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भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 656, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 656

६३७ त्रिसप्ततितमोऽध्यायः महेष्वासपदान्ते तु रघुवीर नृपोत्तम । दशास्यांतकशब्दांते मां रक्षदेहि संपठेत् ॥८१॥ परमांते मे श्रियं स्यान्मंत्रो बाणगुणाक्षरः । बीजैस्त्रियुक्तो द्वात्रिंशद्वर्णोऽयं फलदायकः ॥८२॥ विश्वामित्रो मुनिश्चास्थानुष्टुप्छंदउदाहृतम् । देवता रामभद्रोऽत्र बीजं स्वं शक्तिरिंदिरा ॥८३॥ बीजत्रयाद्यैः कुर्वीत पदैः सर्वेण मंत्रवित् । पंचांगानि च विन्यस्य मंत्रवर्णान्क्रमान्न्यसेत् ॥८४॥ मूर्धिन भाले दृशोः श्रोत्रे गंडयुग्मे सनासिके । आस्ये दोःसंधियुगले स्तनहृन्नाभिषु क्रमात् ॥८५॥ कटौ मेढ्रे पायुपादसंधिष्ववर्णान्न्यसेन्मनोः । ध्यानाचंनादिकं चास्य पूर्ववत्समुपाचरेत् ॥८६॥ लक्षत्रयं पुरश्चर्या पायसैर्हवनं मतम् । ध्यात्वा रामं पीतवर्ण जपेल्लक्षं समाहितः ॥८७॥ दशांशं कमलैर्हुत्वा धनैर्धनपतिर्भवेत् । तारो माया रमाद्वंद्वं दाशरथाय हृच्च वै ॥८८॥ एकादशाक्षरो मंत्रो मुन्याद्यर्चास्य पूर्ववत् । त्रैलोक्यांते तु नाथाय हृदंतो वसुवर्णवान् ॥८९॥ अस्यापि पूर्ववत्सर्वं न्यासध्यानाचंनादिकम् । आंजनेयपदान्ते तु गुरवे हृदयांतिमः॥ ॥१००॥ मंत्रो नवाक्षरोऽस्यापि यजनं पूर्ववन्मतम् । ङेतं रामपद पश्चाद्धृदयं पंचवर्णवत् ॥१०१॥ मुनिध्यानाचंनं चास्य प्रोक्तं सर्वं षडर्णवत् । रामांते चंद्रभद्रौ च डेंतौ पावकवल्लभा ॥१०२॥ मंत्रौ द्वौ च समाख्यातौ मुन्याद्यर्चादि पूर्ववत् । वह्निः शेषावन्वितश्चैव चंद्रभूषितमस्तकः ॥१०३॥ एकाक्षरो रघुपतेर्मंत्रः कल्पद्रुमोऽपरः । ब्रह्मा मुनिः स्याद्गायत्री छंदो रामोऽस्य देवता ॥१०४॥ षड्दीर्घाढचेन मंत्रेण षडंगानि समाचरेत् । सरयूतीरमंदारवेविकापंकजासने ॥१०५॥ श्यामं वीरासनासीनं ज्ञानमुद्रोपशोभितम् । वामोरुन्यस्ततद्धस्तं सीतालक्ष्मणसंयुक्तम् ॥१०६॥ कामनाओं को पूर्ण करता है । इसके मुनि विश्वामित्र, छंद अनुष्टुप्, देवता रामभद्र, बीज ‘स्वं’ तथा शक्ति इंदिरा है। मन्त्रवेत्ता साधक बीजत्रय सहित पदों से पंचांग न्यास कर क्रमशः मन्त्रवणों का न्यास करे । मस्तक, भाल, नेत्र, कर्ण, कपोल, नासिका, भुजा, बाहुमूल, स्तन, हृदय, कटि, लिंग, पायु, चरण तथा संधियों में मन्त्र के वणों का न्यास कर ध्यान, पूजन आदि पूर्ववत् ही करे । मन्त्र का जप तीन लाख और हवन पायस से करने को कहा गया है । पीतवर्ण राम का ध्यान कर समाहित चित्त से एक लाख जप करे ।॥८६-९७॥ फिर उसका दशांश कमलों से हवन करे । ऐसा करने से मानव कुबेर होता है । ‘ओं ह्रीं श्रीं दाशरथाय नमः’ यह ग्यारह अक्षरों का मन्त्र है । इसके मुनि आदि तथा पूजन आदि पूर्ववत् ही समझना चाहिये । “त्रैलोक्य नाथाय नमः.....”यह आठ अक्षरों का मन्त्र है । इसका भी न्यास, ध्यान, पूजन आदि पूर्ववत् करना चाहिये । ‘आंजनेयगुरवे नमः...........’यह नौ अक्षरों का मन्त्र है । इसका भी यजन आदि पूर्ववत् करे । ‘रामाय नमः’ यह पाँच अक्षरों का मन्त्र है। इसके मुनि, ध्यान, पूजन आदि षडक्षर मन्त्र की तरह अवगत करना चाहिये । ‘रामचन्द्राय स्वाहा, ‘रामभद्राय स्वाहा’ इन दोनों मन्त्रों के मुनि एवम् अर्चना आदि पूर्ववत् समझनी चाहिये । अग्नि (र्), शेष (आ) से युक्त हो और उसका मस्तक चन्द्रमा (ं) से विभूषित हो तो यह ग्यारह अक्षरों वाला रघुपति का मन्त्र है, जो कल्पवृक्ष के समान है। इसके मुनि ब्रह्मा, छन्द गायत्री और देवता राम हैं। छः दीर्घमात्राओं से युक्त मन्त्र से षडंग न्यास कर परमात्मा राम का ध्यान करे-‘सरयू के तटवर्ती मंदारवृक्ष के नीचे मंडप में कमलों के आसन पर श्यामवर्ण राम वीरासन लगाये विराजमान हैं। ज्ञानमुद्रा उनकी शोभा बढ़ा रही है। बाँयीं जांघ पर सीता जी बैठी हुई हैं। समीप में लक्ष्मण विद्यमान हैं। कन्दर्पतुल्य कान्तिमान् शरीर को अपने आप निहार रहे हैं।”