बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 648, कुल 1008 में से
संदर्भ में पढ़ेंत्रिसप्ततितमोऽध्यायः ६२६ हुत्वा लवंगैर्मध्वाक्तैरपामार्गदलैस्तु वा । अयुतं साध्यनामाद्यं स वश्यो जायते ध्रुवम् ॥३०॥ अष्टोत्तरशतं हुत्वा ह्यपामार्गदलैः शुभैः । तावज्जप्त्वा च सप्ताहान्महारोगात्प्रमुच्यते ॥३१॥ उहिरत्पद्ममाभाष्य प्रलवोहीय शब्दतः । सर्ववागीश्वरेत्यंते प्रवदेदीश्वरेत्यथ ॥३२॥ सर्ववेदमयांदित्यथपदान्ते सर्वमीरयेत् । बोधयद्वितवांतोऽयं मन्त्रस्तारादिरिरितः ॥३३॥ ऋषिर्ब्रह्मास्य निर्दिष्टश्छंदोऽनुष्टुबुवाहृतम् । देवता स्याद्धयग्रीवो वागीश्वर्यप्रदो विभुः ॥३४॥ तारेण पादैर्मलस्थ पञ्चांगानि प्रकल्पयेत् । तुषाराद्रिसमच्छायं तुलसीदाम भूषितम् ॥३५॥ तुरङ्गवदनं वन्दे तुंगसारस्वतः पदम् । ध्यात्वैवं प्रजपेन्मंत्रमयुतं तद्दशांशतः ॥३६॥ मध्वक्तैः पायसैर्हुत्वा विमलादिसमन्विते । पूजयेद्वैष्णवे पीठे मूर्ति संकल्य्य मूलतः ॥३७॥ कणिकायां चतुर्दिक्षु यजेत्पूर्वादितः क्रमात् । सनंदनं च सनकं श्रियं च पृथिवीं तथा ॥३८॥ तद्बहिर्दिक्षु वेदांश्च षट्कोणेब ततोऽर्चयेत् । निरुक्तं ज्योतिषं पश्चाद्यजेद्व्याकरणं ततः ॥३६॥ कल्पं शिक्षां च छंदांसि वेदांगानि त्विमानि वै । ततोऽष्टदलमूले तु मातरोऽष्टौ समर्पयेत् ॥४०॥ वक्रतुं डादिकानष्टौ दलमध्ये प्रपूजयेत् । दलाग्रेष्वर्चयेत्पश्चात्साधकश्चाष्टभैरवान् ॥४१॥ असितांगं रुरुं चैव भीषणं रक्तनेत्रकम् । वटुकं कालदमनं दंतुरं विकटं तथा ॥४२॥ तद्बहिः षोडशदलेष्ववतारान्हरेर्दश । शंखं चक्रं गदां पद्मं नंदकं शाङ्ग मेव च ॥४३॥ तद्बहिर्भूगृहे शक्रमुखान्दश दिगीश्वरान् । वज्राद्यांस्तद्बहिश्श्वेष्ट्वा द्वारेषु च ततः क्रमात् ॥४४॥ महागणपतिं दुर्गा क्षेत्रेशं बटुकं तथा । समस्तप्रकटाद्याश्च योगिन्यस्तद्बहिर्भवेत् ॥४५॥ संस्मरण कर दश हजार कमलों से होम करने से सर्वलक्षणसंपन्न अकंटक राज्य की प्राप्ति होती है। जिसका नाम लेकर दश सहस्र बार मधुयुक्त लवंगों या अपामार्ग के पत्रों से हवन किया जायगा, वह अवश्य वशीभूत होगा। सात दिन तक एक सौ आठ बार मंत्र-जप और उतनी ही संख्या में हवन करने से महारोग दूर होता है। "उद्धिरत्यदम्... बोधयद्विन्वे" यह तारादि मंत्र कहा गया है ॥२५-३३॥ इसके ऋषि ब्रह्मा हैं, छंद अनुष्टुप् है और देवता वाणी एवम् ऐश्वर्य को देने वाले विभु हयग्रीव हैं। तारकमंत्र से पंचांगन्यास करके हिमपर्वत के समान आभा वाले, तुलसीमाला से विभूषित, अश्व के समान मुख वाले और उत्तुंग बिल्वदंड के समान चरण वाले देव का ध्यान करे। अनन्तर दश हजार मंत्र का जप कर मधुयुक्त खीर से हवन करे। फिर निर्मल वैष्णव पीठ पर मूलमंत्र से मूर्ति की कल्पना कर चारों दिशाओं में पूर्व आदि दिशा-क्रम से केसरों पर सनंदन, सनक, श्री और पृथिवी की पूजा करे। अतिरिक्त दिशाओं में वेदों की अर्चना कर छह कोणों में निरुक्त, ज्योतिष, व्याकरण, कला, शिक्षा और छन्द - इन वेदांगों की समर्चंना करे। तदनन्तर अष्टदल के मूल में आठ माताओं की पूजा कर दलमध्य में आठ वक्रतुंड आदिकों का पूजन करे ॥३४-४०॥ पश्चात् साधक दल के अग्रभाग में आठ भैरवों, कृष्णांग मृग, लाल नेत्रों वाले, काल का दमन करने वाले, लम्बे दांतों वाले और (देखने में) अतियंभकर वटुक देव की पूजा कर षोडशदल (कमल) पर हरि के दश अवतारों एवम् शंख, चक्र, गदा, पद्म, नंदक (खङ्ग) और शाङ्ग (धनुष) की अर्चना करे। इनके अतिरिक्त भूगृह में इन्द्र आदि दश दिक्पालों तथा उनके वज्र आदि आयुधों की पूजा कर द्वारों पर क्रमशः महागणपति, दुर्गा, क्षेत्रेश, बटुक, प्रकाश आदि समस्त योगिनियों, सात नदियों, नौ ग्रहों, आठ पर्वतों और नक्षत्रों का परि-