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भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 661, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 661

६४२ नारदीयपुराणम् स सर्वेभ्योऽथ रोगेभ्यो मुच्यते नात्र संशयः । कन्यार्थी विमलापाणिग्रहणासक्तमानसः ॥१६६॥ ध्यायन् लक्षं जपेन्मंत्री अब्जैर्हुत्वा दशांशतः । ईप्सितां लभते कन्यां शीघ्रमेव न संशयः ॥१६७॥ दीक्षितं जृम्भणास्त्राणां मंत्रेषु नियतव्रतम् । ध्यात्वा च विधिवन्नित्यं जपेन्मासत्रयं मनुम् ॥१६८॥ पूजापुरःसरं सप्तसहस्रं विजितेंद्रियः । सर्वांसामपि विद्यानां तत्त्वज्ञो जायते नरः ॥१६६॥ विश्वामित्रक्रतुवरे कृताद्भुतपराक्रमम् । ध्यायँल्लक्षं जपेन्मंत्रं मुच्यते महतो भयात् ॥१७०॥ कृतनित्यक्रियः शुद्धस्त्रिकालं प्रजपेन्मनुम् । सर्वपापविनिर्मुक्तो याति विष्णोः परं पदम् ॥१७१॥ दीक्षितो विधिवन्मंत्री गुणैर्विगतकल्मषः । स्वाचारनियतो दांतो गृहस्थो विजितेंद्रियः ॥१७२॥ ऐहिकाननपेक्ष्यैव निष्कामो योऽर्चयेद्विभुम् । स सर्वान्पुण्यपापौघान्दग्ध्वा निर्मलमानसः ॥१७३॥ पुनरावृत्तिरहितः शाश्वतं पदमश्नुते । सकामो वाञ्छितान् लब्ध्वा भुक्त्वा भोगान् मनोगतान् ॥१७४॥ जातिस्मरश्चिरं भूत्वा याति विष्णोः परं पदम् । निद्राचन्द्रान्विता पश्चाद्भरताय हृदंतिमः ॥१७५॥ सप्ताक्षरो मनुश्चास्य मुन्याद्यश्चादि पूर्ववत् । बकः सेंदुश्च शत्रुघ्नपरं डेंतं हृदंतिमः ॥१७६॥ सप्ताक्षरोऽयं शत्रुघ्नमंत्रः सर्वैष्टसिद्धिदः ॥१७७॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे बृहदुपाख्याने सनत्कुमारविभागे तृतीयपादे रामाद्युपासना- वर्णनं नाम त्रिसप्ततितमोऽध्यायः ॥७३॥


हैं। इससे अभिमंत्रित जल को पीने से पेट की व्याधियाँ दूर हो जाती हैं, यह ध्रुव है। जो व्यक्ति लक्ष्मण की प्रतिमा बना कर भक्ति से विधिपूर्वक दान करता है, वह निःसंदेह समस्त रोगों से मुक्त हो जाता है। जो सुन्दरी कन्या से विवाह करना चाहता हो, वह लक्ष्मण का ध्यान कर इस मन्त्र को एक लाख जपे और उसका दशांश कमलों से हवन करे। ऐसा करने से शीघ्र अभिलषित कन्या को प्राप्त होता है, इसमें संशय नहीं। जो जितेन्द्रिय होकर जृंभणास्त्रों १ का दीक्षा पाने वाले महाव्रती लक्ष्मण का ध्यान कर तीन मास तक नित्य इस मन्त्र का सात हजार जप करता है, वह निखिल विद्याओं का तत्त्वज्ञ होता है। जो विश्वामित्र के यज्ञ में अद्भुत पराक्रम दिखलाने वाले लक्ष्मण का ध्यान कर इस मन्त्र को जपता है, वह महाभय से मुक्त हो जाता है। १६४-१७०॥ जो नित्य कर्म से शुद्ध होकर तीनों काल इस मन्त्र का जप करता है, वह अखिल पापों से मुक्त होकर वैकुण्ठ को जाता है। जो गृहस्थ साधक विधिपूर्वक दीक्षा लेकर निष्पाप, जितेन्द्रिय एवम् सदाचारकुशल हो बिना ऐहलौकिक स्वार्थ के निष्काम भाव से विभु रामचन्द्र की आराधना करता है, वह सकल पाप-पुण्यों को दग्ध कर निर्मलचित्त हो जाता है तथा उस शाश्वत पद को प्राप्त करता है, जहाँ से पुनरावृत्ति नहीं होती। वह समस्त कामनाओं को प्राप्त कर अभिलषित भोगों को भोगते हुए चिरकाल तक जातिस्मर (पूर्वजन्मों के वृत्तान्तों को जानने वाला) होता है और अन्त में विष्णु के परम पद को प्राप्त करता है। (भं भरताय नमः) यह सात अक्षरों का मन्त्र है। इसके मुनि आदि पूर्ववत् ही समझना चाहिए। (शं शत्रुघ्नाय नमः) यह सप्ताक्षर मन्त्र शत्रु का नाशक तथा सकलसिद्धि- दायक है ॥१७१-१७७॥ श्री नारदीयपुराण के बृहदुपाख्यानयुक्त पूर्वार्ध में सनत्कुमारविभाग के तृतीयपाद में रामादि उपासना वर्णन नामक तिहत्तरवाँ अध्याय समाप्त ॥७३॥


१. वह अस्त्र, जिसके छोड़ने से लोगों को जंभाई आने लगती है ।