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भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 640, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 640

एकसप्ततितमोऽध्यायः ६२१ भानुभिः करजैर्मंत्री वरैरंगानि कल्पयेत् । पूर्वोक्तरूपिणं ज्वालामालिनं नृहरिं स्मरेत् ॥१०५॥ लक्षं जपो दशांशं च जुहुयात्कपिलाघृतैः । रौद्रापस्मारभूतादिनाशकोऽयं मनूत्तमः ॥१०६॥ प्राणो माया नृसिंहश्च सृष्टिर्ब्रह्मास्त्रमीरितः । षडक्षरो महामंत्रः सर्वाभीष्टप्रदायकः ॥१०७॥ मुनिर्ब्रह्मा तथा छंदः पंक्तिर्देवोनृकेसरी । षड्दीर्घभाजा बीजेन षडंगानि समाचरेत् ॥१०८॥ पूर्वोक्तेनैव विधिना ध्यानं पूजां समाचरेत् । सिद्धेन मनुनानेन सर्वसिद्धिर्भवेन्नृणाम् ॥१०९॥ रमाबीजादिकोऽनुष्टुप्त्रयस्त्रिंशत्तशार्णवान्मनुः । प्रजापतिर्मुनिश्छंदोऽनुष्टुप् लक्ष्मीनृकेसरी ॥११०॥ देवता च पदैः सर्वैरंगांकल्पनमीरितम् । विन्यस्यैवं तु पंचांगं स्वात्मरक्षां समाचरेत् ॥१११॥ संस्पृशन् दक्षिणं बाहुं शरभस्य मनुं जपेत् । प्रणवो हृच्छिवायैति महते शरभाय च ॥११२॥ वह्निप्रियांतो मंत्रस्तु रक्षार्थे समुदाहृतः । अथवा राममंतांते परं क्षद्वितयं पठेत् ॥११३॥ अथवा केशवाद्यैस्तु रक्षां कुर्यात्प्रयत्नतः । केशवः पातु पादौ मे जंघे नारायणोऽवतु ॥११४॥ माधवो मे कटिं पातु गोविन्दो गुह्यमेव च । नाभिं विष्णुश्च मे पातु जठरं मधुसूदनः ॥११५॥ ऊरू त्रिविक्रमः पातु हृदयं पातु मे नरः । श्रीधरः पातु कंठं च हृषीकेशो मुखं मम ॥११६॥ पद्मनाभः स्तनौ पातु शीर्षं दामोदरोऽवतु । एवं विन्यस्य चांगेषु जपकाले तु साधकः ॥११७॥ निर्भयो जायते भूतवेतालप्रहराक्षसात् । पुनर्न्यसेत्प्रयत्नेन ध्यानं कुर्वन्समाहितः ॥११८॥ पुरस्तात्केशवः पातुः चक्री जांबूनदप्रभः । पश्चात्नारायणः शंखी नीलजीमूतसन्निभः ॥११९॥ उर्ध्वामिदीवरश्यामो माधवस्तु गदाधरः । गोविन्दो दक्षिणे पार्श्वे धन्वी चन्द्रप्रभो महान् ॥१२०॥ उत्तरे हलधृग्विष्णुः पद्मकंजलकसन्निभः । आग्नेय्यामर्विदाक्षो मुसली मधुसूदनः ॥१२१॥ त्रिविक्रमः खड्गपाणिर्नैर्ऋत्यां ज्वलनप्रभः । वायव्यां माधवो वज्री तरुणादित्यसन्निभः ॥१२२॥ नरसिंह हैं। छह दीर्घ मात्राओं से युक्त बीज मंत्र से षडंगन्यास करके पूर्वोक्त प्रकार से ध्यान-पूजन करना चाहिये। इस मंत्र के सिद्ध हो जाने से मनुष्यों को सकल सिद्धियां प्राप्त होती हैं। रमाबीज वाला मंत्र तैंतीस अक्षरों का है। इसके ऋषि प्रजापति हैं, छंद अनुष्टुप् हैं और देवता लक्ष्मी तथा नरसिंह हैं। मंत्र के पदों से अंगों की कल्पना करके पंचांगन्यास करते हुए आत्मरक्षा करे । दक्षिण भुजा का स्पर्श करते हुए "प्रणव...," इस शरभमंत्र का जप करे ॥१००-११३॥ अथवा राम मंत्र के अंत में दो 'क्ष' अक्षरों को जोड़ कर जप करे । अथवा 'केशव' आदि पढ़कर यत्नपूर्वक रक्षा करनी चाहिये 'केशव मेरे चरणों की रक्षा करे, नारायण जंघे की, माधव कटि की, गोविन्द गुह्यदेश की, विष्णु नाभि की, मधुसूदन उदर की, त्रिविक्रम ऊरु की, नर हृदय को, श्रीधर कंठ की, हृषीकेश मुख की, पद्मनाभ स्तनों की ओर दामोदर शिर की रक्षा करे, इस प्रकार जपकाल में अंगों का न्यास करके साधक भूत, वेताल, ग्रह तथा राक्षस से निर्भय हो जाता है । इसके बाद समाहित चित्त से यत्नपूर्वक (निम्नलिखित प्रकार से) ध्यान करते हुए पुनः न्यास करे-"सुवर्ण के समान प्रभा वाले चक्रधारी केशव अग्रभाग में रक्षा करें । काले बादल के समान आभा वाले चक्रधारी नारायण पृष्ठभाग में रक्षा करें । नील कमल के समान श्याम वर्ण वाले गदाधारी माधव ऊर्ध्वभाग में रक्षा करें । चंद्रमा के समान प्रभा वाले महान् धनुर्धारी गोविन्द दाहिने पार्श्व में रक्षा करें । कमल केसर के समान कान्ति वाले हलधारी विष्णु उत्तर दिशा में रक्षा करें । मुशलधारी कमलाक्ष मधुसूदन आग्नेय कोण में रक्षा करे । अग्नितुल्य प्रभा वाले खड्गपाणि त्रिविक्रम नैर्ऋत्यकोण में रक्षा करें । तरुण आदित्य के समान कान्ति वाले वज्रधारी माधव वायव्यकोण में रक्षा करें। पट्टिश आयुध