बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 660, कुल 1008 में से
संदर्भ में पढ़ेंत्रिसप्ततितमोऽध्यायः ६४१ नष्टराज्याप्तये मंत्रं जपेल्लक्षं समाहितः । सोऽचिरान्नष्टराज्यं स्वं प्राप्नोत्येव न संशयः ॥१५२॥ ध्यायन्नराममयोध्यायामभिषिक्तमनन्यधीः । पञ्चायुतं मनुं जप्त्वा नष्टराज्यमवाप्नुयात् ॥१५३॥ नागपाशविनिर्मुक्तं ध्यात्वा लक्ष्मणमादरात् । अयुतं प्रजपेन्मंत्रं निगडान्मुच्यते ध्रुवम् ॥१५४॥ वातात्मजेनानीताभिरोषधीभिर्गतव्यथम् । ध्यात्वा लक्षं जपन्मंतमल्पमृत्युं जयेद्ध्रुवम् ॥१५५॥ घातयंतं मेघनादं ध्यात्वा लक्षं जपेन्मनुम् । दुर्जयं वापि वेगेन जयद्रिपुकुलं महत् ॥१५६॥ ध्यात्वा शूर्पणखानासाछेदनोद्युक्तमानसम् । सहस्रं प्रजपेन्मंत्रं पुरूहूतादिकान् जयेत् ॥१५७॥ रामपादाब्जसेवार्थं कृतोद्योगमथो स्मरन् । प्रजपेल्लक्षमंकांते महारोगात्प्रमुच्यते ॥१५८॥ त्रिमासं विजिताहारो नित्यं सप्तसहस्रकम् । अष्टोत्तरशतैः पुष्पैर्निश्छिद्रैः शतपत्रकैः ॥१५९॥ पूजयित्वा विधानेन पायसं च सशर्करम् । निवेद्य प्रजपेन्मंत्रं कुष्ठरोगात्प्रमुच्यते ॥१६०॥ विजने विजिताहारः षण्मासं विधिनामुना । क्षयरोगात्प्रमुच्येत सत्यं सत्यं न संशयः ॥१६१॥ अभिमंत्र्य जलं प्रातर्मंत्रेण त्रिः समाहितः । त्रिसंध्यं वा पिबेन्नित्यं मुच्यते सर्वरोगतः ॥१६२॥ दारिद्र्यं च पराभूतं जायते धनदोपमः । विषादिदोषसंस्पर्शो न भवेतु कदाचन ॥१६३॥ मनुना मंत्रितैस्तोयैः प्रत्यहं क्षालयेन्मुखम् । मुखनेत्रादिसंभूताञ्जयेद्रोगांश्च दारुणान् ॥१६४॥ पीत्वाभिमंत्रितं त्वंभः कुक्षिरोगान् जयेद्ध्रुवम् । लक्ष्मणप्रतिमां कृत्वा दद्याद्भक्त्या विधानतः ॥१६५॥ प्राप्ति के लिये जो व्यक्ति समाहित होकर एक लाख मन्त्र-जप करता है, उसे शीघ्र अपना विनष्ट राज्य प्राप्त हो जाता है, इसमें संशय नहीं ॥१५०-१५२॥ जो व्यक्ति अनन्यचित्त होकर अयोध्या में अभिषिक्त होने वाले राम का ध्यान करते हुए पचास हजार मन्त्र-जप करता है, उसे नष्ट राज्य की प्राप्ति होती है ॥१५३॥ जो मनुष्य नागपाश से मुक्त होने वाले लक्ष्मण का आदरपूर्वक ध्यान कर दश सहस्र मन्त्र जपता है, वह कारागार, (जेल) से मुक्त हो जाता है, इसमें सन्देह नहीं ॥१५४॥ जो हनुमान् द्वारा लाई गई ओषधि से स्वस्थ होने वाले लक्ष्मण का ध्यान कर एक लाख मन्त्र का जप करता है, वह निःसन्देह अकाल मृत्यु को जीतता है ॥१५५॥ जो मेघनाद को मारते हुए लक्ष्मण का ध्यान कर एक लक्ष मन्त्र का जप करता है, वह दुर्जय एवम् महान् शत्रुकुल को भी जीत लेता है ॥१५६॥ जो शूर्पणखा की नाक काटने के लिये उद्यत लक्ष्मण का ध्यान कर एक हजार बार मन्त्र को जपता है, वह इन्द्र आदि को भी जीत लेता है ॥१५७॥ जो राम के चरणारविन्दों की सेवा के लिये उद्योग करने वाले लक्ष्मण का स्मरण कर एकान्त में एक लाख मन्त्र का जप करता है, वह महारोग से मुक्त हो जाता है ॥१५८॥ जो तीन मास तक जिताहार¹ होकर नित्य सात हजार मन्त्र का जप करके एक सौ आठ निश्छिद्र कमलपुष्पों से विधिपूर्वक पूजन करता है तथा खीर एवम् शक्कर (चीनी) नैवेद्य चढ़ाता है वह कुष्ठरोग से छुटकारा पा जाता है ॥१५९-१६०॥ इसी तरह जिताहार होकर निर्जन स्थान में जप आदि करने से क्षयरोग (तपेदिक) दूर हो जाता है, इसमें तनिक भी संदेह नहीं है। जो प्रातःकाल सावधान होकर इस मन्त्र से तीन बार जल को अभिमंत्रित करके नित्य तीनों संध्या पान करता है, उसके सकल रोग निवृत्त हो जाते हैं, दरिद्रता विलीन हो जाती है। और तो क्या वह साक्षात् कुबेर तुल्य हो जाता है। विष आदि का दोष तो उसे कभी लगता ही नहीं। इस मन्त्र से अभिमंत्रित जल से प्रत्यह मुख धोना चाहिये ॥१६१-१६३½॥ ऐसा करने से मुख, नेत्र आदि स्थानों में हुए भयंकर रोग भी छूट जाते १. परिमित एवम् विहित भोजन करने वाला। ८१ ना० पृ०