बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें४६ नारदीयपुराणम् वृक्षहीनं यथारण्यं जलहीना यथा नदी । वेगहीनो यथा वाजी तथा पित्रा विनाऽर्भकः ॥२४॥ यथा लघुत्तरो लोके मातर्याच्ञापरो नरः । तथा पित्रा विहीनस्तु बहुदुःखान्वितः सुतः ॥२५॥ इतीरितं सुतेनैषा श्रुत्वा निःश्वस्य दुःखिता । संपृष्टं तद्यथावृत्तं सर्वं तस्मै न्यवेदयत् ॥२६॥ तच्छ्रुत्वा सगरः क्रुद्धः कोपसंरक्तलोचनः । हनिष्यामीत्यरातींन्स प्रतिज्ञामकरोत्तदा ॥२७॥ प्रदक्षिणीकृत्य मुनिं जननीं च प्रणम्य सः । प्रस्थापितः प्रतस्थे च तेनैव मुनिना तदा ॥२८॥ और्वाश्रमाद्विनिष्क्रान्तः सगरः सत्यवाक् शुचिः । वशिष्ठं स्वकुलाचार्यं प्राप्तः प्रीतिसमन्वितः ॥२९॥ प्रणम्य गुरवे तस्मै वशिष्ठाय महात्मने । सर्वं विज्ञापयामास ज्ञानदृष्ट्या विजानते ॥३०॥ ऐन्द्रास्त्रं वारुणं ब्राह्ममाग्नेयं सगशे नृपः । तेनैव मुनिनाऽवाप खङ्गं वज्रोपमं धनुः ॥३१॥ ततस्तेनाभ्यनुज्ञातः सगरः सौमनस्यवान् । आशीर्भिरर्चितः सद्यः प्रतस्थे प्रणिपत्य तम् ॥३२॥ एकेनैव तु चापेन स शूरः परिपन्थिनः । सपुत्रपौत्रांत्सगणानकरोत्स्वर्गवासिनः ॥३३॥ तच्चापमुक्तबाणाग्निसंतप्तास्तदरातयः । केचिद्विनष्टा संत्रस्तास्तथा चान्ये प्रदुद्रुवुः ॥३४॥ केचिद्विशीर्णकेशाश्च वल्मीकोपरि संस्थिताः । तृणान्यभक्षयंकेचिन्नग्नाश्च विविशुर्जलम् ॥३५॥ शकाश्च यवनाश्चैव तथा चान्ये महीभृतः । सत्वरं शरणं जग्मुर्वशिष्ठं प्राणलोलुपाः ॥३६॥ जितक्षितिर्बाहुपुत्रो रिपुन्गुरुसमीपगान् । चारैर्विज्ञातवान्सद्यः प्राप्तश्चाचार्यसन्निधिम् ॥३७॥ सज्जनों से हीन सभा, करुणा से हीन तपस्या की कुछ भी सार्थकता नहीं उसी प्रकार पिता से रहित बालक का जीवन निरर्थक है। जिस प्रकार वृक्ष विहीन वन, जल हीन नदी, वेग हीन (बिना चाल के) अश्व का कुछ भी मूल्य नहीं उसी प्रकार उस बालक का कुछ भी महत्त्व नहीं जिसके पिता का कुछ पता न हो। माता ! जिस प्रकार याचक का जीवन संसार में तुच्छ है उसी प्रकार पितृ विहीन बालक का जीवन दुःखों से ही घिरा रहता है। ॥२४-२५॥ बालक सगर की उपर्युक्त बातों को सुनकर माता अत्यन्त दुःखी हुई। उसने लम्बी साँस लेकर जैसा पुत्र ने प्रश्न किया था तदनुरूप सारी घटना कह सुनाई। सारी घटनायें सुन कर सगर क्रुद्ध हो उठा। उसके नेत्र क्रोध से लाल हो गए। उसने तत्काल शत्रुओं के मारने की प्रतिज्ञा की। तदनन्तर वह मुनि और माता की प्रदक्षिणा कर उसी मुनि की आज्ञा और योजना के अनुसार वहाँ से चल पड़ा। सत्यवादी और पवित्र वह सगर मुनि और्व के आश्रम को छोड़कर कुल गुरु वशिष्ठ के आश्रम में आया। स्वकुलाचार्य गुरु के आश्रम को देखकर उसको बड़ी प्रसन्नता हुई ॥२६-२९॥ गुरु को प्रणाम कर उसने ज्ञान दृष्टि से सब कुछ जान लेने वाले गुरु वशिष्ठ से सारी कथा कह दी। गुरु के अनुग्रह से राजा सगर ने उसी गुरु मुनि से ऐन्द्र, वारुण, ब्राह्म और आग्नेयास्त्र भी प्राप्त कर लिया और उसी मुनि से उसने एक खड्ग और वज्र के समान एक धनुष भी प्राप्त किया। तदनन्तर गुरु का आशीर्वाद पाकर मनस्वी सौम्य सगर लक्ष्मण गुरु को प्रणाम कर उनकी कृपा का वरदान प्राप्त कर शत्रु संहार के लिए चल पड़ा। उसी एक धनुष से उस शूर ने अपने सभी शत्रुओं को कुटुम्ब सहित यमलोक पहुँचा दिया ॥३०-३३॥ उसके धनुष से छूटे हुए बाणों की ज्वाला से कितने शत्रु नष्ट हो गए, कुछ भयत्रस्त हो गए और कितने तो देश छोड़कर भाग निकले। कितने शिर केश मुँड़वा कर डर के मारे वल्मीक पर जा बैठे, कितने शत्रुओं ने दाँतों तले तृण रखकर अधीनता स्वीकार की और कुछ नंगे होकर जल में छिप गए। प्राण रक्षा के लाभ से कितने शक, यवन एवं अन्य दूसरे राजा शीघ्र गुरु वसिष्ठ की शरण में गए। बाहु-पुत्र सगर ने जब सारी पृथ्वी जीत ली तब वह गुप्तचरों के द्वारा यह जान कर कि आचार्य वसिष्ठ के समीप शत्रु छिपे हुए हैं शीघ्र गुरु के समीप पहुँचा। मुनि वसिष्ठ ते