बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 646, कुल 1008 में से
संदर्भ में पढ़ेंद्विसप्ततितमोऽध्यायः सनत्कुमार उवाच प्रणवो हृदयं विष्णोर्नान्तः सुरपतिस्तथा। महाबलाय स्वाहांतो मंत्रो वसुधराक्षरः ॥१॥ मुनिर्बिंदुर्विराट्छन्दो देवता दधिवामनः। तारो बीजं तथा शक्तिर्वह्निजाया प्रकीर्तिता ॥२॥ चंद्राक्षिशरामबाणेषु नेत्रसंख्यैर्मनूद्भवैः। वर्णैः षडंगं कृत्वा च मूर्ध्नि भाले च नेत्रयोः ॥३॥ कर्णयोर्घ्राणयोरोष्ठतालुकण्ठभुजेषु च। पृष्ठे हृद्युदरे नाभौ गुह्ये चोरुस्थले पुनः ॥४॥ जानुद्वयं जङ्घयोश्च पादयोर्विन्यसेत्क्रमात्। अष्टादशैव मंत्रोत्थास्ततो देवं विचिंतयेत् ॥५॥ मुक्तागौरं रत्नभूषं चन्द्रस्थं भृङ्गसन्निभैः। अलकैर्विलसद्वक्त्रं कुम्भं शुद्धांबुपूरितम् ॥६॥ दध्यन्नपूर्णंचषकं दोर्भ्यां संदधतं भजेत्। लक्षत्रयं जपेन्मन्त्रं तद्दशांशं घृतप्लुतः ॥७॥ पायसान्नैः प्रजुहुयाद्दध्यन्नेन यथाविधि। चन्द्रांते कल्पिते पीठे पूर्वोक्ते पूजयेच्च तम् ॥८॥ संकल्पमूर्तिमूलेन संपूज्य च विधानतः। केसरेषु षडंगानि संपूज्य दिगलेषु च ॥६॥ वासुदेवं संकर्षणं प्रद्युम्नमनिरुद्धकम्। कोणपत्रेषु शांति च श्रियं सरस्वतीं रतिम् ॥१०॥ ध्वजं च वैनतेयं च कौस्तुभं वनमालिकाम्। शंखं चक्रं गदां शार्ङ्ग दलेष्वष्टसुपूजयेत् ॥११॥ दलाग्रेषु केशवादीन्दिक्पालांस्तदनंतरम्। तवस्त्राणि च सम्पूज्य गजानष्टौ समर्चयेत् ॥१२॥ अध्याय ७२ हयग्रीव-मंत्रोपासना-कथन सनत्कुमार बोले- "प्रणवः...स्वाहा" यह मंत्र तेईस अक्षरों का है। इसके मुनि बिन्दु, छंद विराट् ओर देवता दधिवामन हैं। तार बीज और स्वाहा शक्ति मानी गई है। मंत्र के तेरह वर्णों से षडंग न्यास कर मस्तक, भाल, नेत्र, कर्ण, नासिका, ओष्ठ, तालु, कंठ, भुजा, पृष्ठ, हृदय, उदर, नाभि, गुह्य, ऊरु, जंघा, जानु तथा चरणों में क्रमशः मंत्राक्षरों का न्यास करे। तदनन्तर मोती के समान गौर वर्ण, रत्नों के आभूषण धारण करने वाले, भौंरे जैसे बालों से सुशोभित मुख वाले, दोनों हाथों में शुद्ध जल से परिपूर्ण घट तथा दही एवम् अन्न से परिपूर्ण चषक (पात्र) धारण करने वाले देव का ध्यान कर तीन मंत्र का जप करे और उसका दशांश घृतमिश्रित खीर से या दही युक्त अन्न से हवन करे। होमान्त में पूर्वोक्त पीठ पर मूलमंत्र से मूर्ति का संकल्प कर विधानपूर्वक पूजन करे ॥१-८½॥ फिर केसरों पर षडंगों की पूजा कर दिग्भागों में वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न, अनिरुद्ध, शांति, श्री, सरस्वती, रति, ध्वजा, गरुड़, कौस्तुभ (मणि), वनमाला, शंख, चक्र, गदा और शार्ङ्ग (धनुष) की पूजा करे। तदनन्तर केशव आदि देवों, दिक्पालों, उनके अस्त्रों एवम् आठ दिग्गजों की पूजा कर क्रमशः उनकी हथनियों की भी पूजा करे। ऐरावत, पुंडरीक, वामन कुमुद, अंजन, पुष्पदंत, सार्वभौम, तथा सुप्रतीक- ये आठों दिग्गज कहलाते हैं। अभ्रमु, कपिला, पिंगला, अनुपमा, ताम्रकर्णी, शुभ्रदंती, अंगना तथा अंजनावती- ये आठों हथनियां हैं ॥६-१४॥