भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

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पृष्ठ 69

५० नारदीयपुराणम् ध्यायन्तमात्मनात्मानं परानन्दैकविग्रहम् । प्रणम्य दण्डवद् भूमौ तुष्टुवुस्त्रिदशास्ततः ॥८१॥ देवा ऊचुः नमस्ते योगिने तुभ्यं साङ्ख्ययोगरताय च । नररूपप्रतिच्छन्नविष्णवे जिष्णवे नमः ॥८२॥ नमः परेशभक्ताय लोकानुग्रहहेतवे । संसारारण्यदावाग्ने धर्मपालनसेतवे ॥८३॥ महते वीतरागाय तुभ्यं भूयो नमो नमः । सागरैः पीडितानस्मांस्त्रायस्व शरणागतान् ॥८४॥ कपिल उवाच ये तु नाशमिहेच्छन्ति यशोबलधनायुषाम् । त एव लोकान्बाधन्ते नात्राश्चर्यं सुरोत्तमाः ॥८५॥ यस्तु बाधितुमिच्छेद्य जनान्निरपराधिनः । तं विद्यात्सर्वलोकेषु पापभोगरतं सुराः ॥८६॥ कर्मणा मनसा वाचा यस्त्वन्यान्बाधते सदा । तं हन्ति दैवमेवाशु नात्र कार्या विचारणा ॥८७॥ अल्पैरहोभिरेवैते नाशमेष्यन्ति सागराः । इत्युक्ते मुनिना तेन कपिलेन महात्मना । प्रणम्य तं यथान्यायं गता नाकं दिवौकसः ॥८८॥ अत्रान्तरे तु सगरो वसिष्ठाद्यैर्महर्षिभिः । आरेभे हयमेधाख्यं यज्ञं कर्तुमनुत्तमम् ॥८९॥ तद्यज्ञे योजितं सप्तितमपहृत्य सुरेश्वरः । पाताले स्थापयामास कपिलो यत्र तिष्ठति ॥९०॥ गूढविग्रहशक्त्रेण हतमश्वं तु सागराः । अन्वेष्टुं बभ्रमुर्लोकान् भूरादींश्च सुविस्मिताः ॥९१॥ अदृष्टसप्तयस्ते च पातालं गन्तुमुद्यताः । चक्रुर्महीतलं सर्वमेकैको योजनं पृथक् ॥९२॥ मृत्तिकां खनितां ते चोदधितीरे समाकिरन् । तद्द्वारेण गताः सर्वे पातालं सगरात्मजाः ॥९३॥

एकमात्र आधार परमात्मा के ध्यान में निमग्न थे । यह देखकर देवताओं ने साष्टांग दण्डवत् किया और स्तुति करने लगे ॥७८-८१॥ देवगण बोले—सांख्य योग में सर्वदा लीन रहने वाले तुम योगेश्वर को नमस्कार है । नर रूप में गुप्त रूप से रहने वाले जयशील विष्णु को नमस्कार है । परम प्रभु के भक्त, लोक पर अनुग्रह करने वाले, संसाररूपी अरण्य में, जो माया मोह रूपी अधर्म की दावाग्नि से जल रहा है, केवल स्वयं धर्म की प्रतिष्ठा करने वाले मुनि को नमस्कार है । तुम वीतराग महान् मुनि को वार-वार नमस्कार है । महामुनि ! सगर के पुत्रों से त्रस्त पीड़ित अपने इन शरणागत भक्तों की रक्षा कीजिए ॥८२-८४॥ कपिल बोले—सुरोत्तमवृन्द ! जो अपने यश, बल, धन और आयु का नाश चाहते हैं वे ही लोक को पीड़ा पहुँचाते हैं, अतः आश्चर्य करने की आवश्यकता नहीं है । देवगण ! जो निरपराध प्राणियों को बाधा पहुँचाना चाहता है, उसे सब लोकों में पाप-भोग करने में निरत समझना चाहिए । जो सर्वदा पूज्यों को मन, वचन और कर्म से पीड़ा पहुँचाते हैं उनको शीघ्र दैव विनष्ट कर देता है, इसमें शंका नहीं करनी चाहिए । ये सगर-पुत्र थोड़े दिनों में ही नष्ट हो जायेंगे, उस महात्मा कपिल मुनि की बातों को सुनकर वे देववृन्द यथोचित रीति से मुनि को प्रणाम कर स्वर्ग चले गये ॥८५-८८॥ इसी बीच राजा सगर वशिष्ठ आदि महर्षियों की अनुज्ञा से परमोत्तम अश्वमेध यज्ञ करने लगे । उस यज्ञ में अभिषिक्त अश्व को देवेन्द्र गुप्त रूप से चुराकर पाताल में जहाँ कपिल मुनि रहते थे, बाँध आये । यह देखकर सगर-पुत्र परम विस्मित हुए और पृथ्वी आदि लोकों को घोड़े का पता पाने के लिए छान डाले । घोड़े का पता न पाकर वे पाताल लोक जाने की तैयारी करने लगे । पृथक्-पृथक् एक-एक योजन भूतल को खोद कर खोदी हुई मिट्टी को समुद्र तट पर फैला दिया । उसी विवर द्वार से वे उद्धत सगर पुत्र पाताल में पहुँच गए ॥८६-९३॥ वहाँ मदोन्मत्त की भाँति विवेक को तिलाञ्जलि