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भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 652, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 652

६३३ त्रिसप्ततितमोऽध्यायः तदैव पुनराप्नोति स्वाधिपत्यं न संशयः । उपोष्य गङ्गातीरांते स्थित्वा लक्षं जपेन्नरः ॥२८॥ दशांशं कमलैर्हुत्वा विल्वोत्थैर्वा प्रसूनकैः । मधुरत्रयसंयुक्तैराज्यश्रियमवाप्नुयात् ॥२६॥ मार्गमासे जले स्थित्वा कन्दमूलफलाशनः । लक्षं जप्त्वा दशांशेन पायसैर्जुहुयादसौ ॥३०॥ श्रीरामचन्द्रसदृशः पुत्रः पौत्रोऽपि जायते । अन्येऽपि बहवः संति प्रयोगा मन्त्रराजके ॥३१॥ किंतु प्रयोगकर्तृणां परलोको न विद्यते । षट्कोणं वसुपत्रं च तद्बाह्यार्कदलं लिखेत् ॥३२॥ षट्कोणेषु षडर्णानि यन्त्रस्य विलिखेद् बुधः । अष्टपत्रे तथाष्टाणाँल्लिखेत्प्रणवगर्भितान् ॥३३॥ कामबीजं रविदले मध्ये मन्त्रावृताभिधाम् । सुदर्शनावृतं बाह्ये दिक्षु युग्मावृतं तथा ॥३४॥ वज्रोल्लसद्भूमिगेहं कन्दर्पाङ्कुशपाशकैः । भूम्या च विलसत्कोणं यन्त्रराजमिदं स्मृतम् ॥३५॥ भूर्जेऽष्टगन्धैः संलिख्य पूजयेदुक्तवर्त्मना । षट्कोणेषु दलार्काब्जान्यवेष्टवृतयुग्मतः ॥३६॥ केशरेष्वष्टपत्रस्य स्वरद्वंद्वं लिखेद् बुधः । बहिस्तु मातृकां चैव मन्त्रं प्राणनिधायनम् ॥३७॥ यन्त्रमेतच्छुभ्रे घस्रे कण्ठे वा दक्षिणे भुजे । मूर्ध्नि वा धारयेन्मंत्री सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥३८॥ सुदिने शुभनक्षत्रे सुदेशे शल्यवर्जिते । वश्याकर्षणविद्वेषद्रावणोच्चाटनादिकम् ॥३६॥ पुष्यद्वयं तथादित्यार्द्रामघासु यथाक्रमम् । दूर्वोत्या लेखनी वश्ये तथाकृष्टौ करंजजा ॥४०॥ नरास्थिजा मारणे तु स्तंभने राजवृक्षजा । शांतिपुष्टयायुषां सिद्धयै सर्वापच्छमनाय च ॥४१॥ वह शाकाहार करते हुए जल के मध्य में एक लाख जप कर उसका दशांश बिल्वपुष्पों से हवन करे । ऐसा करने से तुरन्त आधिपत्य की पुनः प्राप्ति होती है, इसमें संशय नहीं । जो व्यक्ति गंगा के किनारे निवास करते हुए उपवासपूर्वक एक लाख मंत्र का जप कर उसका दशांश 'त्रिमधुरमिश्रित कमलों या बिल्वपुष्पों से हवन करता है, उसे राज्यश्री प्राप्त होती है। जो माघमास में कंद, मूल तथा फलाहार करते हुए जल में एक लाख मन्त्र-जप करके उसका दशांश खीर से अग्नि में हवन करता है, उसके श्री रामचन्द्र के समान पुत्र-पौत्र उत्पन्न होते हैं । उक्त मन्त्रराज के अन्य भी बहुत से प्रयोग हैं । किंतु प्रयोगकर्ताओं को परलोक नहीं मिलता है। पहले षट्कोण लिख कर अष्टदल कमल तथा उसके बाहर द्वादशदल कमल लिखे । मेधावी व्यक्ति षट्कोण में मंत्र के छः वर्षों को लिखकर अष्टदल में प्रणव सहित आठ वर्षों को लिखे। रविदल में कामबीज (क्लीं) मध्य में मन्त्र से आवृत, बाहर सुदर्शन मन्त्र से आवृत और दिशाओं में युग्मबीज (रां श्री) लिखकर भूमिगृह को लिखे, जो वज्र, कंदर्प, अंकुश तथा पाश से युक्त हो । इस तरह भूमिगृह तथा कोण आदि से सुशोभित यंत्र सर्वश्रेष्ठ माना गया है ॥२६-३५॥ भोजपत्र पर अष्टगन्धों से यन्त्र को लिखकर पूर्वकथित मार्ग से उसका पूजन करे । षट्कोण में द्वादशदल कमल लिख कर बुधजन अष्टपत्र के केसरों पर द्वन्द्वस्वरों को लिखे । उसके बाहर मातृकाक्षर तथा प्राणाधायक मन्त्र को लिखे । साधक इस यन्त्र को शुभ दिन में कण्ठ या दाहिनी भुजा या मस्तक पर धारण करे । इसके धारण से समस्त पापों का नाश होता है। वशीकरण, आकर्षण, विद्वेष, मारण तथा उच्चाटन करने के लिये सुदिन, शुभनक्षत्र तथा कंटकादिरहित सुदेश में यन्त्र को धारण करना चाहिये । आर्द्रा, पुनर्वसु, पुष्य, अश्लेषा और मघा नक्षत्र में इसका धारण होना चाहिये । वशीकरण के लिये दूर्वा की लेखनी, आकर्षण के लिये करंज की लेखनी, मारण के लिये अस्थि की लेखनी और स्तंभन के लिये राजवृक्ष की लेखनी बनानी चाहिये । उस यन्त्र को धारण करने से पुष्टि तथा आयु की वृद्धि और समस्त विपत्तियों की शान्ति होती है। यदि १. घी, मधु, चीनी -- इन तीनों का समुदाय त्रिमधु कहलाता है । ८० ना० पु०