बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 642, कुल 1008 में से
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[Page Header] ६२३ | एकसप्ततितमोऽध्यायः
[Sanskrit Verses]
नृसिंहं भीषणं भद्रं मृत्युमृत्युं नमाम्यहम् । पञ्चाशीत्यक्षरो मन्त्रो भजतामिष्टदायकः ॥१३६॥ ऋषो ह्यघोरब्रह्माणौ तथा त्रिष्टुबनुष्टुभौ । छन्दसी च तथा घोरनृसिंहो देवता मतः ॥१४०॥ ध्यानाचंनादिकं चास्य कुर्यादानुष्टुभं सुधीः । विशेषात्मन्त्रवर्योऽयं सर्वरक्षाकरो मतः ॥१४१॥ बीजं जययुगं पश्चान्नृसिंहेत्यष्टवर्णवान् । ऋषिः प्रजापतिश्चास्थानुष्टुप्छन्द उदाहृतम् ॥१४२॥ विदारणनृसिंहोऽस्य देवता परिकीर्तितः । जं बीजं हं तथा शक्तिर्विनियोगोऽखिलाप्तये ॥१४३॥ दीर्घोढचेन नृसिंहेन षडंगन्यासमाचरेत् । रौद्रं ध्यायेन्नृसिंहं तु शत्रुवक्षोविदारणम् ॥१४४॥ नखदंष्ट्रायुधं भक्ताभयदं श्रीनिकेतनम् । तप्तहाटककेशांतज्वलत्पावकलोचनम् ॥१४५॥ वज्राधिकनखस्पर्शं दिव्यसिंह नमोऽस्तु ते । मुनिर्ब्रह्मा समाख्यातोऽनुष्टुप्छंदः समीरितः ॥१४६॥ देवतास्य रदार्णस्य दिव्यपुर्वो नृकेसरी । पदैश्चतुर्भिः सर्वेण पंचांगानि समाचरेत् ॥१४७॥ ध्यानपूजादिकं सर्वं प्राग्वत्प्रोक्तं मुनीश्वर । पूर्वोक्तानि च सर्वाणि कार्याण्यायांति सिद्धताम् ॥१४८॥ तारो नमो भगवते नरसिंहाय हृच्च ते । जस्तेजसे आविराविर्भव वज्रनखांततः ॥१४९॥ वज्रदंष्ट्रेति कर्मांते त्वासयाक्रंदयद्वयम् । तमो ग्रसद्वयं पश्चात्स्वाहा॑ते चाभयं ततः ॥१५०॥ आत्मन्यंते च भूयिष्ठा ध्रुवो बीजांतिमो मनुः । द्विषष्ट्यर्णोऽस्य मुन्यादि सर्वं पूर्ववदीरितम् ॥१५१॥ तारो नृसिंहबीजं च नमो भगवते ततः । नरसिंहाय तारश्च बीजमस्य यदा ततः ॥१५२॥ रूपाय तारः स्वबीजं कूर्मरूपाय तारकम् । बीजं वराहरूपाय तारो बीजं नृसिंहतः ॥१५३॥ रूपाय तार स्वं बीजं वामनांते च रूपतः । पापध्रुवतयं बीजं रामाय निगमादितः ॥१५४॥ बीजं कृष्णाय तारांते बीजं च कलिकने ततः । जयद्वयं ततः शालग्रामांते च निवासिने ॥१५५॥ दिव्यसिंहाय डेंन्तः स्यात्स्वयंभूः पुरुषाय हृत् । तारः स्वं बीजमित्येष महासाम्राज्यदायकः ॥१५६॥ नृसिंहमन्त्रः खांकाणो मुनिरत्रिः प्रकीर्तितः । छन्दोऽतिजगती प्रोक्तं देवता कथिता मनोः ॥१५७॥ दशावतारो नृहरि बीजं खं शक्तिरव्ययः । षड्दीर्घाढचेन बीजेन कुत्वांगानि च भावयेत् ॥१५८॥
[Hindi Translation / Commentary]
ऋषि अघोर एवम् ब्रह्मा हैं, छंद त्रिष्टुप् एवम् अनुष्टुप् हैं और देवता घोर नरसिंह हैं। धीमान् व्यक्ति इसके ध्यान- पूजन संक्षेप से करें । यह उत्तम मन्त्र सब प्रकार से रक्षा करने वाला है । "बोजम्········”यह आठ अक्षरों का मन्त्र है । इसके ऋषि प्रजापति, छंद अनुष्टुप् तथा देवता विदारण नरसिंह कहे गये हैं । 'जं' बीज है तथा 'हं' शक्ति है । सर्वप्राप्ति के लिये इसका विनियोग किया जाता है ॥१३०-१४३॥ दीर्घमात्रा से युक्त नरसिंह मन्त्र से षडंगन्यास कर शत्रु के हृदय को विदीर्ण करने वाले, नख तथा दंष्ट्रा रूपी आयुध वाले, भक्तों को अभयदान देने वाले, श्री के निवासस्थान, संतप्त सुवर्ण के समान केश वाले और जाज्वल्यमान अग्नि के समान नेत्र वाले भयानक नरसिंह का ध्यान करे । "वज्राधिक········”यह मन्त्र है । इसके मुनि ब्रह्मा हैं, छंद अनुष्टुप् हैं और देवता दिव्य रूप नरसिंह हैं। चार पादों एवम् वर्णों से पंचांगन्यास करना चाहिये । मुनीश्वर ! ध्यान-पूजन आदि तो पूर्ववत् ही समझो । उक्त प्रकार आचरण करने से सब कार्य सिद्ध होते हैं। “तार·········ध्रुवः” यह बासठ अक्षरों वाला मन्त्र है। इसके मुनि आदि सब कुछ यथापूर्व ही समझना चाहिये । “तारो नरसिंह बीजम्··········स्वं बीजम्” यह मन्त्र महासाम्राज्यदायक है । इसके मुनि अत्रि, छंद अतिजगती और देवता नरहरि हैं। दशावतार नरहरि बीज हैं और अव्यय नरसिंह शक्ति हैं। छह दीर्घ मात्राओं से युक्त बीज से अंगन्यास करके (नरसिंह का) ध्यान करना चाहिए--“अनेक चन्द्रमा के समान मनोहर, लक्ष्मी के मुख पर दृष्टिपात करने वाले और दश अवतार धारण करने वाले नरसिंह आनन्दवृद्धि करें ।" अनन्तर दस हजार मन्त्र का जप कर उसका दशांश खीर से होम करे