बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें६३६ त्रिसप्ततितमोऽध्यायः ध्यानपूजादिकं चास्य सर्वं कुर्यात्षडर्णवत् । प्रणवो हृदयं सीतापते रामश्च ङेंतिमः ॥१२२॥ हनद्वयान्ते वर्म्मास्त्रं मंत्रः षोडशवर्णवान् । अगस्त्योऽस्य मुनिश्चंदो बृहती देवता पुनः ॥१२३॥ श्रीरामोऽहं तथा बीजं रां शक्तिः समुदीरिता । रामाब्धिवह्नि नवेदाक्षिवर्णैः पंचांगकल्पना ॥१२४॥ ध्यानपूजादिकं सर्वमस्य कुर्यात्षडर्णवत् । तारो हृच्चैव ब्रह्मण्य सेव्याय पदमीरयेत् ॥१२५॥ रामायाकुण्ठशब्दहांतं तेजसे च समीरयेत् । उत्तमश्लोकधुर्याय स्वं भृगुः कामिकान्वितः ॥१२६॥ दंडापितां प्रिये मंत्रो रामरामाक्षरो मतः । ऋषिः शुक्रस्तथानुष्टुप्छंदो रामोऽस्य देवता ॥१२७॥ पादैः सर्वेण पंचांगं कुर्याच्छेषं षडर्णवत् । लक्षं जपो दशांशेन जुहुयात्पायसैः सुधीः ॥१२८॥ सिद्धमन्त्रस्य भुक्तिः स्यान्मुक्तिः पातकनाशनम् । आदौ दाशरथायांते विद्महे पदमुच्चरेत् ॥१२९॥ ततः सीतामल्लभाय धीमहीति समुच्चरेत् । तन्नो रामः प्रचेो वर्णा दद्यादिति च संवदेत् ॥१३०॥ एवोक्ता रामगायत्री सर्वभीष्टफलप्रदा । पद्मासीतापदां ङेंतं वह्न्यंतः षडक्षरः ॥१३१॥ वाल्मीकिश्च मुनिश्चंदो गायत्री देवता पुनः । सीता भगवती प्रोक्ता श्रीं बीजं वह्निमुन्दरी ॥१३२॥ शक्तिः षड्दीर्घयुक्तेन बीजेनांगानि कल्पयेत् । ततो ध्यायन्महादेवीं सीतां त्रैलोक्यपूजिताम् ॥१३३॥ तप्तहाटकवर्णाभां पद्मयुग्मं करद्वये । सर्वरत्नभूषणस्फूर्जद्दिव्यदेहां शुभ्रात्मिकाम् ॥१३४॥ नानावस्त्रां शशिमुखीं पद्माक्षीं मुदितांतराम् । पश्यंतीं राघवं पुण्यं शय्याध्यां षड्गुणेश्वरीम् ॥१३५॥ एवं ध्यात्वा जपेद्वर्णलक्षं मंत्री दशांशतः । जुहुयात्कमलैः फुल्लैः पीठे पूर्वोदिते यजेत् ॥१३६॥ मूर्ति संकल्प्य मूलेन तस्यामावाह्य जानकीम् । संपूज्य दक्षिणे राममभ्यर्च्यप्रिऽनिलात्मजम् ॥१३७॥
हन द्वय हुं फट्' यह सोलह अक्षरों का मन्त्र है। इसके मुनि अगस्त्य, छन्द बृहती, देवता श्रीराम, बीज 'हं' और शक्ति 'रां' है । मन्त्र के सोलहों अक्षरों से पंचांगन्यास कर षडक्षर मन्त्र की तरह ध्यान, पूजन आदि सब कुछ करे । 'ओं नमः ब्रह्मण्यसेव्याय रामायाकुण्ठतेजसे। उत्तमश्लोकधुर्याय न्यस्तदण्डापिताङ्ग्नये' यह तैंतीस अक्षरों का मन्त्र है। इसके ऋषि शुक्र, छन्द अनुष्टुप् और देवता राम हैं। समस्त पादों से पंचाङ्कन्यास कर शेष कार्य षडक्षर मन्त्र की तरह करे। विद्वान् साधक एक लाख मन्त्र जप करने के पश्चात् उसका दशांश पायस से हवन करे । इस मन्त्र की सिद्धि हो जाने पर भुक्ति-मुक्ति मिलती है तथा पातकों का नाश होता है। "दाशरथाय विद्महे । सीता- वल्लभाय धीमहि । तन्नो रामः प्रचोदयात्" यह रामगायत्री कही गई है, जो सकल कामनाओं को देने वाली है और जिसे राम ने प्रकाशित किया है। 'श्रीं सीतायै स्वाहा' यह षडक्षर सीता मन्त्र है ॥१२२-१३१॥ इसके मुनि वाल्मीकि, छन्द गायत्री, देवता भगवती सीता, बीज 'श्रीं' और शक्ति 'स्वाहा' है। छः दीर्घमात्राओं से युक्त बीज मन्त्र से अङ्गन्यास कर त्रैलोक्यपूजित महादेवी सीता का इस प्रकार ध्यान करे - "उनकी कान्ति तपे सोने के समान है; दोनों हाथों में कमलपुष्प विद्यमान हैं, दिव्य शरीर में उत्तम रत्नों के बने आभूषण चमक रहे हैं; स्वरूप सौम्य है; मुख चन्द्रमा के समान है; नेत्र पद्मों के तुल्य हैं; वे विविध वस्त्र धारण किये हुई हैं, उनका अन्तःकरण प्रहृष्ट मालूम पड़ता है; वे पुण्यात्मा राघव की ओर निहार रही हैं; बहुमूल्यक आसन पर समासीन हैं; और छहों गुणों की स्वामिनी हैं ॥१३२-१३५॥” उपर्युक्त प्रकार से ध्यान कर छः लाख मन्त्र-जप करे और उसका दशांश विकसित कमल पुष्पों से होम करे। अनन्तर पूर्वकथित पीठ पर मूलमन्त्र से मूर्ति का संकल्प करके उसमें जानकी का आवाहन करे। प्रतिमा