भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

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अष्टमोऽध्यायः ४७ समागतं बाहुसुतं निशम्य मुनिर्वशिष्ठः शरणागतांस्तान् । त्रातुं च शिष्याभिहितं च कर्तुं विचारयामास तदा क्षणेन ॥३८॥ चकार मुण्डाञ्शबरांयवनांलम्बमूर्द्धजान् । अन्धांश्च श्मश्रुलांत्सर्वान्मुण्डान्वेदबहिष्कृतान् ॥३६॥ वसिष्ठमुनिना तेन हतप्रायान्निरीक्ष्य सः । प्रहसन्नाह सगरः स्वगुरुं तपसो निधिम् ॥४०॥ सगर उवाच भो भो गुरो दुराचारानेतान्रक्षसि तान्वृथा । सर्वथाहं हनिष्यामि मत्पितुर्देशहारकान् ॥४१॥ उपेक्षेत समर्थः सन्धर्मस्य परिपन्थिनः । स एव सर्वनाशाय हेतुभूतो न संशयः ॥४२॥ बाधन्ते प्रथमं मत्ता दुर्जनाः सकलं जगत् । त एव बलहीनाश्चेद्भजन्तेऽत्यन्तसाधुताम् ॥४३॥ अहो मायाकृतं कर्म खलाः कश्मलचेतसः । तावत्कुर्वन्ति कार्याणि यावत्स्यात्प्रबलं बलम् ॥४४॥ दासभावं च शत्रूणां वारस्त्रीणां च सौहृदम् । साधुभावं च सर्पाणां श्रेयस्कामो न विश्वसेत् ॥४५॥ प्रहासं कुर्वते नित्यं यान्दन्तान्दर्शयन्खलाः । तानेव दर्शयन्त्याशु स्वसामर्थ्यविपर्यये ॥४६॥ पिशुना जिह्वया पूर्वं परुषं प्रवदन्ति च । अतीव करुणं वाक्यं वदन्त्येव तथाबलाः ॥४७॥ श्रेयस्कामो भवेद्यस्तु नीतिशास्त्रार्थकोविदः । साधुत्वं समभावं च खलानां नैव विश्वसेत् ॥४८॥ दुर्जनं प्रणतिं यान्तं मित्रं कैतवशीलिनम् । दुष्टां भार्या च विश्वस्तो मृत एव न संशयः ॥४६॥ मा रक्ष तस्मादेतान्वै गोरूपव्याघ्रकर्मिणः । हत्वैतानखिलान् दुष्टांस्त्वत्प्रसादान्महीं भजे ॥५०॥ वशिष्ठस्तद्वचः श्रुत्वा सुप्रीतो मुनिसत्तमः । कराभ्यां सगरस्याङ्गं स्पृशन्निदमुवाच ह ॥५१॥ बाहु पुत्र सगर का आश्रम में आना सुना तो शीघ्र ही शरणागत शत्रुओं की रक्षा का उपाय और शिष्य की प्रार्थना का उत्तर सोच निकाला। लम्बे-लम्बे केश रखने वाले शबर और यवनों के बाल मुंड़वा दिये और वेद विमुख उन दाढ़ी रखने वाले अन्धों की दाढ़ी मुंड़वा कर मुण्डी बना दिया । मुनि वशिष्ठ द्वारा शत्रुओं की यह दशा देखकर राजा ने उनको मरा सा समझ लिया और हँसकर तपोनिधि गुरु वसिष्ठ से कहा ॥३४-४०॥ सगर बोला- हे गुरुदेव ! आप इन दुराचारी शत्रुओं की क्यों व्यर्थ में रक्षा कर रहे हैं ? मेरे पिता का सर्वस्व अपहरण करने वाले इन शत्रुओं को अवश्य मारूँगा । जो समर्थ होते हुए भी धर्मद्रोही शत्रुओं की उपेक्षा करता है अन्त में वे ही शत्रु उसके सर्वनाश का कारण बनते हैं। (बल से) उन्मत्त दुर्जन व्यक्ति पहले तो सारे संसार को कष्ट पहुँचाते हैं, पर बलहीनदशा में वे ही अत्यन्त साधु बन जाते हैं। अहो ! दुष्ट हृदय पामर जनों की विचित्र माया है । वे तब तक ही अच्छे कार्य करते हैं जब तक उनकी शक्ति नहीं बढ़ जाती है। कल्याणેચ્છु व्यक्ति को शत्रुओं के दास-भाव, वेश्याओं की सहृदयता और साँपों की सरलता पर कभी भी विश्वास नहीं करना चाहिए ॥४१-४५॥ दुष्ट जन विभव-काल में जिन दाँतों को दिखाकर (अट्टहास कर) दूसरों की हंसी उड़ाते हैं, हीन दशा आ जाने पर उन्हीं दाँतों को दिखाकर अपनी दीनता को दिखाते हैं । धूर्त शत्रु जिस जिह्वा से पहले बढ़-चढ़ कर बातें करते हैं, निर्बल हो जाने पर उसी जीभ से करुण वाक्य बोलते हैं। जो श्रेय चाहने वाले व्यक्ति नीति कुशल होते हैं वे दुष्टों के साधुभाव और उनके सौम्य व्यवहार पर कभी भी विश्वास नहीं करते हैं । नम्र होने वाले शत्रु, कपट परायण मित्र एवं दुष्ट भार्या पर जो विश्वास करता है, वह मरा हुआ ही है, इसमें कुछ सन्देह नहीं ॥४६-४६॥ इसलिए गुरुदेव ! आप इन बाघ के समान हिंसक परन्तु इस समय गाय के समान दीन शत्रुओं की रक्षा मत कीजिए । आज मैं आपकी कृपा से इन दुष्टों का वधकर सम्पूर्ण पृथ्वी का उपभोग करूँगा । मुनिश्रेष्ठ वशिष्ठ शिष्य की नीतियुक्त बातों को सुनकर प्रसन्न हो गए और हाथ से सगर के अंगों को स्नेहपूर्वक सहलाते हुए यह बोले ॥५०-५१॥