॥ कोटिपूर्णेन्दुवर्णं च सुमुखं त्र्यक्षिवीक्षणम् । पीतवस्त्रोरुभूषाढ्यं नृसिंहं शान्तविग्रहम् ॥७०॥ चक्रशंखाभयवरान्दधतं करपल्लवैः श्वेडरोगादिशमनं स्वैर्ध्यानैः सुरवन्दितम् । शत्रोः सेनानिरोधेन यत्नं कुर्याच्च साधकम् ॥७१॥ अक्षाकाष्ठैरेधितेऽग्नौ विचिंत्य रिपुमर्दनम् । देवं नृसिंहं संपूज्य कुसुमाद्युपचारकैः ॥७२॥ समूलमूलैर्जुहुयाच्छरैर्दशशतं पृथक् । रिपुं खादन्निव जपेन्निर्दहन्निव तं क्षिपेत् ॥७३॥
को निकाल रहे हैं, दो शत्रु के मुकुट को खींच रहे हैं, और दो धनुष बाण, दो खड्ग-खेट, दो गदा-पद्म तथा दो पाश-अंकुश धारण किये हुए हैं ॥५०-६०॥
नारद ! इस तरह तन्मय होकर सोलह भुजदंडों से मंडित नीलवर्ण हरि का उग्र कर्म में ध्यान करे । यदि अत्यन्त महत्वपूर्ण कार्य करना हो तो विद्वान् व्यक्ति बत्तीस हाथों वाले नरसिंह का ध्यान करे—"वे देव समस्त प्राणियों के अधीश्वर तथा सकलसिद्धिदायक हैं, जिनकी दाहिनी तरफ की भुजाओं में चक्र, पद्म, परशु, पाश, मुशल, अभय, अंकुश, पट्टिश, भिदिपाल, खड्ग, मुद्गर तथा तोमर और बाँयी ओर की बाहुओं में शंख, खेट, पाश, त्रिशूल, अग्नि, शक्ति, कुंडिका, धनुष, तर्जनीमुद्रा, गदा, डमरू एवम् शूर्प विद्यमान हैं। वे दो हाथों से शत्रु के घुटने तथा मस्तक को फोड़ रहे हैं, दो बाहुओं को ऊपर उठाकर अंतड़ियों की माला धारण कर रहे हैं। और दो हाथों को नीचे करके हिरण्यकशिपु का विदारण कर रहे हैं। वे भक्तों के प्रिय करने वाले, दैत्यों को भय देने वाले तथा महामृत्यु के भय को दूर करने वाले हैं।" इस प्रकार नरसिंह का ध्यान कर साधक सकल कार्यों की सिद्धि के लिये मंत्र का जप करे ॥६१-६८॥
एतदुपरान्त मुख-रोग को दूर करने वाले अन्य मांगलिक ध्यान को मैं बतलाता हूँ। सुवर्ण के समान वर्ण वाले गरुड़ पर अवस्थित, विद्युत् के सदृश चमकती हुई माला से सुशोभित, कोटि पूर्णचंद्र के समान कान्तिमान्, सुमुख, त्रिनेत्र, पीत वस्त्र एवम् विविध भूषणों से विभूषित, शान्त शरीर, करपल्लवों में चक्र, शंख, अभयास्त्र एवम् वरास्त्रधारण करने वाले और कफ आदि रोगों को दूर करने वाले देव वंदनीय नरसिंह का ध्यान करे । शत्रु की सेना के निरोध के निमित्त ऐसे ही रूप का ध्यान करना चाहिये ॥६९-७१॥ अनन्तर कुसुम आदि उपचारों से नरसिंह देव की अर्चना कर बहेड़े की लकड़ी से प्रज्वलित किये हुए अग्नि में कंद-मूलों से सौ बार हवन करे। 'मानो वे शत्रु को खा रहे हों'—ऐसे रूप का ध्यान करते हुए मन्त्र का जप करे और मानों वे रिपु को जला