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भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 659, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 659

६४० नारदीयपुराणम् पृष्ठे लक्ष्मणमभ्यर्च्य षट्‌कोणेऽवंगपूजनम् । पत्रेषु मंत्रिमुख्यांश्च बाह्ये लोकेश्वरान्पुनः ॥१३८॥ वज्राद्यानपि संपूज्य सर्वसिद्धीश्वरो भवेत् । जातिपुष्पैश्चन्दनाक्तै राजवश्याय होमयेत् ॥१३६॥ कमलैर्धनधान्याप्तिनीलोत्पलैर्वशयेन् जगत् । बिल्वपत्रैः श्रियःप्राप्त्यै दूर्वाश्री रोगशांतये ॥१४०॥ किं बहुत्वेन सौभाग्यं पुत्रान्पौत्रान्परं सुखम् । धनं धान्यं च मोक्षं च सीताराधनतो लभेत् ॥१४१॥ शक्रः सेंदुर्लक्ष्मणाय हृदयं सप्तवर्णवान् । अगस्त्योऽस्य मुनिश्चंदो गायत्री देवता पुनः ॥१४२॥ लक्ष्मणाख्यो महावीरश्चाढचं हृद्बीजशक्तिकै । षड्दीर्घाढचेन बीजेन षडंगानि समाचरेत् ॥१४३॥ द्विभुजं स्वर्णरुचिरतनुं पद्मनिभेक्षणम् । धनुर्बाणकरं रामसेवासंसक्तमानसम् ॥१४४॥ ध्यात्वैवं प्रजपेद्ब्रर्णलक्षं मंत्री दशांशतः । मध्वाक्तैः पायसैर्हुत्वा रामपीठे प्रपूजयेत् ॥१४५॥ रामवद्यजनं चास्य सर्वसिद्धिप्रदो ह्ययम् । साकल्यं रामपूजाया यदीच्छेन्नियतं नरः ॥१४६॥ तेन यत्नेन कर्त्तव्यं लक्ष्मणार्चनमादरात् । श्रीरामचन्द्रभेदास्तु बहवः संति सिद्धिदाः ॥१४७॥ तत्साधकः सदा कार्यं लक्ष्मणाराधनं शुभम् । अष्टोत्तरसहस्रं वा शतं वा सुसमाहितैः ॥१४८॥ लक्ष्मणस्य मनुर्जप्यो मुमुक्षुभिरतंद्रितैः । अजप्त्वा लक्ष्मणमनुं राममंत्रान् जपंति ये ॥१४६॥ न तेषां जायते सिद्धिर्हानिरेव पदे पदे । यो जपेल्लक्ष्मणमनुं नित्यमेकांतमास्थितः ॥१५०॥ मुच्यते सर्वपापेभ्यः सर्वान्कामानवाप्नुयात् । जयप्रधानो मंत्रोऽयं राज्यप्राप्त्यैकसाधनम् ॥१५१॥

के दक्षिण भाग में राम, अग्रभाग में हनुमान् और पृष्ठ भाग में लक्ष्मण को पूजा कर षट्कोण में अङ्गदेवताओं की पूजा करे । पत्रों में प्रमुख मंत्रियों की तथा बाहर लोकपालों एवम् वज्र आदि आयुधों की अर्चना करे । ऐसा करने से सकल सिद्धियां प्राप्त होती हैं। राजा को वश में करने के लिये चन्दन लगाये जूही के पुष्पों से हवन करे । कमलों से होम करने से धन-धान्य की प्राप्ति होतो है । नील कमलों से हवन करने वाला व्यक्ति विश्व को वशीभूत कर लेता है। बिल्वपत्रों से लक्ष्मी की प्राप्ति तथा दूर्वा से रोग की शान्ति होती है। बहुत क्या कहें, सीता को आराधना करने से मनुष्य को सौभाग्य, पुत्र, पौत्र, सुख, धन, धान्य तथा मोक्ष की प्राप्ति होतो है ॥१३६-१४१॥ 'लं लक्ष्मणाय नमः' यह सात अक्षरों का मन्त्र है । इसके मुनि अगस्त्य, छन्द गायत्री, देवता लक्ष्मण तथा हनुमान्, बीज 'लं' और शक्ति 'नमः' है। छः दीर्घमात्राओं से युक्त बीज मन्त्र से षडंगन्यास कर दो भुजा वाले, स्वर्ण के समान मनोहर शरीर वाले, कमल तुल्य नेत्र वाले, हाथों में धनुष-बाण धारण करने वाले और राम की सेवा में दत्तचित्त वाले लक्ष्मण का ध्यान करने के पश्चात् सात लाख मन्त्र जपे और उसका दशांश मधु युक्त पायस से हवन करे । तदुपरान्त रामपीठ में राम हो की तरह उनकी भी पूजा करे । ऐसा करने से यह मन्त्र सकल सिद्धियों को प्रदान करता है। जो व्यक्ति रामपूजा को सर्वांग पूर्ण करना चाहता हो, वह यत्न करके आदरपूर्वक लक्ष्मण की अर्चना करे । श्रीरामचन्द्र के ऐसे अनेक प्रभेद हैं, जो सिद्धि को देने वाले हैं । ॥१४२-१४७॥ इसलिये साधक को सदा लक्ष्मण की शुभदायिनी आराधना करनी चाहिये । मोक्षाभिलाषी जन सावधान होकर लक्ष्मण का मन्त्र एक हजार आठ या एक सो आठ बार निरालस्यपूर्वक जप करे । जो व्यक्ति बिना लक्ष्मण के मन्त्र को जपे राम मन्त्रों का जप करता है, उसे सिद्धि नहीं मिलती; प्रत्युत पद-पद में हानि होती है ॥१४८- १४९॥। जो निश्चय एकान्त में लक्ष्मण-मन्त्र का जप करता है, वह सकल पापों से मुक्त होकर वाँछित फलों को प्राप्त करता है। यह मन्त्र विजय को देने वाला है। राज्यप्राप्ति का तो एकमात्र साधन है। नष्ट राज्य की...