भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

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४८ नारदीयपुराणम् वसिष्ठ उवाच साधु साधु महाभाग सत्यं वदसि सुव्रत । तथापि मद्वचः श्रुत्वा परां शान्तिं लभिष्यसि ॥५२॥ मयैते निहताः पूर्वं त्वत्प्रतिज्ञाविरोधिनः । हतानां हनने कीर्तिः का समुत्पद्यते वद ॥५३॥ भूमीश जन्तवः सर्वे कर्मपाशेन यन्त्रिताः । तथापि पापैर्निहताः किमर्थं हंसि तान्पुनः ॥५४॥ देहस्तु पापजनितः पूर्वमेवैनसा हतः । आत्मा ह्यभेद्यः पूर्णत्वाच्छास्त्राणामेष निश्चयः ॥५५॥ स्वकर्मफलभोगानां हेतुमात्रा हि जन्तवः । कर्माणि दैवमूलानि दैवाधीनमिदं जगत् ॥५६॥ यस्माद्दैवं हि साधूनां रक्षिता दुष्टशिक्षिता । ततो नरैरस्वतन्त्रैः किं कार्यं साध्यते वद ॥५७॥ शरीरं पापसम्भूतं पापेनैव प्रवर्तते । पापमूलमिदं ज्ञात्वा कथं हन्तुं समुद्यतः ॥५८॥ आत्मा शुद्धोऽपि देहस्थो देहीति प्रोच्यते बुधैः । तस्मादिदं वपुर्भूप पापमूलं न संशयः ॥५६॥ पापमूलवपुर्हन्तुः का कीर्तिस्तव बाहुज । भविष्यतीति निश्चित्य नैतांहिसीस्ततः सुत ॥६०॥ इति श्रुत्वा गुरोर्वाक्यं विरराम स कोपतः । स्पृशन्करेण सगरं नन्दनं मुनयस्तदा ॥६१॥ अथाथर्ववनिधिस्तस्य सगरस्य महात्मनः । राज्याभिषेकं कृतवान्मुनिभिः सह सुव्रतैः ॥६२॥ भार्याद्वयं च तस्यासीत्केशिनी सुमतिस्तथा । काश्यपस्य विदर्भस्य तनये मुनिसत्तम ॥६३॥ राज्ये प्रतिष्ठिते दृष्ट्वा मुनिरौर्वस्तपोनिधिः । वनादागत्य राजानं संभाव्य स्वाश्रमं ययौ ॥६४॥ कदाचित्तस्य भूपस्य भार्याभ्यां प्रार्थितो मुनिः । वरं ददावपत्यार्थमौर्वो भार्गवमन्त्रवित् ॥६५॥ वशिष्ठ बोले—महाभाग ! धन्य हो धन्य हो ! सुव्रत ! ठीक हो कह रहे हो । फिर भी मेरी बातों को सुनो, तुमको परम शान्ति मिलेगी। तुम्हारी प्रतिज्ञा के विरुद्ध आचरण करने वाले इन शत्रुओं को तो मैंने पहले ही मार डाला है। सोचो तो सही इन जीवन हीनों को पुनः मारने से कौन सा यश प्राप्त करोगे। भूपति ! सब प्राणी अपने कर्मों के बन्धन से बँधे हुए हैं। इसके अतिरिक्त ये अपने पापों से स्वयं मार डाले गए हैं। अब पुनः इनको क्यों मारना चाहते हो ? पाप से प्राप्त शरीर तो पापों के कारण पहले ही नष्ट हो गया, केवल आत्मा अभिन्न अविनाशी है, ऐसा शास्त्रों का एकमात्र निर्णय है। ये प्राणी तो अपने पूर्व कृत कर्मों को भोगने के लिए एक निमित्त मात्र हैं, कर्म दैव के अधीन हैं। इस प्रकार यह सारा जगत् दैवाधीन है ॥५२-५६॥ यतः दैव ही साधुओं का रक्षक और दुष्टों को शिक्षा देने वाला है अतः दैवाधीन, परतन्त्र मनुष्य क्या कर सकते हैं, यह बताओ । यह शरीर पाप से ही उत्पन्न हुआ है और पाप की प्रेरणा से ही प्रत्येक कार्यों को करता है तो इन सम्पूर्ण कार्य कलापों को पाप पर ही आश्रित समझ कर क्यों इनका वध करने पर तुले हुए हो ? शुद्ध-बुद्ध होता हुआ भी यह आत्मा देहस्थ होने के कारण विद्वानों द्वारा देही (शरीर वाला) कहा जाता है। इसलिए भूपाल ! यह शरीर ही पापों का मूल है इसमें कुछ सन्देह नहीं । बाहुतनय ! इस पाप मूल शरीर को मारकर तुम कौन सी कीर्ति प्राप्त करोगे ? यह सोच समझ कर तुम निश्चय कर लो, तब इनको मारो ॥५७-६०॥ गुरु की इन बातों को सुनकर वह सगर क्रोध से विरत हो गया । शिष्य की शान्ति मुद्रा को देखकर मुनि अपने प्रिय शिष्य के अंगों का स्नेह से स्पर्श करने लगे । इसके पश्चात् अथर्ववेद के ज्ञाता गुरु ने तपस्वी मुनियों के सहयोग से उस महात्मा सगर का राज्याभिषेक किया। मुनिश्रेष्ठ ! उस राजा की दो स्त्रियाँ थीं। एक का नाम केशिनी और दूसरी का नाम सुमति था। दोनों विदर्भ नरेश काश्यप की कन्या थीं। तपोनिधि मुनि और्व राजा सगर को राज्यासन पर प्रतिष्ठित जानकर वन से आये और उसको उपदेश देकर अपने आश्रम को लौट गए ॥६१-६४॥ किसी समय उन दोनों राजपत्नियों ने पुत्र कामना से और्व मुनि को प्रार्थनापूर्वक बुलाया।