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भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 654, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 654

त्रिसप्ततितमोऽध्यायः ६३५ पुष्पकस्थविमानांतः सिंहासनपरिच्छदे । पद्मे वसुदले देशेमिन्द्रनीलसमप्रभम् ॥६०॥ वीरासनसमासीनं ज्ञानमुद्रोपशोभितम् । वामोरुन्यस्तहस्तस्तीतालक्ष्मणसेवितम् ॥६१॥ रत्नाकल्पं विभुं ध्यात्वा वर्णलक्षं जपेन्मनुम् । यद्वा स्मारादिमन्त्राणां जयांश्च हरिं स्मरेत् ॥६२॥ यजनं काम्यकर्माणि सर्वं कुर्यात्षडर्णवत् । रामश्च चन्द्रभद्रान्तो ङेनमोंतो ध्रुवादिकः ॥६३॥ मन्त्रावष्टाक्षरौ ह्येतौ ताराद्यौ चेन्नवाक्षरौ । एतेषां यजनं सर्वं कुर्यान्मंत्री षडर्णवत् ॥६४॥ जानकीवल्लभो डेंतो द्विष्टांतः कवचादिकः । दशार्णोऽयं महामन्त्रो विशिष्टोऽस्य मुनिः स्वराट् ॥६५॥ छन्दश्च देवता सीता पतिर्बीजं तथादिमम् । स्वाहा शक्तिश्च कामेन कुर्यादंगानि षट् क्रमात् ॥६६॥ शिरोललाटभ्रू मध्यतालुकण्ठेषु हृद्यपि । नाभ्यांघ्रिजानुपादेषु दशार्णान्विन्यसेन्मनोः ॥६७॥ अयोध्यान्नगरे रत्नचित्रसौवर्णमण्डपे । मंदारपुष्पैर्रावद्धविताने तोरणान्विते ॥६८॥ सिंहासनसमासीन पुष्पकोपरि राघवम् । रक्षोभिर्हरिभिर्देवैः सुविमानगतैः शुभैः ॥६६॥ संस्तूयमानं मुनिभिः प्रह्वैश्च परिसेवितम् । सीतांलंकृतवामांगं लक्ष्मणेनोपशोभितम् ॥७०॥ श्यामं प्रसन्नवदनं सर्वाभरणभूषितम् । एवं ध्यात्वा जपेन्मंत्री वर्णलक्षं समाहितः ॥७१॥ दशांशः कमलैर्होमो यजनं च षडर्णवत् । रामो ङेन्तो धनुष्पाणिर्डेतोंऽते वह्निसुन्दरी ॥७२॥ दशाक्षरोऽयं मंत्रोऽस्य मुनिर्नृ ह्या विराट् पुनः । छन्दस्तु देवता प्रोक्तो रामो राक्षसमर्दनः ॥७३॥ आद्यं बीजं द्विठः शक्तिर्बी जेनांगानि कल्पयेत् । वर्णन्यास तथा ध्यानं पुरश्चर्याचनादिकम् ॥७४॥ युक्त सिंहासन पर वीरासन लगाकर बैठे हुए इन्द्रनीलमणि के समान कान्ति वाले विभु रामचन्द्र का ध्यान करे, जो ज्ञान मुद्रा से सुशोभित, लक्ष्मण से सुसेवित, बायीं जांघ पर बैठी सीता के कन्धे पर हाथ रखे हुए तथा रत्न के समान कान्ति से युक्त हैं। ध्यान के उपरान्त छः लाख मन्त्र का जप करे या स्मार आदि मन्त्रों के अधिदेवता विजयिष्णु हरि का स्मरण करे। इस षडक्षर मन्त्र से यजन तथा काम्यकर्म सब कुछ कर सकते हैं। "ओं राम- चन्द्राय नमः ओं रामभद्राय नमः" अष्टाक्षर मन्त्र हैं। जब इनके अन्त में 'ओं' जोड़ दिया जाता है तब ये नवाक्षर हो जाते हैं। साधक षडक्षर मन्त्र की तरह इनकी भी आराधना करे। "हुं जानकीवल्लभाय स्वाहा" यह दशाक्षर महामन्त्र है। इसके ऋषि वशिष्ठ हैं, छन्द स्वराट् है, देवता रामचन्द्र हैं, हुं बीज है और स्वाहा शक्ति है। इस मन्त्र से क्रमशः षडंगन्यास करना चाहिये, शिर, ललाट, भौंह के बीच, तालु, कण्ठ, हृदय, नाभि चरण तथा जानु में मन्त्र के दश अक्षरों का न्यास करे । ॥५७-६७॥ तदनन्तर ध्यान करे कि अयोध्या नगर में रत्नजटित सुवर्ण के मण्डप में, जो मन्दार पुष्पों से आबद्ध वितान एवम् तोरण से सुशोभित है, पुष्पक विमान पर अवस्थित सिंहासन पर राघव विराजमान हैं। सुन्दर विमानों पर चढ़कर आये हुए देवगण तथा रक्षोगण उनकी स्तुति कर रहे हैं। मुनिगण विनीत भाव से सेवा में जुटे हुए हैं। भगवान् का वाम अङ्ग सीता से अलंकृत तथा लक्ष्मण से उपशोभित है। उनका वर्ण श्याम है, मुख प्रसन्न है और शरीर समस्त आभूषणों से विभूषित है। साधक समाहित चित्त से इस प्रकार ध्यान कर दस लाख मन्त्र जप करे और उसका दशांश कमलों से हवन करे। यजन-पूजन तो षडक्षर मन्त्र की तरह करना चाहिये। 'रामाय धनुष्पाणये स्वाहा' - यह दशाक्षर मन्त्र है। इसके मुनि ब्रह्मा, छन्द विराट् और देवता राक्षसमर्दक राम हैं। आद्य अक्षर (रां) बीज है और स्वाहा शक्ति है। बीज से अङ्गन्यास करना चाहिये। वर्णन्यास, ध्यान, पुरश्चरण तथा अर्चना आदि दशाक्षर मन्त्र की ही तरह करे। इसके जप में धनुष और बाण लिये श्रीरामचन्द्र