बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 650, कुल 1008 में से
संदर्भ में पढ़ेंअथ द्विसप्ततितमोऽध्यायः सनत्कुमार उवाच अथ रामस्य मनवो वक्ष्यंते सिद्धिदायकाः । येषामाराधनान्मर्त्यास्तरंति भवसागरम् ॥१॥ सर्वेषु मंत्रवर्येषु श्रेष्ठं वैष्णवमुच्यते । गाणपत्येषु सौरेषु शाक्तशैवेष्वभीष्टदम् ॥२॥ वैष्णवेष्वपि मंत्रेषु राममंत्राः फलाधिकाः । गाणपत्यादिमंत्रेभ्यः कोटिकोटिगुणाधिकाः ॥३॥ विष्णुशय्यास्थितो वह्निरिंदुभूषितमस्तकः । रामाय हृदयांतोऽयं महाघौघविनाशनः ॥४॥ सर्वेषु राममंत्रेषु ह्यतिश्रेष्ठः षडक्षरः । ब्रह्महत्यासहस्राणि ज्ञाताज्ञातकृतानि च ॥५॥ स्वर्णस्तेयसुरापानगुरुतल्पाद्युतानि च । कोटिकोटिसहस्राणि ह्युपपापानि यानि वै ॥६॥ मंत्रस्योच्चारणात्सद्यो लयं यांति न संशयः । ब्रह्मा मुनिः स्याद्गायत्री छंदो रामश्च देवता ॥७॥ आद्यं बीजं च हृच्छक्तिर्विनियोगोऽखिलाप्तये । षड्दीर्घभाजा बीजेन षडंगानि समाचरेत् ॥८॥ ब्रह्मरंध्रे भ्रुवोर्मध्येहृन्नाभ्योर्गुह्यपादयोः । मंत्रवर्णान्क्रमान्न्यस्य केशवादीन्प्रविन्यसेत् ॥६॥ पीठन्यासादिकं कृत्वा ध्यायेद्धृदि रघूत्तमम् । कालांभोधरकांतं च वीरासनसमास्थितम् ॥१०॥ ज्ञानमुद्रां दक्षहस्ते दधतं जानुनीतरम् । सरोरुहकरां सीतां विद्युदाभां च पार्श्वगाम् ॥११॥ पश्यंतीं रामवक्त्राब्जं विविधाकल्पभूषिताम् । ध्यात्वैवं प्रजपेद्वर्णलक्षं मंत्री दशांशतः ॥१२॥ अध्याय ७३ लक्ष्मण तथा राम के मंत्रों का जप-विधान सनत्कुमार बोले—अब मैं राम के सिद्धिदायक मंत्रों को बतलाऊँगा, जिनकी आराधना करने से मनुष्य भवसागर को पार करते हैं। समस्त उत्तम मंत्रों से अर्थात् गणपति, सूर्य, शक्ति तथा शिव के मंत्रों से विष्णु का मंत्र श्रेष्ठ तथा कल्याणदायक माना गया है। परन्तु वैष्णव मंत्रों में भी राममंत्र अधिक फलदायक है। गणपति आदि के मंत्रों से तो ये करोड़ों गुना अधिक फल देते हैं। "विष्णु..." यह षडक्षर राममंत्र समस्त राममंत्रों से अत्युत्तम है। सहस्रों ब्रह्महत्यायें, जानकर या बिना जाने किये गये पाप, सोने की चोरी, मद्यपान, गुरुपत्नीसंभोग तथा सहस्रों-करोड़ों जितने पातकोपपातक हैं, वे इस मंत्र के उच्चारण करते हैं। तुरन्त नष्ट हो जाते हैं, इसमें संशय नहीं। इस मंत्र के ऋषि ब्रह्मा हैं, छन्द गायत्री है, देवता राम हैं और हृच्छक्ति आद्य बीज हैं। सर्वप्राप्ति के लिये इसका विनियोग किया जाता है। छह दीर्घ मात्राओं से युक्त बीजमंत्र से षडंगन्यास कर ब्रह्मरंध्र, भौंहों के मध्य, हृदय, नाभि, गुह्यदेश तथा दोनों चरणों में मंत्रवर्णों का क्रमशः न्यास कर केशव आदि का न्यास करे ॥१-९॥ फिर पीठन्यास आदि करके हृदय में श्याम मेघ के समान कांति वाले, वीरासन लगाकर बैठने वाले, घुटनों के बीच दाहिने हाथ में ज्ञानमुद्रा धारण करने वाले रघुवर राम एवम् उनकी बगल में बैठकर उनके मुखारविंद का अवलोकन करने वाली, विद्युत् के समान कान्ति वाली, कर में कमल धारण करने वाली, विविध आभूषणों से आभूषित सीता का ध्यान करे।