बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें६२६ नारदीयपुराणम्
नृसिंहायाग्निजायांते शिरोमंत्रः प्रकीर्तितः । तारः क्षं तप्तस्वहेमाभमास्फुरत्केशालं ईरयेत् ॥२१॥ ज्वलत्यावकलो कमों दीर्घा वज्राधिकेति च । नखस्पर्शाद्दिव्यसिंह नमोऽस्तु भगवन् हरिः ॥२२॥ महाध्वस्त जगद्रूप नृंशिवाय द्वयंद्वयम् । अनेन च शिखा प्रोक्ता कवचं तदनन्तरम् ॥२३॥ तारः क्षैं च सुवर्णं ते मदमत्तपदं ततः । विह्वलिलनृसिंहाय स्वाहांतं कवचं स्मृतम् ॥२४॥ तारः क्षौं च सहस्राक्ष विश्वरूपपदं वदेत् । धारणेऽग्निप्रियांलोऽयं नेत्रमंत्रः प्रकीर्तितः ॥२५॥ तारो क्षश्च सहस्रांते वारावेपदमीरयेत् । सहस्रांते बुधायोच्च नृसिंहायाग्निसुंदरी ॥२६॥ अस्त्रमंत्रः समाख्यातस्ततो ध्यायेन्नृकेसरी । उद्यदर्कसहस्राभं वीक्षणं भीमभूषणम् ॥२७॥ सुतीक्ष्णाग्रभुजो दंडेर्देत्यदारणकं स्मरेत् । एवं ध्यात्वा जपेन्मंत्री सहस्रं पायसेन च ॥२८॥ आज्यप्लुतेन जुहुयात्सम्यक्सिद्धो भवेन्मनुः । प्रागुक्ते वैष्णवे पीठे मूर्तिं संकल्प्य मूलतः ॥२९॥ संपूज्य नृहरिं पश्चादादावंगानि पूजयेत् । चक्रं शंखं च पाशं बांकुशं कुलिशमेव च ॥२०॥ गदाकृपाणिश्वेदानि दलेषु परिपूजयेत् । लोकेशानपि वज्राद्यान्पूजयेत्तदनंतरम् ॥२२१॥ एवं सिद्धे मनो मन्त्री प्रयोगान्कर्तुमर्हति । भस्मामिमंत्रितं कृत्वा ग्रहग्रस्तं विलेपयेत् ॥२२२॥ भस्मसंलेपनादेव सर्वग्रहविनाशनम् । अनेनैव विधानेन यक्षराक्षसकिन्नरः ॥२२३॥ भूतप्रेतपिशाचाश्च नश्यंत्येव न संशयः । पराभिचारकृत्यानि मनुनानेन मंत्रितम् ॥२२४॥ भस्म संलेपयेत्सद्यो दुराधर्षो भवेन्नरः । सुदिने स्थापयेत्कुम्भे सर्वतोभद्रमण्डले ॥२२५॥ तीर्थतोयेन संपूयं जपेदष्टोत्तरं शतम् । तेनाभिषिक्तो मनुजः सर्वापत्तिं तरेद् ध्रुवम् ॥२२६॥ किं बहुत्वेन सर्वेष्टदायकोऽयं मन्नूत्तमः । वज्रनखाय विद्महे तीक्षणदंष्ट्राय धीमहि तन्नो नृसिंहः शब्दान्ते वदेच्चैव प्रचोदयात् ॥२२७॥ एषा नृसिंहगायत्री सर्वाभीष्टप्रदायिनी । एतस्याः स्मरणादेव सर्वपापक्षयो भवेत् ॥२२८॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे बृहदुपाख्याने नृसिंहोपासनामन्त्रगायत्र्यादिनिरूपणं नामैकसप्ततितमोऽध्यायः ॥७१॥
कोणों में शंख, चक्र, पाश, अंकुश, कुलिश, गदा, कृपाण, वंशशलाका, लोकपालों एवम् वज्र आदि आयुधों की अर्चना करे ॥१६२-२२१॥ इस प्रकार मंत्र सिद्ध कर लेने पर साधक प्रयोगों को कर सकता है। मंत्र से भस्म को अभिमंत्रित कर ग्रहपीड़ित व्यक्ति के अंग में लेप कर देने से समस्त ग्रहों का नाश हो जाता है। इस विधान से यक्ष, राक्षस, किन्नर, भूत, प्रेत और पिशाचों का भी नाश होता है, इसमें संशय नहीं। इस मंत्र से अभिमंत्रित भस्म शत्रुओं का निवारण करता है। इसके लेप से मनुष्य महापुरुष हो जाता है। सुदिन में सर्वतोभद्रमंडल बना कर उस पर घटस्थापन करे। घट को तीर्थजल से भरकर एक सौ आठ बार मंत्र से अभिमंत्रित करे ॥२२२-२२५॥ उस जल से अभिषिक्त किया हुआ मनुष्य सकल बाधाओं को पार कर जाता है, इसमें तनिक भी संदेह नहीं। बहुत क्या कहूँ? यह मंत्र समस्त वांछित फलों को देने वाला है। "वज्रनखाय ··· प्रद्यो- दयात्" यह सकल कामनाओं को पूर्ण करने वाली नृसिंहगायत्री है। इसके स्मरणमात्र से समस्त पापों का क्षय होता है ॥२२६-२२८॥ श्रीनारदीय पुराण के पूर्वार्ध में बृहदुपाख्यानयुक्त तृतीय पाद में नृसिंह की उपासना, मंत्र तथा गायत्री आदि का निरूपण नामक इकहत्तरवां अध्याय समाप्त ॥७१॥