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भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 655, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 655

६३६ नारदीयपुराणम् दशाक्षरोक्तवत्कुर्याच्चापबाणधरं स्मरेत् । तारो नमो भगवते रामान्ते चंद्रभद्रकौ ॥७५॥ द्वैतावर्काक्षरौ मंत्रौ ऋषिध्यानादि पूर्ववत् । श्रीपूर्वं जयपूर्वं च तद्विधा रामनाम च ॥७६॥ त्रयोदशाक्षरो मंत्रो मुनिर्ब्रह्मा विराट् स्मृतम् । छन्दस्तु देवता प्रोक्तो रामः पापौघनाशनः ॥७७॥ षडंगानि प्रकुर्वीत द्विरावृत्त्या पदत्रयैः । ध्यानाचंनादिकं सर्वं ह्यस्य कुर्याद्दशार्णवत् ॥७८॥ तारो नमो भगवते रामायांते महापदम् । पुरुषाय हृदंतोऽयं मनुरष्टादशाक्षरः ॥७६॥ विश्वामित्रो मुनिश्चंदो धृती रामोऽस्य देवता । तारो बीजं नमः शक्तिश्चंद्राद्यश्चव्यग्निवड्भुजैः ॥८०॥ वर्णैर्मत्रोत्थितैः कुर्यात्षडंगानि समाहितः । निश्शाणभेरीपटहशंखतुर्यादिनिःस्वनैः ॥८१॥ प्रवृत्तनृत्ये परितो जयमंगलभाषिते । चंदनागरुकस्तूरीकर्पूरादिसुवासिते ॥८२॥ नानाकुसुमसौरभ्यवाहिगंधवहान्विते । देवगंधर्वनारीभिर्गायन्तीभिरलंकृते ॥८३॥ सिंहासने समासीनं पुष्पकोपरि राघवम् । सौमित्रिसीतासहितं जटामुकुटशोभितम् ॥८४॥ चापबाणधरं श्यामं ससुग्रीवविभीषणम् । हत्वा रावणमायांतं कृतत्रैलोक्यरक्षणम् ॥८५॥ एवं ध्यात्वा जपेद्वर्णं लक्षं मंत्री दशांशतः । घृताक्तैः पायसैर्हुत्वा यजनं पूर्ववच्चरेत् ॥८६॥ प्रणवो हृदयं सीतापतये तदनंतरम् । रामाय हनयुग्मांते वर्मास्ताग्निप्रियांतमः ॥८७॥ एकोनविशद्वर्णोऽयं मंत्रः सर्वार्थसाधकः । विश्वामित्रो मुनिश्चास्या नुष्टुप्छन्द उदाहृतम् ॥८८॥ देवता रामभद्रो जं बीजं शक्तिर्नम इति । मंत्रोत्थितैः क्रमाद्वर्णैस्ततो ध्यायेच्च पूर्ववत् ॥८६॥ पूजनं काम्यकर्मादिसर्वमस्य षडर्णवत् । तारः स्वबीजं कमला रामभद्रेति संपठेत् ॥६०॥ का ध्यान करना चाहिए ॥६८-७४॥ तार (ओं) के पश्चात् 'नमो भगवते रामचन्द्राय' अथवा 'रामभद्राय' ये दो प्रकार के द्वादशाक्षर मन्त्र हैं । इनके मुनि तथा ध्यान आदि पूर्ववत् ही है। श्रीपूर्वक, जयपूर्वक तथा जय-जयपूर्वक 'राम' नाम (अर्थात् श्रीराम जयराम जयजयराम) यह तेरह अक्षरों का मन्त्र है। इसके मुनि ब्रह्मा, छन्द विराट् और देवता सकल पापनाशक राम हैं। इस मन्त्र के तीन पदों को दोहरा कर षडंगन्यास करना चाहिये । ध्यान, पूजन आदि तो दशाक्षर मन्त्र की तरह करने होंगे । 'ओं नमो भगवते रामाय महापुरुषाय नमः' -यह अट्ठारह अक्षरों का मन्त्र है। इसके मुनि विश्वामित्र, छन्द धृति और देवता राम हैं। 'ओं' इसका बीज है और 'नमः' शक्ति है । साधक सावधान होकर मन्त्र के अट्ठारहों अक्षरों से षडंगन्यास करे। तदनन्तर ढोल, नगाड़ा, शङ्ख, तुरही आदि के शब्द तथा 'जय' आदि मांगलिक शब्दों के साथ नृत्य-गीत करे । चन्दन, अगर, कस्तूरी, कर्पूर आदि से सुवासित, विविध सुगंधित कुसुमों से समन्वित और गाती हुई देवों एवम् गन्धर्वो की ललनाओं से विभूषित पुष्पक विमान पर सिंहासनासीन राघव का ध्यान करे। जिनके समीप सीता, लक्ष्मण, सुग्रीव तथा विभीषण उपस्थित हैं। जो जटा रूपी मुकुट से सुशोभित होते हुए हाथों में धनुष-बाण धारण किये हुए हैं। और जिन्होंने आते हुए रावण को मार कर त्रैलोक्य की रक्षा की है ॥७५-८५॥ इस प्रकार ध्यान कर साधक एक लाख मन्त्र-जप करे और उसका दशांश घृतमिश्रित पायस से होम करे । पूजन तो पूर्ववत् ही समझना चाहिये । "प्रणव........."यह उन्नीस अक्षरों वाला मन्त्र सकल कामनाओं को सफल करता है। विश्वामित्र इसके मुनि हैं, छंद अनुष्टुप् है, देवता रामभद्र हैं, 'जं' बीज है और 'नमः' शक्ति है । मन्त्र के वर्णों से क्रमशः न्यास कर बाद में पहिले की तरह ध्यान करे। यजन-पूजन आदि तो षडक्षर मन्त्र की ही तरह करना चाहिये । 'ओं रां श्रीं रामभद्र महेष्वास रघुवीर नृपोत्तम । दशास्यान्तक मां रक्ष देहि मे परमां श्रियम्' - यह पैंतीस अक्षरों का मन्त्र है। बीज से वियुक्त होने पर बत्तीस अक्षरों का होता है; परन्तु सकल