बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 657, कुल 1008 में से
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६३८ नारदीयपुराणम् अवेक्षमाणमात्मानं मन्मथामिततेजसम् । शुद्धस्फटिकसंकाशं केवलं मोक्षकांक्षया ॥१०७॥ चिंतयेत्परमात्मानममृतुलक्षं जपेन्मनुम् । सर्वं षडर्णवच्चास्य होम नित्यर्च नादिकम् ॥१०८॥ वह्निः शेषासनो भ्रांतः केवलो द्व्यक्षरो मनुः । एकाक्षरोक्त्तवत्सर्वं मुनिध्यानाचनादिकम् ॥१०६॥ तारमानारमानंगचास्त्रबीजौद्विवर्णकः । द्वयक्षरो मंत्रराजः स्यात्षड्विधः सकलेष्टदः ॥११०॥ द्वयक्षरश्चंद्रभद्रांतो द्विविधश्चतुरक्षरः । एकाणोक्तवदेतेषां मुनिध्यानाचनादिकम् ॥१११॥ तारो रामश्चतुर्थ्यंतो वर्मास्त्रं वह्निवल्लभा । अष्टाणोऽयं महामंत्रो मुन्याद्यर्चा षडर्णवत् ॥११२॥ तारो मया हृदंते स्याद्रामाय प्रणवांतितमः । शिवोमाराममंत्रोऽयमष्टाणंः सर्वसिद्धिदः ॥११३॥ ऋषिः सदाशिवः प्रोक्तो गायत्री छंद ईरितम् । शिवोमारामचंद्रोऽत्र देवता परिकीर्तितः ॥११४॥ षड्दीर्घयामाय यातु ध्रुवपंचार्णयुक्तया । षडंगानि विधायाथ ध्यायेद्धृदि सुरार्चितम् ॥११५॥ रामं त्रिनेत्रं सोमाद्धंधारिणं शूलिनं वरम् । भस्मोद्धूलितसर्वांगं कपर्द्दिनमुपास्महे ॥११६॥ रामाभिरामां सौंदर्यसीमा सोमावतंसिनीम् । पाशांकुशधनुर्वाणधरां ध्यायेत्त्रिलोचनाम् ॥११७॥ एवं ध्यात्वा जपेद्वांलक्षं त्रिमधुरान्वितैः । विल्वपत्रैः फलैः पुष्पैस्तैलैर्वा पंकजैर्जुनेत् ॥११८॥ स्वयमायांति निधयः सिद्धयश्च सुरेप्सिताः । तारो माया च भरताग्रजरामनमोभवः ॥११६॥ वह्निजायाद्वादशार्णो मंत्रः कल्पद्रुमोऽपरः । अंगिराश्च मुनिश्चंदो गायत्री देवता पुनः ॥१२०॥ श्रीरामो भुवनाबीजं स्वाहाशक्तिः समीरितः । चंद्रैकमूनिभूनेत्रैर्मंतारै रंगकल्पनम ॥१२१॥
यदि केवल मोक्ष की आकांक्षा हो तो शुद्ध स्फटिक के समान रूप वाले राम का ध्यान करना चाहिये ॥१०८-१०७॥ ध्यानोपरान्त छः लाख मन्त्र-जप करना चाहिए । हवन, पूजन आदि तो षडक्षर मन्त्र की तरह करना चाहिये । वह्नि (र), शेष (आ) के आसन पर विराजमान हो और उसके बाद भान्त (म) हों तो केवल दो अक्षरों का मन्त्र (राम) होता है । इसके मुनि, ध्यान, पूजन आदि एकाक्षर मन्त्र की तरह किये जाते हैं । तार (ओं), माया (ह्रीं), रमा (श्रीं), अनङ्ग (क्लीं), अस्त्र (फट्) तथा स्व बीज (रां) इनके साथ पृथक् पृथक् जुड़ा हुआ द्वयक्षर मन्त्र (राम) छह भेदों से युक्त व्यक्षर मन्त्रराज है जो समस्त कामनाओं को पूर्ण करता है। द्वयक्षर मन्त्र के अन्त में चन्द्र और भद्र शब्द जोड़ा जाय तो दो प्रकार का चतुरक्षर मन्त्र होता है। इन सबके ऋषि, ध्यान और पूजन आदि एकाक्षर मन्त्र में बताये के अनुसार हैं। तार (ओं), चतुर्थ्यन्त राम शब्द (रामाय), वर्म (हुं), अस्त्र (फट्), वह्निवल्लभा (स्वाहा) —यह (ओं रामाय हुं फट् स्वाहा) आठ अक्षरों का महामन्त्र है । इसके ऋषि और पूजन आदि षडक्षर मन्त्र के समान हैं। 'ओं' ह्रीं रामाय नमः ओं, यह शिव, पार्वती तथा राम मन्त्र सकल सिद्धियों को देने वाला है । इसके ऋषि सदाशिव, छंद गायत्रो और देवता शिव, उमा तथा रामचंद्र हैं। छः दीर्घ मात्राओं से युक्त सप्ताक्षर मन्त्र से षडंगन्यास कर हृदय में देववंद्य, राम, अर्धचन्द्र, त्रिशूल तथा कपर्द धारण करने वाले एवम् सर्वांग में भस्म रमाने वाले त्रिनेत्र शंकर और अति सुन्दरी, मनोरमा, चन्द्रभूषणा, पाश, अंकुश, धनुष तथा बाण धारण करने वाली त्रिलोचना उमा का ध्यान करे। ध्यानोपरान्त तीन लाख मन्त्र जप करके त्रिमधुयुक्त बिल्वपत्र, फल, पुष्प, तिल या पद्मों से हवन करे ॥१०८-११८॥ ऐसा करने से निधियां तथा सिद्धियां, जिनकी देवता भी इच्छा करते हैं, स्वयम् उसके पास आती हैं। 'ओं ह्रीं भरताग्रजराम बलीं स्वाहा' यह द्वादशाक्षर मन्त्र कल्पवृक्ष के समान है । इसके मुनि अंगिरा, छन्द गायत्री, देवता श्रीराम, बीज भुवना और शक्ति स्वाहा है। मन्त्र के बारहौं अक्षरों से अङ्गन्यास कर षडक्षर मन्त्र की तरह ध्यान, पूजन आदि करे ॥११९-१२१३॥ ओं सीतापतिरामाय नमः