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भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 662, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 662

चतुःसप्ततितमोऽध्यायः सनत्कुमार उवाच अथोच्यंते हनुमतो मंत्राः सर्वैष्टदायकाः । यान्समाराध्य विप्रेंद्र तत्तुल्याचरणा नराः ॥१॥ मनुः स्वरेंदुसंयुक्तं गगनं च भगान्विताः । हसफाग्निनिशाधीशाः द्वितीयं बीजमीरितम् ॥२॥ स्वफाग्नयो भगेढाढ्यास्तृतीयं बीजमीरितम् । वियद्भग्वग्निमन्विन्दुयुक्तं स्याच्च चतुर्थकम् ॥३॥ पंचमं भगचंद्राढ्यावियद्भग्वस्कवाययः । मन्विद्वाढ्यौ हसौ षष्ठं देंतः स्याद्धनुमांस्ततः ॥४॥ हृदयांतो महामंत्रराजोऽयं द्वादशाक्षरः । रामचन्द्रो मुनिश्चास्य जगतीछंद ईरितम् ॥५॥ देवता हनुमाग्बीजं षष्ठं शक्तिद्वितीयकम् । षड्बीजेश्च षडंगानि शिरोभाले दृशोर्मुखे ॥६॥ गलबाहुद्वये चैव हृदि कुक्षी च नाभितः । ध्वजे जानुद्वये पादद्वये वर्णान्क्रमन्न्यसेत् ॥७॥ षड्बीजानि पदद्वंद्वं मूर्ध्नि भाले मखे हृदि । नाभावूर्वोरुजंघयोश्च पादयोर्विन्यसेत्क्रमात् ॥८॥ अंजनीगर्भसंभूतं ततो ध्यायेत्कपीश्वरम् । उद्यत्कोटचर्कसंकाशं जगत्प्रक्षोभकारकम् ॥९॥ श्रीरामंत्रिध्यानानिष्टं सुग्रीवप्रमुखाचितम् । विवासयंतं नादेन राक्षसान्मारुतिं भजेत् ॥१०॥

अध्याय ७४ हनुमान् के मन्त्रों का निरूपण सनत्कुमार बोले-विप्रवर्य ! अब मैं सकलकामनादायक हनुमान् के मन्त्रों को बतलाता हूँ, जिनकी आराधना करने से मानव उनके समान हो जाता है। मनुस्वर (ओ) तथा इन्दु (अनुस्वार) से युक्त गगन (ह) अर्थात् 'हौं' यह प्रथम बीज है। ह् स् फ् र् और अनुस्वार ये भग (ए) से युक्त हों अर्थात् 'हस्फें' यह दूसरा बीज है। ख् फ् र् ये भग (ए) और इन्दु (अनुस्वार) से युक्त हों अर्थात् 'ख्फें' यह तीसरा बीज कहा गया है। वियत् (ह) भृगु (स्) अग्नि (र्) मनु (ओ) और इन्दु (अनुस्वार) इन सब का संयुक्त रूप 'हस्रौं' यह चौथा बीज है। भग (ए) और चन्द्र (अनुस्वार) से युक्त वियत् (ह) भृगु (स्) ख् फ् तथा अग्नि (र्) हों अर्थात् 'हस्ख्फें' यह पांचवां बीज है। मनु (ओ) और इन्दु (अनुस्वार) से युक्त ह् स् अर्थात् 'ह् सौं' यह छठा बीज है। तदनन्तर ङे विभक्त्यन्त हनुमत् शब्द (हनुमते) और अन्त में हृदय (नमः) यह (हौं हस्फें ख्फें हस्रौं ह्स्ख्फें ह् सौं हनुमते नमः) बारह अक्षरों वाला महामन्त्रराज कहा गया है। इस मन्त्र के श्रीरामचन्द्र ऋषि हैं और जगती छन्द कहा गया है। इसके देवता हनुमान् हैं। 'ह्सौं' बीज है, 'हस्फें' शक्ति है। छह बीजों से षडंग-न्यास कर शिर, ललाट नेत्र, मुख, ग्रीवा, भुजा, हृदय, पेट, नाभि, लिंग, जानु और चरणों में क्रमशः वर्णों का न्यास करे। पुनः छह बीजों तथा दो पदों को मस्तक, भाल, मुख, हृदय, नाभि, ऊरु, जंघा तथा चरणों में क्रमशः न्यस्त करे। अनन्तर अंजनी के गर्भ से उत्पन्न कपीश्वर का इस प्रकार ध्यान करे (हनुमान्) उनकी कान्ति उदित होते हुए कोटि सूर्य के समान है। वे संसार को प्रक्षुब्ध करने वाले तथा श्रीराम के चरणों के ध्यान में निरत रहने वाले हैं। सुग्रीव आदि कपिगण उनका सम्मान करते हैं। वे अपने नाद (किलकिलाहट) से राक्षसों को त्रास पहुँचाते हैं ॥१-१०॥

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