भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 64, कुल 1008 में से

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अष्टमोऽध्यायः ४५ गरेण सहितं पुत्रं दृष्ट्वा तेजोनिधिर्मुनिः । जातकर्म चकारासौ तन्नाम सगरेति च ॥११॥ पुपोष सगरं बालं तन्माता प्रीतिपूर्वकम् । चौलोपवीतकर्माणि तथा चक्रे मुनीश्वरः ॥१२॥ शास्त्राण्यध्यापयामास राजयोग्यानि मंत्रवित् । समर्थं सगरं दृष्ट्वा किंचिदुद्भिन्नशैशवम् ॥१३॥ मन्त्रवत्सर्वशस्त्रास्त्रं दत्तवान्स मुनीश्वरः । सगरः शिक्षितस्तेन सम्यगौर्वेषिणा मुने ॥१४॥ बभूव बलवान्धर्मी कृतज्ञो गुणवान्सुधीः । धर्मज्ञः सोऽपि सगरो मुनेरमिततेजसः ॥ ॥१५॥ समिस्कुशांबुपुष्पादि प्रत्यहं समुपानयत् स कदाचिद्गुणनिधिः प्रणिपत्य स्वमातरम् । उवाच प्रांजलिर्भूत्वा सगरो विनयान्वितः ॥१६॥ सगर उवाच मातर्गतः पिता कुत्र किंनामा कस्य वंशजः । तत्सर्वं मे समाचक्ष्व श्रोतुं कौतूहलं मम ॥१७॥ ॥१८॥ पित्रा विहीना ये लोके जीवंतोऽपि मृतोपमाः दरिद्रोऽपि पिता यस्य ह्यास्ते स धनदोपमः । यस्य माता पिता नास्ति सुखं तस्य न विद्यते ॥१९॥ धर्महीनो यथा मूर्खः परत्रेह च निन्दितः । मातापितृविहीनस्य अज्ञस्याप्यविवेकितः ॥ ॥२०॥ अपुत्रस्य वृथा जन्म ऋणग्रस्तस्य चैव हि चन्द्रहीना यथा रात्रिः पद्महीनं यथा सरः । पतिहीना यथा नारी पितृहीनस्तथा शिशुः ॥२१॥ धर्महीनो यथा जन्तुः कर्महीनो यथा गृही । पशुहीनो यथा वैश्यस्तथा पित्रा विनार्भकः ॥२२॥ सत्यहीनं यथा वाक्यं साधुहीना यथा सभा । तपो यथा दयाहीनं तथा पित्रा विनार्भकः ॥२३॥ ॥१६-१०॥ तेजःपुंज मुनि ने जब यह देखा कि उस बालक के साथ गर ( विष ) भी उत्पन्न हुआ है तब उसका जात कर्म संस्कार करने के बाद 'सगर' नाम रख दिया । उस बालक की माता बालक का पालन करने लगी और उस मुनीश्वर ने चूड़ाकर्म और यज्ञोपवीत संस्कार कराये । उस मन्त्रज्ञ मुनि ने राजाओं के योग्य समस्त शास्त्रों का उपदेश भी कर दिया । जब उस मुनीश्वर ने देखा कि अब यह सगर समर्थ (समझदार) हो गया है कुछ शिशुता भी दूर हो चली है तब उन्होंने मन्त्रपूर्वक सारे अस्त्र-शस्त्र भी सिखा दिये । मुने ! ऋषि और्व ने वह सगर को भली- भाँति शिक्षा दी । वह बालक सगर भी, मुनि के अमित तेज के प्रभाव से बलवान्, धार्मिक, कृतज्ञ, विद्वान्, गुणी और धर्म का ज्ञाता हुआ । वह प्रति-दिन परम तेजोनिधि मुनि के लिए समिधा, कुश, जल और पुष्प आदि ला दिया करता था । एक दिन वह गुणी बालक माता को प्रणाम करके हाथ जोड़कर नियम पूर्वक अपनी माता से बोल. ॥११-१६॥ सगर ने कहा—मां ! मेरे पिता कहाँ चले गए ? उनका नाम क्या था ? और वे किसके वंशज थे ? मुझसे सारी बातें कहो, मुझे इन बातों को सुनने के लिए कौतूहल हो रहा है । जो इस संसार में पिता से हीन हैं उनका जीना भी मरने के समान हैं । जिसके पिता जीवित हैं वह दरिद्र होता हुआ भी कुवेर के समान है । जिसके माता और पिता नहीं हैं उसको जीवन में कभी भी सुख नहीं मिलता । जिस प्रकार धर्म रहित अज्ञानी व्यक्ति की इस लोक में और पर लोक में सर्वत्र निन्दा होती है उसी प्रकार उस अविवेकी मूर्ख की भी निन्दा होती है जो माता-पिता से हीन है । ऋण के भार से दबे और पुत्र से रहित व्यक्ति का जन्म व्यर्थ है ॥१७-२०॥ जिस प्रकार चन्द्र से शून्य रात्रि की, कमल से हीन सरोवर की और पति हीन नारी की शोभा नहीं होती उसी प्रकार पिता से हीन बालक की भी शोभा नहीं होती । जिस प्रकार धर्म से विमुख प्राणी, कर्मच्युत गृहस्थ और पशु से हीन कृषक का जीवन निरर्थक है उसी प्रकार बालक पिता के बिना निरर्थक है । जिस प्रकार सत्य से हीन वाक्य,

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