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भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 666, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 666

६४७ चतुःसप्ततितमोऽध्यायः होमयेत्सप्तरात्रं च रिपुर्याति यमालयम् । धान्यैः संप्राप्यते धान्यमन्नैरन्नसमुच्चयः ॥५८॥ तिलाज्यक्षीरमधुभिर्महिषीगोसमृद्धये । किं बहुतैर्विषे व्याधौ शांतौ मोहे च मारणे ॥६०॥ विवादे स्तंभने द्यूते भूतभीतो च संकटे । वश्ये युद्धे क्षते दिव्ये बंधमोक्षे महावने ॥६१॥ साधितोऽयं नृणां दद्यान्मन्त्रः श्रेयः सुनिश्चितम् । वक्ष्येऽथ हनुमद्यंत्रं सर्वसिद्धिप्रदायकम् ॥६२॥ लांगलाकारसंयुक्तं वलयत्रितयं लिखेत् । साध्यनाम लिखेन्मध्ये पाशीबीजप्रवेष्टितम् ॥६३॥ उपर्यष्टच्छदं कृत्वा पत्रेषु कवचं लिखेत् । तद्बहिर्दंतमालिख्य तद्बहिश्चतुरस्रकम् ॥६४॥ चतुरस्रस्य रेखाग्रे त्रिशूलानि समालिखेत् । सौं बीजं भूपुरस्याष्टवज्रेषु विलिखेत्ततः ॥६५॥ कोणेष्वंकुशमालिख्य मालामन्त्रेण वेष्टयेत् । तत्सर्वं वेष्टयेद्यंत्रे वलयत्रितयेन च ॥६६॥ शिलायां फलके वस्त्रे ताम्रपत्रेऽथ कुडचके । ताडपत्रेऽथ भूर्जे वा रोचनानाभिकुंकुमैः ॥६७॥ यंत्रमेतत्समालिख्य निराहारो जितेंद्रियः । कपेः प्राणान्प्रतिष्ठाप्य पूजयेत्तद्यथाविधि ॥६८॥ अशेषदुःखशांत्यर्थं यंत्रं संधारयेद् बुधः । मारीज्वराभिचारादिसर्वोपद्रवनाशनम् ॥६९॥ योषितामपि बालानां धृतं जनमनोहरम् । भूतकृत्यापिशाचानां दर्शनादेव नाशनम् ॥७०॥ मालामन्त्रमथो वक्ष्ये तारो वाग्विष्णुगेहिनी । दीर्घत्रयान्विता माया प्रागुक्तं कूटपञ्चकम् ॥७१॥ ध्रुवो हृद्धनुमान्देंताऽथ प्रकटपराक्रमः । आक्रांतदिङ्मंडलांते यशोवितानसंवदेत् ॥७२॥ धवलीकृतवर्णांते जगत्त्रितयवञ्च च । देहज्वलदग्निसूर्य कोटद्युते च समप्रभ ॥७३॥ तनूरुहपदांते तु रुद्रावतार संवदेत् । लंकापुरी ततः पश्चाद्दहनोदधिलंघन ॥७४॥ करने से शत्रु यमलोक को चला जाता है। धान्य से होम करने से धान्य तथा अन्न से होम करने से अन्न की वृद्धि होती है। तिल, घृत, दूध तथा मधु से हवन करने से भैंस एवम् गाय की समृद्धि होती है। बहुत क्या कहें; विष, व्याधि, शांति, मोहन, मारण, विवाद, स्तंभन, द्यूत, भूतोपद्रव, संकट, वशीकरण, युद्ध, घाव, दैवी बाधा, बंधनमुक्ति तथा महावन में इस मन्त्र के जप करने से मनुष्य का निश्चित कल्याण होता है ॥५८-६१॥ अब मैं सर्वसिद्धिदायक हनुमान् के मन्त्र को बतलाता हूँ। पुच्छाकृति रेखा से युक्त तीन वलयाकार रेखा खींचे। उसके मध्य में साध्य का नाम लिखकर पाशबीज से वेष्टित कर दे। उसके ऊपर अष्टदल कमल लिख कर पत्रों पर कवच लिखे। उसके बाहर दांत और उससे भी परे चौकोर रेखा खींचे। चौकोर रेखा के आगे अनेक त्रिशूल बनाकर भूपुर के आठ वज्रों पर 'सौं' यह बीज लिख दे। कोणों में अंकुश लिखकर मालामन्त्र से उसे वेष्टित करे। फिर संपूर्ण यंत्र को वलयाकार त्रिरेखा से आवृत करे। शिला, फलक (तख्ता), वस्त्र, ताम्रपत्र, कुड्य (दीवार), तालपत्र या भोजपत्र पर गोरोचन तथा कस्तूरी मिश्रित कुंकुम से उस यंत्र को लिखकर निराहार एवम् जितेंद्रिय साधक उसमें हनुमान् की प्राणप्रतिष्ठा करके विधिपूर्वक पूजा करे। जो विद्वान् व्यक्ति उस यंत्र को धारण करते हैं, उनके समस्त दुःख निवृत्त हो जाते हैं। वह यंत्र महामारी (हैजा), ज्वर, प्रेतादि बाधा तथा सकल उपद्रवों का नाशक है। उसके धारण से कन्या, कामिनी तथा जनता भी वशीभूत हो जाती है। उसके दर्शन मात्र से भूत, कृत्या एवम् पिशाचों का नाश होता है ॥६२-७०॥ अब इसके उपरान्त मालामन्त्र के संबंध में कहता हूँ। "तारोवाक् स्वाहा" यह मालासंज्ञक मन्त्र सकल कामनाओं को सफल करने वाला है। इसमें इक्कीस अक्षर हैं। महाभय तथा महान् उत्पात के समय इसके स्मरण करने से दुःखनाश होता है। द्वादशाक्षर मन्त्र में जो अन्तिम छह अक्षर (हनुमते नमः) हैं