बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअष्टमोऽध्यायः ४६ क्षणं ध्यानस्थितो भूत्वा त्रिकालज्ञो मुनीश्वरः । केशिनीं सुमतिं चैव इदमाह प्रहर्षयन् ॥६६॥ और्व उवाच एका वंशधरं चैकमन्या षड्युतानि च । अपत्यार्थं महाभागे वृणुतां च यथेप्सितम् ॥६७॥ अथ श्रुत्वा वचस्तस्य मुनेरौर्वस्य नारद । केटिन्येकं सुतं वव्रे वंशसन्तानकारणम् ॥६८॥ तथा षष्टिसहस्राणि सुमत्य। ह्यभवन्सुताः । नाम्नासमंजाः केशीन्यास्तनयो मुनिसत्तम ॥६६॥ असमंजास्तु कर्माणि चकारोन्मत्तचेष्टितः । तं दृष्ट्वा सागराः सर्वे ह्यासन्दुर्वृत्तचेतसः ॥७०॥ तद्बालभावं संदुष्टं ज्ञात्वा बाहुसुतो नृपः । चिन्तयामास विधिवत्पुत्रकर्म विगर्हितम् ॥७१॥ अहो कष्टतरा लोके दुर्जनानां हि संगतिः । कारुकैस्ताड्यते वह्निरयःसंयोगभावतः ॥७२॥ अंशुमान्नाम तनयो बभूव ह्यसमंजसः । शास्त्रज्ञो गुणवान्धर्मी पितामहहिते रतः ॥७३॥ दुर्वृत्ताः सागराः सर्वे लोकोपद्रवकारिणः । अनुष्ठानवतां नित्यमन्तराया भवन्ति ते ॥७४॥ हुतानि यानि यज्ञेषु हवींषि विधिवद्विजैः । बुभुजे तानि सर्वाणि निराकृत्य दिवौकसः ॥७५॥ स्वर्गादाहृत्य सततं रम्भाद्या देवयोषितः । भजन्ति सागरास्ता वै कचग्रहबलात्कृताः ॥७६॥ पारिजातादिवृक्षाणां पुष्पाण्याहृत्य ते खलाः । भूषयंति स्वदेहानि मद्यपानपरायणाः ॥७७॥ साधुवृत्तीः समाजह्रुः सदाचाराननाशयन् । मित्रैश्च योद्धुमारब्धा बलिनोऽत्यन्तपापिनः ॥७८॥ एतद्दृष्ट्वातिदुःखार्ता देवा इंद्रपुरोगमाः । विचारं परमं चक्रू रेतेषां नाशहेतवे ॥७६॥ निश्चित्य विबुधाः सर्वे पातालान्तरगोचरम् । कपिलं देवदेवेशं ययुः प्रच्छन्नरूपिणः ॥८०॥ भार्गव मंत्र के ज्ञाता मुनि ने उन दोनों को पुत्र प्राप्ति का वर दिया। क्षण भर ध्यान मग्न होकर त्रिकालज्ञ मुनि ने केशिनी और सुमति को प्रसन्न करते हुए कहा ॥६५-६६॥ और्व बोले- महाभागे ! एक को वंश बढ़ाने वाला एक पुत्र और दूसरे को साठ हजार बलशाली पुत्र होंगे, इनमें से इच्छानुसार वरदान स्वयं स्वीकार कर लो। नारद ! जितेन्द्रिय और्व मुनि की आज्ञा को सुनकर केशिनी ने वंश विस्तार करने वाले एक पुत्र होने का वर माँगा। और सुमति के साठ हजार पुत्र हुए। मुनिश्रेष्ठ ! केशिनी के पुत्र का नाम असमंजस् रखा गया। असमंजस् अपने राजमद के कारण अनर्थाचरण करने लगा। उसके अनुचित कार्यों को देखकर सगर के और पुत्र भी उपद्रवी हो गए। बाहुसुत राजा सगर पुत्रों की यह स्थिति देखकर उनके बुरे कर्मों पर विचार करने लगा। 'अहो! दुर्जनों की संगति संसार में अत्यन्त कष्टप्रद है; क्योंकि लोहे की छेनी के पा जाने से ही शिल्पी पत्थर पर चोट मारता और अग्नि उत्पन्न करता है ॥६७-७२॥ असमंजस् के अंशुमान् नामक पुत्र हुआ जो अत्यन्त गुणी, शास्त्रज्ञ, धार्मिक और पितामह की सेवा में लगा रहता था। इधर वे दुष्ट सगर-पुत्र लोक में उपद्रव मचाने लगे, नित्यप्रति यज्ञ करने वाले याज्ञिकों के यज्ञानुष्ठान में बाधा डालने लगे। द्विजगण यज्ञों में विधिपूर्वक जो कुछ हवन करते थे, उसको देवताओं का अनादर करके वे दुष्ट स्वयं खा जाते थे। स्वर्ग से रम्भा आदि अप्सराओं को केश पकड़ कर हठात् खींच लाते थे और उनका यथेच्छ भोग करते थे। वे दुष्ट मद्यपान कर मतवाले रहते थे पारिजात आदि देव वृक्षों के फूल तोड़ लाते थे और उससे अपने को सजाते थे ॥७३-७७॥ साधु आचरण सर्वथा लुप्त हो गए, सदाचार का उन दुष्टों ने नाश कर दिया। अत्यन्त पापी और बली वे मित्रों से ही युद्धकरने लगे। यह अनर्थ देखकर इन्द्र आदि प्रमुख देवता दुःख से कातर हो उठे और उन दुष्टों के नाश के उपाय सोचने लगे। आपस में विचार विनिमय कर वे देवता गुप्त रूप से पाताल में निवास करने वाले कपिल मुनि के पास गए, जो परम आनन्द के ७-ना० पु०