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भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 641, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 641

६२२ नारदीयपुराणम् ऐशान्यां पुण्डरीकाक्षः श्रीधरः पट्टिशावुधः । विद्युत्प्रभो हृषीकेश ऊर्ध्वं पातु समुद्गरः ॥१२३॥ अधश्च पद्मनाभो मे सहस्रांशुसमप्रभः । सर्वायुधः सर्वशक्तिः सर्वाद्यः सर्वतोमुखः ॥१२४॥ इन्द्रगोपप्रभः पायात्पाशहस्तोऽपराजितः । स बाह्याभ्यंतरे देहमव्याद्दामोदरो हरिः ॥१२५॥ एवं सर्वत्र निश्छिद्रं नामद्वादशपञ्जरम् । प्रविष्टोऽहं न मे किंचिद्भयमस्ति कदाचन ॥१२६॥ एवं रक्षां विधायाथ दुर्द्धर्षो जायते नरः । सर्वेषु नृहरेर्मन्त्रेष्वेवंविधिर्मतः ॥१२७॥ पूर्वोक्तविधिना सर्वं ध्यानपूजादिकं चरेत् । जितं ते पुण्डरीकाक्ष नमस्ते विश्वभावन ॥१२८॥ नमस्तेऽस्तु हृषीकेश महापुरुष ते नमः । इत्थं संप्रार्थ्य जप्त्वा च पठित्वा विसृजेद्विभुम् ॥१२९॥ एवं सिद्धे मनौ मन्त्री जायते सम्पदां पदम् । जयद्वयं श्रीमन्नृसिंहत्यष्टाणोऽयं मनूत्तमः ॥१३०॥ मुनिर्ब्रह्माथ गायत्री छन्दः प्रोक्तोऽस्य देवता । श्रीमाञ्जयन्नृसिंहस्तु सर्वाभीष्टप्रदायकः ॥१३१॥ सेंदुगोविंदपूर्वेण वियता सेन्दुना पुनः । षड्दीर्घाढ्येन कुर्वीत षडंगानि विशालधीः ॥१३२॥ ततो ध्यायेद्धृदि विभुं नृसिंहं चन्द्रशेखरम् ॥१३३॥ श्रीमन्नृकेसरितनो जगदेकबन्धोश्रीनीलकण्ठ करुणार्णव सामराज । वह्नीन्दुतीव्रकरनेत्र पिनाकपाणे शीतांशुशेखर रमेश्वर पाहि विष्णो ॥१३४॥ ध्यात्वैवं प्रजपेल्लक्षाष्टकं मन्त्री दशांशतः । साज्येन पायसान्नेन जुहुयात्प्राग्वदर्चनम् ॥१३५॥ तारो माया स्वबीजांते कर्णीशं वीरमीरयेत् । महाविष्णुं ततो ब्रूयाज्ज्वलंतं सर्वतोमुखम् ॥१३६॥ स्फुरद्वयं प्रस्फुरेति द्वयं घोरपदं ततः । वदेद्धोरतरं ते तुतनुरूपं च ठद्वयम् ॥१३७॥ प्रचटद्वयमाभाष्य कहयुग्मं च मद्वयम् । बन्धद्वयं घातयेति द्वयं वर्मास्त्रमीरयेत् ॥१३८॥ रखने वाले पुण्डरीकाक्ष श्रीधर ऐशान्य कोण में रक्षा करें। विद्युत् के समान प्रभा वाले तथा मुद्गर धारण करने वाले हृषीकेश ऊपर रक्षा करें । सहस्र किरणों के समान प्रभा वाले पद्मनाभ नीचे रक्षा करें । समस्त आयुधों से युक्त, सर्वशक्तिमान्, सब के आदि, सब ओर मुख वाले इंद्रगोप के समान प्रभा वाले, हाथों में पाश तथा अपराजिता धारण करने वाले दामोदर भगवान् बाहर-भीतर सब जगह शरीर की रक्षा करें । इस तरह छिद्रों से सर्वथा रहित बारह नाम रूपी पिंजरे में मैं प्रविष्ट हूँ, मुझे कभी कुछ भी भय नहीं है ॥११४-१२६॥” इस प्रकार रक्षा करने से मनुष्य दुर्जेय हो जाता है। नरसिंह के समस्त मंत्रों का यही विधान है। पूर्वोक्त विधि से ध्यान-पूजा करके प्रार्थना करे--“पुण्डरीकाक्ष ! आपकी जय हो । जगतकारण ! आपको नमस्कार है । हृषीकेश ! आपको नमस्कार है । महापुरुष ! आपको नमस्कार है ।” अनन्तर जप-पाठ कर विभु का विसर्जन करे ॥१२७-१२९॥ इस तरह मन्त्र सिद्ध हो जाने पर निखिल ऐश्वर्य प्राप्त होते हैं । “जयद्वयम्......” यह आठ अक्षरों का उत्तम मन्त्र है । इसके ऋषि ब्रह्मा हैं, छंद अनुष्टुप् है और देवता अखिलकामनादायक श्रीमान् नरसिंह हैं। सुधी साधक छह दीर्घ मात्राओं से युक्त बीज मन्त्र से षडंगन्यास कर हृदय में विभु चन्द्रशेखर नरसिंह का (इस प्रकार) ध्यान करे--“श्रीमन् ! नरसिंह ! सूक्ष्म ! जगत् के एकमात्र सुहृत् ! श्रीनीलकंठ ! करुणार्णव ! सामराज ! अग्नि तथा चन्द्रमा रूपी तीव्र हाथ और नेत्र वाले ! पिनाकपाणे ! चन्द्रशेखर ! रमेश्वर ! विष्णो ! मेरी रक्षा कीजिये ॥” इस प्रकार ध्यान कर आठ लाख मन्त्र जप करे और उसका दशांश घी एवम् खीर से हवन करे । “तारः......... अहम्” यह पचासी अक्षरों का मन्त्र है । इससे साधक की अभीष्टसिद्धि होती है । इसके

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