बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें६४६ नारदीयपुराणम्
हनुमत्प्रतिमां पट्टे माषैः स्नेहपरिप्लुतः। कुर्याद्रम्यां विशुद्धात्मा सर्वलक्षणलक्षिताम् ॥४२॥ तैलदीपं वामभागे घृतदीपं तु दक्षिणे। संस्थाप्यावाहयेत्पश्चान्मूलमन्त्रेण मन्त्रवित् ॥४३॥ प्राणप्रतिष्ठां कृत्वा च पाद्यादीनि समर्पयेत्। रक्तचन्दनपुष्पैश्च सिन्दूराद्यैः समर्चयेत् ॥४४॥ धूपं दीपं प्रदायाथ नैवेद्यं च समर्पयेत्। अपूपमोदनं शाकमोदकान्वटकादिकम् ॥४५॥ साज्यं च तत्समर्थाथ मूलमन्त्रेण मन्त्रवित्। अखण्डितान्यहिलतादलानि सप्तविंशतिम् ॥४६॥ त्रिधा कृत्वा सपूगानि मूलेनैव समर्पयेत्। एवं सम्पूज्य मन्त्रज्ञो जपेद्दशशतं मनुम् ॥४७॥ कर्पूराक्तिकं कृत्वा स्तुत्वा च बहुधा सुधीः। निजेप्सितं निवेद्याथ विधिवद्विसृजेत्ततः ॥४८॥ नैवेद्यान्नेन संभोज्य ब्राह्मणान्सप्तसंख्यया। निवेदितानि पर्णानि तेभ्यो दद्याद्विभज्य च ॥४९॥ दक्षिणां च यथा शक्तिं दत्त्वा तान् विसृजेत्सुधीः। तत इष्टगणैः सार्द्धं स्वयं भुंजीत वाग्यतः ॥५०॥ तद्दिने भूमिशय्यां च ब्रह्मचर्यं समाचरेत्। एवं यः कुरुते मर्त्यः सोऽचिरादेव निश्चितम् ॥५१॥ प्राप्नुयात्सकलान्कामान्कपीशस्य प्रसादतः। हनुमत्प्रतिमां भूमौ विलिखेत्तत्तुरो मनुम् ॥५२॥ साध्यनाम द्वितीयांतं विमोचय विमोचय। तत्पूर्वं मार्जयद्वामपाणिनाथ पुनर्लिखेत् ॥५३॥ एवमष्टोत्तरशतं लिखित्वा मार्जयेत्पुनः एवं कृते महाकारागृहाच्छीघ्रं विमुच्यते। एवमन्यानि कर्माणि कुर्यात्पल्लवमल्लिखन् ॥५४॥ सर्षपैर्वश्यकृद्धोमो विद्वेषे ह्यमराजैः। कुंकुमैरिध्मकाष्ठैर्वा मरीचैर्जीरकैरपि ॥५५॥ ज्वरे दूर्वागुडूचीभिर्दध्ना क्षीरेण वा घृतैः। शूले करंजवातारिसमिद्भिस्तैललोलितैः ॥५६॥ तैलाक्ताभिश्च निर्गुण्डीसमिद्भिर्वा प्रयत्नतः। सौभाग्ये चंदनेश्चंद्रलोचनैर्वा लवंगकैः ॥५७॥ सुगंधपुष्पैर्वस्त्राप्त्यै तत्तद्धान्यैस्तदाप्तये। रिपुपादरजोभिश्च राजीलवणमिश्रितैः ॥५८॥
घृतदीप जलाये। पश्चात् मन्त्रवेत्ता साधक मूलमन्त्र से प्रतिमा को स्थापित कर (हनुमान् का) आवाहन कर ॥३९-४३॥ पुनः प्राणप्रतिष्ठा कर पाद्य, रक्तचन्दन, पुष्प, सिंदूर, धूप, दीप तथा नैवेद्य समर्पित करे। पूरी, चावल, शाक, वड़ा, घी तथा मिठाई समर्पण कर सत्ताईस बीड़े पान एवम् सुपारी भी मूलमन्त्र को पढ़ते हुए अर्पित करे। इस तरह पूजा कर विद्वान् साधक एक हजार मन्त्रजप, कर्पूर को आरती, अनेक प्रकार से स्तुति तथा अपनी प्रिय वस्तु समर्पित कर विधिपूर्वक प्रतिमा विसर्जन करे, तदुपराप्त सात ब्राह्मणों को नैवेद्यान्न खिला कर निवेदित पान-सुपारी एवम् यथाशक्ति दक्षिणा देकर उन्हें विदा करे। पश्चात् इष्ट-मित्रों के साथ मौन हो कर स्वयं भोजन करे। उस दिन उसे भूमि पर शयन तथा ब्रह्मचर्य पालन करना आवश्यक है। जो मनुष्य ऐसा करता है, उसे शीघ्र ही हनुमान् की कृपा से सकल अभीप्सित वस्तुएं प्राप्त होती हैं। भूमि पर हनुमान् की प्रतिमा लिखकर उसके आगे मन्त्र लिखे। फिर साध्य (जिसके उद्देश्य से क्रिया की जाती हो) का नाम लिखकर 'विमोचय, विमोचय' यह पद भी लिखे। पश्चात् सबको बाँयें हाथ से मिटा दे। इस प्रकार एक सौ आठ बार लिखने एवम् मिटाने से साध्य कारागार (जेल) से शीघ्र मुक्त हो जाता है ॥४४-५३ १/२॥ इसी तरह पल्लव को लिखते हुए अन्य कर्मों को भी करे। सरसों से होम करने से वशीकरण सिद्ध होता है। करबीर, कुंकुम, मरीच तथा जीरे की लकड़ी से होम करने से शत्रु को आपस में ही विद्वेष हो जाता है। दुर्वा, गुडूच, दही, दूध तथा घृत से हवन करने से ज्वर नष्ट होता है। तेल से भीगे करंज, रेंढ तथा निर्गुण्डी (स्याह फूल वाली नेवारी) की लकड़ी से होम करने से शूल रोग नष्ट होता है। सौभाग्यवृद्धि के लिये चन्दन, इन्द्रलोचन तथा लवंग से हवन करना चाहिये ॥५४-५७॥ सुगंधित पुष्पों से होम करने से वस्त्र की प्राप्ति होती है। तत्तत् अन्न की प्राप्ति के लिये तत्तत् अन्न से हवन करना चाहिये। शत्रु की चरणधूलि में पीला सरसों तथा नमक मिला कर उससे होम