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भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 647, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 647

ऐरावतः पुण्डरीको वामनः कुमुदोऽञ्जनः । पुष्पदंतः सार्वभौमः सुप्रतीकश्च दिग्गजाः ॥१३॥ करिण्योऽभ्रमुकपिलांपिंगलानुषमाः क्रमात् । ताम्रकर्णी शुभ्रदंती चांगना ह्यंजनावती ॥१४॥ एवमाराधितो मंत्री दद्यादिष्टानि मंत्रिणे । श्रीकामः पायसाज्येन सहस्रं जुहुयात्सुधीः ॥१५॥ महतीं श्रियमाप्नोति धान्याप्तिर्धान्यहोमतः । शतपुष्पासमुत्थैश्च बीजैर्हुत्वा सहस्रतः ॥१६॥ महाभयं नाशयेद्धि नात्र कार्या विचारणा । दद्ध्योदनेन शुद्धेन हुत्वा मुच्येत दुर्गतैः ॥१७॥ ध्यात्वा त्रैविक्रमं रूपं जपेन्मंत्रं समाहितः । कारागृहाद्भवन्मुक्तो बद्धो मंत्रप्रभावतः ॥१८॥ भित्तौ संपाद्य देवेशं फलके वा प्रपूजयेत् । नित्यं सुगंधकुसुमैर्महतीं श्रियमाप्नुयात् ॥१९॥ हुत्वा रक्तोत्पलैर्मंत्री वशयेत्सकलं जगत् । अन्नाज्यैर्जुहुयान्नित्यमष्टाविंशतिसंख्यया ॥२०॥ सिताज्य़ान्नं च विधिवत्प्राप्नुयादन्नमक्षयम् । अपूपैः षड्रसोपेतैर्हुनेद्वासुसहलकम् ॥२१॥ अलक्ष्मीं च पराभूय महतीं श्रियमाप्नुयात् । जुहुयादयुतं मंत्री दध्यन्नं च सितान्वितम् ॥२२॥ यत्र यत्र वसेत्सोऽपि तत्रान्नगिरिमाप्नुयात् । पद्माक्षरैर्युतं बिल्वांतिकस्थो जुहुयान्नरः ॥२३॥ महालक्ष्मीं स लभते तत्र तत्र न संशयः । जुहुयात्पायसैर्लक्षं वाचस्पतिसमो भवेत् ॥२४॥ लक्षं जप्त्वा तद्दशांशं पुत्रजीवफलैर्हुनेत् । तत्काष्ठैरेधिते वह्नौ श्रेष्ठं पुत्रमवाप्नुयात् ॥२५॥ ससाध्यतारं विलसत्कर्णिकं च सुवर्णकंः । विलसतकेसरं मंत्राक्षरद्वंद्वाष्टपत्रकम् ॥२६॥ शेषयुग्मार्णाष्टपत्रं द्वादशाक्षरवेष्टितम् । तद्बहिर्मातृकावर्णैर्यत्रं सम्पदप्रदं नृणाम् ॥२७॥ रक्तं त्रिविक्रमं ध्यात्वा प्रसूनै रक्तवर्णकैः । जुहुयादयुतं मंत्री सर्वत्र विजयो भवेत् ॥२८॥ ध्यायेच्चंद्रासनगतं पद्मानांमयुतं हुनेत् । लभेदकंटकं राज्यं सर्वलक्षणसंयुतम् ॥२९॥ इस प्रकार आराधना करने से इष्टसिद्धि होती है। लक्ष्मी का इच्छुक विद्वान् दूध एवम् घी से सहस्र बार हवन करे। ऐसा करने से प्रचुर धन मिलता है। धान्य से होम करने से धान्य की प्राप्ति होती है। साँफ से सहस्र बार हवन करने से महाभय का नाश होता है, इसमें विचार करने की आवश्यकता नहीं। शुद्ध दही और भात से होम करने से दुर्गति नष्ट होती है। त्रिविक्रम के रूप का ध्यान कर समाहितचित्त से मंत्र जपने से कारागार (जेल) से छुटकारा मिल जाता है, ऐसा मंत्र का प्रभाव है। भीत या तख्ते पर देवेश का चित्र लिख कर नित्य सुगंधित पुष्पों से पूजा करने वाला व्यक्ति महती श्री को प्राप्त करता है। रक्तकमल से होम करने से तीनों लोक वशीभूत होते हैं। नित्य अट्ठाईस बार घी एवम् चीनी मिश्रित अन्न से विधिवूर्वक हवन करने से क्षयरहित अन्न की प्राप्ति होती है। जो व्यक्ति षड्रसयुक्त पुओं से आठ हजार हवन करता है, वह दरिद्रा को जीतकर महतो लक्ष्मी को प्राप्त करता है ॥१५-२१३॥ जो दही, चीनी तथा अन्न से दश हजार बार हवन करता है, वह जहाँ-कहीं भी वास करेगा, वहीं उसे अन्न पर्वत (प्रचुर अन्न) प्राप्त होगा। बिल्ववृक्ष के समीप पद्मपरागयुक्त दही एवम् अन्न से हवन करने वाला साधक जन्म-जन्मान्तर में महालक्ष्मी को प्राप्त करता है, इसमें संशय नहीं। खीर से एक लाख बार हवन करने वाला व्यक्ति बृहस्पति-तुल्य होता है ॥२२-२४॥ लक्ष बार मंत्र-जप कर उसका दशांश पुत्रजीव (जियापुता) वृक्ष की लकड़ी से प्रज्वलित अग्नि में उसके फल से होम करने से उत्तम पुत्र की प्राप्ति होती है। साध्य एवम् तार मंत्र से युक्त, कर्णिका एवम् केसर से सुशोभित और बारह मंत्राक्षरों से वेष्टित स्वगंयंत्र मनुष्यों को संपत्ति प्रदान करता है। रक्त वर्ण वाले त्रिविक्रम का ध्यान कर लाल रंग के पुष्पों से हवन करने वाला साधक सर्वत्र विजयी होता है। चंद्रासन पर आसीन त्रिविक्रम का