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भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 649, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 649

तद्वहिः सप्त नद्यश्च तद्वाह्ये तु ग्रहान्नव । तद्वाह्ये पर्वतानष्टौ नक्षत्राणि च तद्वहिः ॥४६॥ एवं पंचदशावृत्त्या संपूज्य तुरगाननम् । वागीश्वरसमो वाचि धनैर्धनपतिर्भवेत् ॥४७॥ एवं सिद्धे मनौ मंत्रो प्रयोगांन्कर्तुमहं ति । अष्टोत्तरसहस्रं तु शुद्धं वार्यभिमंत्रितम् ॥४८॥ बीजेन मासमात्रं यः पिबेद्धीमान् जितेन्द्रियः । जन्ममूकोऽपि स नरो वाक्सिद्धिं लभते ध्रुवम् ॥४९॥ वियद्भगूस्थ्यमर्धीशबिंदुमद्बीजमीरितम् । चंद्रसूर्योपरागे तु पात्रे रुक्ममये क्षिपेत् ॥५०॥ दुग्धं गवां ततो मंत्री कंठमात्रोदके स्थितः । स्पर्शाद्विमोक्षपर्यंतं प्रजपेन्मंत्रमादरात् ॥५१॥ पिबेत्तत्सर्वमचिरात्तस्य सारस्वतं भवेत् । ज्योतिष्मतीलताबीजं दिनेष्वेकैकवर्द्धितम् ॥५२॥ अष्टोत्तरशतं यावद्भक्षयेदभिमंत्रितम् । सरस्वत्यवतारोऽसौ सत्यं स्याद्भूवि मानवः ॥५३॥ किं बहूक्तेन विप्रेंद्र मनोरस्य प्रसादतः । सर्ववेदागमादीनां व्याख्याता ज्ञानवान् भवेत् ॥५४॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे बृहदुपाख्याने सनत्कुमारविभागे तृतीयपादे हयग्रीवोपासना- निरूपणं नाम द्विसप्ततितमोऽध्यायः ॥७२॥

पूजन करे। इस प्रकार पन्द्रह बार हयग्रीव की अर्चना करने वाला व्यक्ति वाणी में बृहस्पति के समान और धन में कुबेर के समान होता है। उक्त प्रकार से मंत्र को सिद्ध कर लेने पर ही मंत्री मंत्र का प्रयोग कर सकता है। एक हजार आठ बार शुद्ध जल को बीज मंत्र से अभिमंत्रित कर एक मास तक इन्द्रियसंयमपूर्वक उसका पान करने से वह मनुष्य भी निःसंदेह सिद्धवाक् हो जाता है, जो जन्मतः गूंगा है। "वियत्...." यह बीज मंत्र है ॥ ४१-४९॥ चन्द्रग्रहण या सूर्यग्रहण के समय सुवर्ण के पात्र में गो का दूध डालकर स्वयं कंठ प्रमाण जल में खड़ा होकर ग्रहण के स्पर्श से लेकर मोक्ष पर्यन्त आदरपूर्वक इस मंत्र का जप करते हुए उस दूध का पान करने से मनुष्य शीघ्र वाक्सिद्धि को प्राप्त कर लेता है। एक सौ आठ ज्योतिष्मतीलता (मालकांगनी) के बीज को उक्तमंत्र से अभिमंत्रित कर एक-एक वृद्धि क्रम से भक्षण करने से मानव पृथ्वी पर सरस्वती का अवतार माना जाता है, यह सत्य बात है। विप्रवर्य ! बहुत क्या कहें, इस मंत्र के प्रभाव से मनुष्य समस्त वेदादि शास्त्रों का व्याख्याता तथा ज्ञाता होता है ॥५०-५४॥ श्री नारदीयपुराण के पूर्वार्ध में बृहदुपाख्यानयुक्त तृतीय पाद में हयग्रीवोपासनानिरूपण नामक बहत्तरवां अध्याय समाप्त ॥७२॥