बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें६३४ नारदीयपुराणम् विभ्रमोत्पादने चैव शिलायां विलिखेद् बुधः । खरचर्मणि विद्वेषे ध्वजे तूच्चाटनाय च ॥४२॥ शत्रूणां ज्वरसन्तापशोकमारणकर्मणि । पीतवस्त्रं लिखित्वा तु साधयेत्साधकोत्तमः ॥४३॥ वश्याकृष्टौ चाष्टगन्धैः सम्पूज्य च यथाविधि । चिताङ्गारादिना चैव ताडनोच्चाटनादिकम् ॥४४॥ विषार्कक्षीरयोगेन मारणं भवति ध्रुवम् । लिखित्त्वैवं यन्त्रराजं गन्धपुष्पादिभिर्यजेत् ॥४५॥ त्रिलोहवेष्टितं कृत्वा धारयेत्साधकोत्तमः । बीजं रामाय ठद्वन्द्वं मन्त्रोऽयं रसवर्णकः ॥४६॥ महासुदर्शनमनुः कथ्यते सिद्धिदायकः । सुदर्शनमहाशब्दाच्चक्रराजेश्वरेति च ॥४७॥ दुष्टांतकदुष्टभयानकदृष्टभयंकरम् । छिन्धि द्वयं भिन्धि युग्मं विदारय युगं ततः ॥४८॥ परमन्त्रान् ग्रस द्वंद्वं भक्षयद्वितयं ततः । त्रासय द्वितयं वर्मास्त्राग्निजायांतितो मनुः ॥४६॥ अष्टषष्ट्यक्षरः प्रोक्तो यंत्रसंवेष्टने स्वयम् । तारो हृद्भगवान् ङेन्तो ङेन्तो हि रघुनन्दनः ॥५०॥ रक्षोघ्नविशदायांते मधुरादिप्रसन्न च । वरदानायान्त्रितांते नुतेजसे पदमीरयेत् ॥५१॥ बालायांते तु रामाय विष्णवे हृदयांतिमः । सप्तचत्वारिंशद्वर्णो मालामन्त्रोऽयमीरितः ॥५२॥ विश्वामित्रो मुनिश्चास्य गायत्री छंद ईरितम् । श्रीरामो देवता बीजं ध्रुवः शक्तिश्च ठद्वयम् ॥५३॥ षड्दीर्घस्वरयुग्मायाबीजेनांगानि कल्पयेत् । ध्यानपूजादिकं सर्वमस्यपूर्ववदाचरेत् ॥५४॥ अयमाराधितो मन्त्रः सर्वान्कामान्प्रयच्छति । स्वकामसत्यवागलक्ष्मीताराद्यः पञ्चवर्णकः ॥५५॥ षडक्षरः षड्विधः स्याच्चतुर्वर्गफलप्रदः । ब्रह्मा संमोहनः शक्तिर्दक्षिणा मूर्तिसंज्ञकः ॥५६॥ अगस्त्यः श्रीशिवः प्रोक्तास्ते तेषां मुनयः क्रमात् । अथवा कामबीजादेर्विश्वामित्रो मुनिः स्मृतः ॥५७॥ छन्दः प्रोक्तं च गायत्री श्रीरामो देवता पुनः । बीजशक्तिरराधमांत्यं मन्त्राणैः स्यात्षडंगकम् ॥५८॥ बीजैः षड्दीर्घयुक्तैर्वा मन्त्राणान्पूर्ववन्न्यसेत् । ध्यायेत्कल्पतरोर्मूले सुवर्णमयमण्डपे ॥५६॥
शत्रुओं को मतिभ्रान्त करना हो तो बुद्धिमान् साधक शिला पर (यन्त्र) लिखे, फूट डालना हो तो गधे के चाम पर लिखे, उच्चाटन करना हो तो पताका पर लिखे और ज्वर, संताप, शोक तथा मारण कर्म के लिये पीतवस्त्र पर लिख कर श्रेष्ठ साधक मंत्र सिद्ध करे ॥३६-४३॥ वशीकरण तथा आकर्षण के लिये अष्टगन्धों से विधिपूर्वक पूजा करनी चाहिये । ताडन तथा उच्चाटन करने के लिये चिता अंगार (कोयले) से यन्त्र को लिखे । विष तथा आक के दूध को घोल कर (उससे उक्त यन्त्र) लिखने से निश्चय ही मारण होता है । उत्तम साधक इस प्रकार यन्त्रराज को लिखकर गन्ध-पुष्प आदि से अर्चना करे ॥४४-४५॥ फिर त्रिलोह (सोना, चांदी, तांबा) से उसे वेष्टित कर उत्तम साधक धारण करे । "बीज ....." यह छः अक्षरों का मन्त्र महासुदर्शन मन्त्र कहलाता है, जो सिद्धिदायक है । "सुदर्शन स्वाहा" इस अड़सठ अक्षरों के मन्त्र से यन्त्र का संवेष्टन किया जाता है । "तार....हृदयम्" यह सैंतालीस अक्षरों का मालामन्त्र कहा गया है । इसके ऋषि विश्वामित्र हैं, छन्द गायत्री है, श्रीराम देवता हैं, ध्रुव बीज है और ठद्वय शक्ति है । छः दीर्घस्वरों से युक्त बीज मन्त्र से अङ्गन्यास कर ध्यान, पूजन आदि सब कुछ पूर्ववत् ही करना चाहिये । इस मन्त्र की आराधना करने से सकल कामनायें सफल होती हैं । "स्वकाम..." यह षडक्षर मन्त्र चतुर्वर्ग के फल को देने वाला है । ब्रह्मा, संमोहन, शक्ति, दक्षिणामूर्ति, अगस्त्य तथा श्रीशिव-ये क्रमशः इसके ऋषि हैं ॥४६-५६॥ अथवा कामबीज आदि के विश्वामित्र मुनि हैं, गायत्री छन्द है, श्रीराम देवता हैं और स्वाहा बीजशक्ति है । मन्त्राक्षरों से षडंगन्यास कर छः दीर्घ मात्राओं से युक्त बीज मन्त्र से मन्त्राक्षरों का यथा- पूर्व न्यास करे । तदनन्तर कल्पतरु के मूल में स्थित सुवर्णमय मण्डप में पुष्पक विमान के भीतर अष्टदलकमल से