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भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 667, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 667

६४८ नारदीयपुराणम् दशग्रीवशिरः पश्चात्कृतांतकपदं वदेत् । सीतांते श्वसनपदं वाट्यंते सुतमीरयेत् ॥७५॥ अंजनागर्भसंभूतः श्रीरामलक्ष्मणान्वितः । नदंति करवर्णांते सैन्यप्राकार ईरयेत् ॥७६॥ सुग्रीवसख्याहृद्वाणैर्द्रणवालिनिबर्हण । कारणद्रोणशब्दांते पर्वतोत्पादनेति च ॥७७॥ अशोकवनवीथ्यंते दारुणाक्षकुमारक । छेदनांते वनरक्षाकरांते तु समूह च ॥७८॥ विभञ्जनांते ब्रह्मास्त्रब्रह्माशक्ति ग्रसेति च । लक्ष्मणांते शक्तिभेदनिवारणपदं वदेत् ॥७९॥ विशल्यो षधिशब्दांते समानयन संपठेत् । बालोदित ततो भानुमंडलप्रसनेति च ॥८०॥ मेघनादहोमघादिछ्वसनपदं वदेत् । इंद्रजिद्वधकारांते णसीतारक्षकेति च ॥८१॥ राक्षसीसंघशब्दांते विदारणपदं वदेत् । कुंभकर्णादिसंकीर्त्यवधांते च परायण ॥८२॥ श्रीरामभक्तिवर्णांते तत्परेति समुद्र च । व्योमद्रुमलंघनेति महासामर्थ्य संवदेत् ॥८३॥ महातेजः पुंजशब्दाद्विराजमानवोच्चरेत् । स्वानिवचनसंपादिचार्जनांते च संयुग ॥८४॥ सहायांते कुमारति ब्रह्मचारिन्पदंवदेत् । गंभीरशब्दोदयांते दक्षिणापथ संवदेत् ॥ मार्त्तण्डमेशशब्दांते वदेत्पर्वतपीठिका ॥८५॥ अर्चानांते तु सकलमंत्रांते मपदं वदेत् । आचार्यमम शब्दांते सर्वग्रहविनाशन ॥८६॥ सर्वज्वरोच्चाटनांते सर्वविषविनाशन । सर्वापत्तिनिवारण सर्वदुष्टनिबर्हण ॥८७॥ सर्वव्याध्याधि सम्प्रोच्य भयांते च निवारण ॥८८॥ सर्वशत्रुच्छेदनेति ततो मम परस्य च ॥८९॥ ततस्त्रिभुवनांते तु पुंस्त्रीनपुंसकात्मकम् । सर्वजीवपदांते तु जातं वशययुग्मकम् ॥९०॥ ममाज्ञाकारकं पश्चात्संपादयुगं पुनः । ततो नानानामधेयान्सर्वान् राजः स संपठेत् ॥९१॥ परिवारान्ममेल्यंते सेधकान् कुरु युग्मकम् । सर्वशस्त्रास्त्रवीर्यंते बाणि विध्वंसवद्वयम् ॥९२॥ लज्जादीर्घततोपेता होत्रयं चेहि युग्मकम् । विलोमं पंचकूटानि सर्वशत्रून्हनद्वयम् ॥९३॥


इनकों और थादि बीज (ह्रीँ) को छोड़कर शेष बचे हुए पांच बीजों का जो पञ्चाक्षर मन्त्र बनता है, वह सकलकामनादायक है । इसके श्रीरामचन्द्र ऋषि, गायत्री छन्द और हनुमान् देवता कहे गये हैं । निखिल वस्तुओं की प्राप्ति के लिए इसका विनियोग किया जाता है । इसके पांच बीजों तथा सम्पूर्ण मन्त्र से षडंगन्यास करे । रामदूत, लक्ष्मणप्राणदाता, अंजनीसुत, सीताशोकविनाशन तथा लंकाप्रासादभंजन-ये पांच नाम हैं । इनसे पहले 'हनुमत' यह नाम और है। हनुमत् आदि पांच नामों के आदि में पांच बीज और अंत में ङे विभक्ति लगाई जाती है । अन्तिम नाम के साथ उक्त पांचों बीज जुड़ते हैं । ये ही षडंगन्यास के ६ मन्त्र हैं' । इसके ध्यान-पूजन आदि कार्य पूर्वोक्त द्वादशाक्षर मन्त्र के समान हो हैं। प्रणव (ओँ), वाग्भव (ऐँ), पद्मा (श्रीँ) तीन दीर्घ स्वरों से युक्त मायाबीज (ह्रां ह्रीं ह्रूं) तथा पांच कूट (हूस्फें, ह्फ्रें, ह्स्रौं, ह्स्ख्फें, ह्सौं) यह ११ अक्षरों का मन्त्र समस्तसिद्धिदायक है। इसके भी ध्यान-पूजन आदि सब कार्य पूर्ववत् होते हैं। इस मन्त्र की आराधना की जाय तो


१. यथा 'हूस्फें हनुमते नमः,' हृदयाय नमः । ह्फ्रें रामभक्ताय नमः शिरसे स्वाहा । ह्स्रौं लक्ष्मणप्राणदात्रे नमः शिखायै वषट् । ह्स्ख्फें अञ्जनीसुताय नमः कवचाय हुम् । ह्सौं सीताशोकविनाशाय नमः नेत्रत्रयाय वौषट् । हूस्फें ह्फ्रें ह्स्रौं ह्स्ख्फें ह्सौं लङ्काप्रासादभंजनाय नमः अस्त्राय फट् ।