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भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 668, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 668

६४६ चतुःसप्ततितमोऽध्यायः परबलानि परांते सैन्यानि क्षोभयद्वयम् ॥८४॥ मम सर्वं कार्यजातं साधयेति द्वयं ततः ॥८५॥ सर्वदुष्टदुर्जनांते मुखानि कीलयद्वयम् । घेद्वयं वर्मत्रितयं फट्त्रयं हांत्रयं ततः ॥८६॥ वह्निप्रियांते मंत्रोऽयं मालासंज्ञोऽखिलेष्टदः ॥८७॥ वस्वष्टबाणवर्णोऽयं मंत्रः सर्वैष्टसाधकः ॥८८॥ महाभये महोत्पाते स्मृतोऽयं दुःखनाशनः । द्वादशार्णस्य षट्कूटं त्यक्त्वा बीजं तथादिमम् ॥८९॥ पंचकूटात्मको मंत्रः सर्वकामप्रदायकः । रामचंद्रो मुनिश्चास्य गायत्री छंद ईरितम् ॥१००॥ हनुमान्देवता प्रोक्तो विनियोगोऽखिलाप्तये । पंचबीजैः समस्तेन षडंगानि समाचरेत् ॥१०१॥ रामदूतो लक्ष्मणांते प्राणदाताञ्जनोसुतः । सीताशोकविनाशोऽयं लंकाप्रासादभंजनः ॥१०२॥ हनुमदाद्याः पंचैते बीजाद्या ङेयुताः पुनः । षडंगमन्त्रवो ह्येते ध्यानपूजावि पूर्ववत् ॥१०३॥ प्रणवो वाग्भवं पद्मा माया दीर्घत्रयान्विता । पंचकूटानि मंत्रोऽयं रुद्राणैः सर्वसिद्धिदः ॥१०४॥ ध्यानपूजादिकं सर्वमस्यापि पूर्ववन्मतम् । अयमाराधितो मंत्रः सर्वाभीष्टप्रदायकः ॥१०५॥ नमो भगवते पश्चादनंतश्चन्द्रशेखरां । जनेयाय महांते तु बलायांते ऽग्निवल्लभा ॥१०६॥ अष्टादशार्णो मंत्रोऽयं मनिरीश्वरसंज्ञकः । छंदोऽनुष्टुब्देवता तु हनुमान्पवनात्मजः ॥१०७॥ ह्रीं बीजं वह्निवनिता शक्तिः प्रोक्ता मनीषिभिः । आंजनेयाय हृदयं शिरश्च रुद्रमूर्तये ॥१०८॥ शिखायां वायुपुत्रायाग्निगर्भाय वर्मणि । रामदूताय नेत्रं स्याद्ब्रह्मास्त्रायास्त्रमीरितम् ॥१०९॥ तप्तचामीकरनिभं भीघ्नसंविहिताञ्जलिम् । चलत्कुंडसदीप्तास्यं पद्माक्षं मारुतिं स्मरेत् ॥११०॥ ध्यात्वैवममृतं जप्त्वा दशांशं जुहुयात्तिलैः । वैष्णवे पूजयेत्पीठे प्रागुद्दिष्टेन वर्त्मना ॥१११॥ अष्टोत्तरशतं नित्यं नक्तभोजी जितेंद्रियः । जपित्वा क्षुद्ररोगेभ्यो मुच्यते नात्र संशयः ॥११२॥ महारोगनिवृत्त्यै तु सहस्रं प्रत्यहं जपेत् । राक्षसौघं विनिघ्नंतं कपिं ध्यात्वाघनाशनम् ॥११३॥ अयुतं प्रजपेन्नित्यमचिराज्जयति द्विषम् । सुग्रीवेण समं रामं संदधानं कपि स्मरन् ॥११४॥ सकल कामनायें पूर्ण होती हैं । 'नमो भगवते आंजनेयाय महाबलाय स्वाहा' यह १८ अक्षरों का मन्त्र है । इसके ईश्वर ऋषि, अनुष्टुप् छन्द, पवनकुमार हनुमान् देवता, ह्रं बीज और स्वाहा शक्ति है, ऐसा मनीषी पुरुषों का कथन है । 'आञ्जनेयाय नमः' का हृदय में, 'रुद्रमूर्तये नमः' का सिर में, 'वायुपुत्राय नमः' का शिखा में 'अग्नि- गर्भाय नमः' का कवच में, रामदूताय नमः' का नेत्रों में तथा 'ब्रह्मास्त्राय नमः' का अस्त्रस्थान में न्यास करे । इस प्रकार न्यासविधि कही गई है । (इसके बाद हनुमान् का ध्यान करना चाहिये) जिनकी कान्ति तप्त सुवर्ण के समान है, जो भय का नाश करने वाले हैं, जिन्होंने (श्रीराम के लिए) अंजलि बांध रखी है, जिनका मुख चमकते हुए चंचल कुंडलों से शोभायमान है और जिनके नेत्र कमल के समान हैं, उनका ध्यान करें ॥१०१-११०॥ इस प्रकार ध्यान कर दश हजार मन्त्र का जप करे और उसका दशांश तिल से होमे । अनन्तर वैष्णव पीठ पर पूर्वोक्त रीति से पूजन करना चाहिये । जो नित्य एकभुक्त करते हुए इन्द्रियसयंमपूर्वक एक सौ आठ बार इस मन्त्र का जप करता है, वह क्षुद्र रोगों से मुक्त हो जाता है, इसमें संशय नहीं ॥१११-११२॥ महारोग से छुटकारा पाने के लिये प्रतिदिन एक हजार जप करना चाहिये । जो राक्षस समूह को मारने वाले पापनाशक हनुमान् का ध्यान कर दश हजार इस मन्त्र का जप करता है, वह शीघ्र ही शत्रु को जीत लेता है । जो सुग्रीव से राम को संधि कराते हुए वायुपुत्र का ध्यान कर दश हजार मन्त्र का जप करता है, उसे शत्रु से मेल हो जाता ८२ ना० पु०