बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें६१८ एकसप्ततितमोऽध्यायः
हुत्वा सप्तदिनं मन्त्री सेनामिष्टां महीपतेः। प्रस्थापयेच्छुभे लग्ने परराष्ट्रजयेच्छया ॥७४॥ तस्याः पुरस्तान्नृहरिं निघ्नन्तं रिपुमण्डलम् । स्मृत्वा जपं प्रकुर्वीत यावदायाति सा पुनः ॥७५॥ निर्जित्य निखिलाञ्छत्रून्सह वीरश्रियासुखात् । प्रीणयेन्मन्त्रिणं राजा विभवैः प्रीतमानसः ॥७६॥ गजाश्वरथरत्नैश्च ग्रामक्षेत्रधनादिभिः । यदि मन्त्री न तुष्येत तदानर्थो महीपतेः ॥७७॥ जायते तस्य राष्ट्रेषु प्राणेभ्योऽपि महाभयम् । अष्टोत्तरशतं मूलमन्त्रमन्त्रितभस्मना ॥७८॥ नाशयेन्मूषिकालूतावृश्चिकायुत्थितं विषम् । लिप्तांगः सर्वरोगैश्च मुच्यते नात्र संशयः ॥७६॥ सेवंतीकुसुमैर्हुत्वा महतीं श्रियमाप्नुयात् । औदुम्बरसमिद्भिस्तु भवेद्धान्यसमृद्धिमान् ॥८०॥ अपूपलक्षहोमे तु भवेद्वैश्रवणोपमः । क्रुद्धस्य सन्निधौ राज्ञो जपेदष्टोत्तरं शतम् ॥८१॥ सद्यो नैर्मल्यमाप्नोति प्रसादं चाधिगच्छति । कुन्दप्रसूनैरुदयं मोचामिर्विघ्ननाशनम् ॥८२॥ तुलसीपत्रहोमेन महतीं कीर्तिमाप्नुयात् । शाल्युत्थसक्तुहोमेन वश्येदखिलं जगत् ॥८३॥ मधूकपुष्पैरिष्टं स्यात्स्तंभनं धात्रिखण्डकैः । दधिमध्वाज्यमिश्रां तु गुडूचीं चतुरंगुलाम् ॥८४॥ जुहुयादयुतं योऽसौ शतं जीवति रोगजित् । शनैश्चरदिनेऽश्वत्थं स्पृष्ट्वा चाष्टोत्तरं शतम् ॥८५॥ जपेज्जGeneralवा सोऽपमृत्युं शतवर्षाणि जीवति । अथ तं संप्रवक्ष्यामि यंत्रं त्रैलोक्यमोहनम् ॥८६॥ यस्य संधारणादेव भवेयुः सर्वसंपदः । श्वेतेभूर्जे लिखेत्पद्मं द्वात्रिंशत्सिंहसंयुतम् ॥८७॥
रहे हों—इस स्वरूप का संस्मरण करते हुए हवन करे। सात दिनों तक हवन करके दूसरे राष्ट्र के ऊपर विजय पाने की इच्छा से शुभ लग्न में अपनी सेना को चढ़ाई के लिये भेजे। पुनः जब तक वह सेना लौट कर आये तब तक रिपुसमूह का विध्वंस करने वाले नरसिंह का ध्यान-जप करते रहना चाहिये। निखिल शत्रुओं को जीत कर मंत्री के लौट आने पर प्रसन्नचित्त राजा मन्त्री को हाथी, घोड़े, रथ, रत्न, गाँव जागीर, धन आदि से पुरस्कार दे। क्योंकि यदि मंत्री असंतुष्ट रहेगा तो महीपति के लिये अनिष्ट होगा ॥७२-७७॥ उसके राष्ट्र में प्राणों पर संकट आएगा। एक सौ आठ बार भस्म को नरसिंह के मूलमंत्र से अभिमंत्रित कर देने से वह भस्म चूहों, कीड़े-मकोड़े, बिच्छू आदि के विष को नष्ट कर डालते हैं। अङ्गों में उसके लेप करने से सब रोग छूट जाते हैं, इसमें संशय नहीं। सेवंती पुष्पों से हवन करने से प्रचुर संपत्ति प्राप्त होती है। गूलर की समिधा से होम करने से धनधान्य की प्राप्ति होती है ॥७८-८०॥ पुए से एक लाख हवन करने से मनुष्य कुबेरतुल्य होता है। क्रुद्ध राजा के समीप एक सौ आठ बार जप करने से वह तुरन्त क्रोध का त्याग कर प्रसन्नता प्रकट करने लगता है ॥८१-८२॥ सेमल से हवन करने से उन्नति होती है। केले के फूलों से हवन करने पर विघ्नों का नाश होता है। कुन्द के पुष्पों के फूलों से होम करने से विघ्न का नाश होता है। तुलसी-पत्रों से हवन करने से महायश प्राप्त होता है। चावल के बने सत्तू से होम करने से संपूर्ण जगत् वशीभूत होता है ॥८३॥ दोपहरिया के फूलों से होम करने से इष्ट की प्राप्ति होती है और धात्री फलों से होम करने से (शत्रु का) स्तंभन होता है। जो व्यक्ति दधि, मधु तथा घृत मिश्रित चार अंगुल की गुडूची से दश हजार बार हवन करता है, वह आरोग्यपूर्वक सौ वर्ष जीता है ॥८४।। जो शनि दिन पीपल के वृक्ष का स्पर्श कर एक सौ आठ बार इस मंत्र का जप करता है, वह अपमृत्यु को जीत कर सौ वर्ष तक जीता है ॥८५३॥ अब मैं त्रैलोक्य को मोहित करने वाले यंत्र के बारे में तुमसे कहता हूँ, जिसके धारण करने से सकल सम्पत्तियां प्राप्त होती हैं। श्वेत भोज पत्र पर ३२ सिंह-मूर्तियों से युक्त कमल लिखे जो मनोहर तथा